Wednesday, October 21, 2015

"अफ़सोस मत करो माँ!"

"अफ़सोस मत करो माँ!"

गिलहरियाँ अक्सर मरती हैं
पैरों के नीचे
पहियों के नीचे
टापों के नीचे कभी,
शेरों, चीतों और बाघों को
मिलती रहती है इसकी सूचना
उनकी प्रतिक्रिया
होती है इतनी भर
जैसे ऊँघते  हुये
बदल लेता हो करवट कोई
यदा-कदा अर्धनींद में,
शेर देखता है अपने पंजे
नः ... कहीं नहीं...
ख़ून की एक बूँद भी
बाघ सूँघता है
अपनी ही साँस
भैंसों और हिरणों के
लोथड़ों की बास,
कहीं नहीं गिलहरियों की गंध
साँस में या बास में,
पैरों पहियों और
टापों के नीचे
किसी बड़ी और जटिल
परियोजना पर चल रहा है काम
-सामाजिक और मानसिक!
चारों और धूल के बादली परिन्दे
जिनकी नुकीली चोंच में
गिलहरियों के रोयें
पता नहीं है भी या नहीं
लेकिन बाघ और शेर
प्रसन्न हैं- नितान्त!
इस बात को लेकर
कि जिसके मरने से
दाँतों के छेद भी न भरें
उनकी मृत्यु की विडम्बना के
व्यर्थ विवेचना से
पृथक रह सकते हैं वो
क्यूँकि, नींद.......
आँखों को और अधिक
पिलायी जा सकती है अभी,
ऐसा ही कुछ सोचते हैं
गिलहरियों की मौत पर
ऊँघने वाले शेर और बाघ ।


जा कर सो जाओ माँ !
दरअसल, सत्य तो यह है
कि मेरे अन्दर
एक नन्हीं कमज़ोर गिलहरी थी
जिसे मार कर, मिल बाँट कर
खा गये शेर और बाघ।
तुम्हारे रक्त से
बने इस शरीर के भीतर
पुनर्जन्म हो रहा है
उसी गिलहरी का,
एक प्रगल्भ
और परेश पुरूष में
इसलिये,
मेरे गिलहरी रूपी शरीर के
नष्ट होने का
जश्न मनाओ
और अफ़सोस मत करो माँ,
सम्भव हो तो मदद करो,
उन जीवाणुओं की
ताकि पहले वो चट कर जायें
मेरे गिलहरी जैसे शरीर के बचे-खुचे
रोंये और हड्डियों को।


लेकिन, क्या जानते हैं वे?
हड्डियों तक का
चूरन बना कर
मिट्टी में परोस देने वाले
जीवाणुओं को भी
स्वाद का चस्का लगा हुआ है,
उन्होंने अब तक 
किसी को छोड़ा है क्या
जो तुम अपने
आक़़ा हो होने पर इतरा रहे हो।
सुक्ष्म और ढ़ीठ अत्यन्त
तुम से कहीं ज़्यादा बेग़ैरत,
उन्होंने अब तक
किसी से गठबन्धन किया
तो राज़ बनाने के लिये नहीं
लील जाने के लिये किया,
तुम भी उसी अन्धकार में
दबोच लिये जाओगे
समाचार-पत्र और टीवी रेडियो में
एक्सक्लुसिव कवरेज़ के साथ।

निर्मल अगस्त्य
22-10-2015
पटना, बिहार।

Tuesday, October 13, 2015

‘‘मुझ से तो वेश्या भली’’

           ‘‘मुझ से तो वेश्या भली’’

‘‘चाय छत पर लेते आना!’’ इतना कह कर सुबोध अख़बार लिये सीढ़ी घर की तरफ़ बढ़ गया। सिगरेट और माचिस उसने बाँये हाथ में ऐसे दबा रखा था कि दिखाई न दे। बाबूजी डायनिंग टेबल के पास रखी चैंकी पर बैठ कर अखबार के साथ दी जाने वाली पत्रिका पढ़ रहे थे। आँख उठा के नहीं देखा। जानते हैं कि सुबोध रोज़ सबेरे चाय के साथ एक सिगरेट पीता है। किसी ने बताया होगा या कभी देख लिया होगा। दोनों अनुमानों से अहम बात तो यह है कि सीढ़ीघर के चैताल पर सिगरेट पीने की बाद सुबोध टोंटी को वहीं पानी की टंकी के बगल में फेंकता है जिसे उसकी पत्नि सप्ताह में एक बार साफ़ कर देती है। तो जब साक्षात राम बता रहे हैं तो हनुमान और लक्ष्मण से क्या जिरह करना। अंगद, सुग्रीव से क्या पूछना। कंगन हाथ में है और मुहावरा ऐसे ही थोड़े न बना है कि हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या!
     सुबोध की यही आदत ख़राब है जो उसे भी लगती है लेकिन कुछ नहीं कर सकता। सुबह उठने का बाद सबसे पहला वाक्य चिल्ला के ही बोलेगा- ‘‘चाय छत पर लेते आना।’’
     क्यूँ चिल्लाता है सुबह उठते ही, कोई नहीं कह सकता। दूर के एक बहनोई ने कहा कि यह अधकपारी के कारण हो रहा है। सुबोध को अधकपारी है। माईग्रेन! आधासीसी का दर्द! कई नाम हैं उस दर्द के लेकिन परिणाम एक ही है। बारह घन्टे का असहनीय दर्द। कलकत्ता में एक दोस्त हुआ करता था उसका- शैवाल गुहा। कहता था कि माईग्रेन उसी व्यक्ति को सताता है जिसकी यौन इच्छा पूरी नहीं हो पाती। अब सुबोध की कोई इच्छा नहीं है। वसुन्धरा की शादी हो जाने के बाद उसकी सारी इच्छायें मर गईं। वह खा लेता है, पी लेता है, सो लेता है, जी लेता है, पत्नि के साथ साहचर्य कर लेता है, ये अलग बात है लेकिन किसी इच्छा के वशीभूत होकर नहीं करता ये सब। सब करते हैं तो वो भी कर लेता है। सब खाते-पीते हैं तो वो भी खा, पी और सो लेता है। चुँकि शरीर के स्तर पर सक्षम है तो साहचर्य भी कर लेता है लेकिन उसकी कोई यौन इच्छा नहीं है। कम से कम अलग से तो नहीं। कल रात उसे लगा कि गरदन पर छिपकली रेंग रही है। अधनींदीं में बाँये हाथ से गरदन पर तेज़ी से हाथ फेरा तो पाया पत्नि गुदगुदी कर रही है। पत्नि जाग रही थी। अच्छे मूड में थी। कुछ कहना चाह रही थी। वह फिर से सोने की कोशिश करने लगा मानों पत्नि का हाथ गरदन पर ग़लती से चला गया हो। दो मिनट बाद छिपकली फिर वापस आई और कई बार आई। नतीजा वही हुआ जो हर रात होता रहा था लेकिन उसकी कोई अतिरिक्त यौन इच्छा नहीं है, बिल्कुल भी नही!
     लेकिन, क्या कोई ऐसा प्राणी हो सकता है जिसकी माँ न हो। कोई ऐसा जीवन हो सकता है जहाँ पानी न हो। क्या कोई ऐसी धरा हो सकती है जिसके लिये अम्बर न हो। क्या कोई ऐसा पहलू हो सकता है जिसका दूसरा पहलू न हो? ऐसा कैसे हो सकता है कि सुबोध इच्छाविहीन हो। है उसकी एक इच्छा। कार या एस.यू.वी. में घूमने की इच्छा नहीं। न ही किसी अपार्टमेन्ट के मालिक बन जाने की इच्छा। इच्छा है नाम कमाने की। वो भी साहित्य में नाम कमाने की। आलमारियाँ भरी पड़ी हैं। किताबों और पन्नों के अम्बार के बीच वह जीता चला आ रहा है। उस अम्बार में उसकी लिखी कई कहानियाँ, हज़ारों कवितायें और सैकड़ों लेख भी धूल फाँक रहे हैं।
     जवानी के दिनों में कहीं-कहीं दो-चार छप भी गया था। लेकिन पिछले दस सालों से कहीं कोई नहीं छाप रहा। बस तीन साल पहले एक कविता संग्रह छपा था, वो भी पैसा देकर। सम्पादक को क्या अच्छा लगेगा ये तो समझना ज़रा मुश्किल है। प्रकाशक आजकल पैसे माँगने लगे हैं। इससे तो वेश्यायें अच्छी हैं जिन्हें पहले डील से ही पेमेन्ट मिलने लगता है। अब साहित्य के मैदान में एक नई परम्परा शुरू हुई है। अपने को प्रमोट करने की बाज़ारू परम्परा। प्रकाशक बस आपकी लिखी चीज़ को बेच-बेच के खायेगा और आपको पता भी नहीं चलना कि वास्तव में कितनी प्रतियाँ   बिकी हंै। आपसे जितना रूपया लेगा, उसके आधे का किताब छापेगा और दस या बीस प्रति आपको पकड़ा देगा। फिर कान में तेल डालकर सो जायेगा। करते रहिये फ़ोन पर फ़ोन। बाक़ी आधे रूपये अपने खाते में डाल कर निश्चिन्त हो जायेगा। सो कुछ साल पहले एक अमेरिकन यूरोपयिन काॅन्सेप्ट आया। प्रमोशन और मार्केटिंग का काॅन्सेप्ट। वो भी लेखक के पैसे से। और वो भी प्रकाशन ख़र्च का पाँच से दस गुना। अगर आप प्रमोशन और मार्केटिंग के लिये पैसा देंगे तो प्रकाशक आपकी किताब दुकानों में, लाईब्रेरियों में और स्कूल, काॅलेजों और विश्वविद्यालयों में भेजेगा। गूगल और सोशल मीडिया पर बतायेगा। इन्टरनेट कैम्पेनिंग करेगा, समालोचना करवायेगा और तब आप लोगों तक पहुंचेंगे और तब आप पढे़ जायेंगे, प्रशंसित होंगे और नाम कमायेंगे। बात अच्छा लिखने की नहीं है, बात है कि जब आपकी किताब प्रकाशक के गोदाम में ही दफ़न कर दी जा रही है तो पाठकों को ये निर्णय करने का मौक़ा मिल कहाँ रहा है कि आप कैसा लिखते हैं। जंगल में मोर नाचा वाला मुहावरा ऐसे ही थोड़े न बना है और मोर को जंगल से रिहायश और आबादी वाले इलाके में आने के लिये पैसा चाहिये, ढे़र सारा पैसा! धप-धप की आवाज़ हुई। पत्नि चाय लेकर उपर आ रही थी। वह अखबार में घुसने की कोशिश करने लगा। आजकल उसे ख़बरों का ओर-छोर समझ में नही आता है और हमेशा कोई पैराग्राफ़ पढ़ते-पढ़ते बीच में ही पन्ना बदल देता है। पत्नि ने चैताल की दीवाल में बने ताखे पर चाय रखते हुये पूछा- अभी कहाँ निकलना है?
     ‘‘अरे जाओ न यहाँ से। माथा चाटती रहती हो।’’
     इतना बोल कर वह सिगरेट सुलगाने लगा। पत्नि वहीं अलगनी में टँगे कपडे़ उतारने लगी। अभी छिपकली दिवस निष्क्रियता में है। रात को जागती है, बस्सऽऽऽ...! अच्छा मूड, रात को ही होता है। सपने की बात रात में होती है।
     एक घन्टे बाद सुबोध नाश्ता कर पैन्ट पहन रहा था कि बाबूजी पूछ बैठे-
     ‘‘बोरिंग रोड जा रहे हो क्या?’’
     ‘‘नहीं, काहे?’’ - सुबोध बोला।
     बाबूजी कुछ बोले नहीं। वापस डायनिंग रूम में जाकर बैठ गये। कपडे़ पहन कर सुबोध वहीं से बोला-
     ‘‘जा रहे हैं ज़रा राजेन्द्र नगर। मृणाल शर्मा मनोहर जी से मिलने।’’
     बाबूजी प्रत्युत्तर में कुछ नहीं बोले। जब बाबूजी कुछ नहीं कहते तब उसकी बताने की इच्छा और ज़्यादा हो जाती है। पैन्ट का बटन लगाते हुये डायनिंग रूम में गया।
     ‘‘वो पुरुषोत्तम ने बुलाया है। टाईम ले रखा है मनोहर जी से। उन्होंने कुछ आश्वासन सा दिया था पिछली बार। बोले कि अपने प्रकाशक से बात करेंगे और पैसा नहीं लगने देंगे। उस प्रकाशन का मार्केटिंग अच्छा है इसलिये उसी से छपवाने का सोच रहे हैं।’’
     तभी बाबूजी बोले-
     ‘‘और तुम्हारा कविता संग्रह जो छापा था, समर प्रकाशन, वो नहीं छापेगा क्या? पिछली बार तो उसने तुमसे कहा था कि कविता संग्रह है इसलिये पैसा ले रहे हैं। उपन्यास या कहानी संग्रह होगा तो नहीं लेंगे।‘‘
     वह जूता लाने बरामदे पर चला गया। कुछ पलों बाद डायनिंग टेबल के पास लगी एक कुर्सी पर बैठ जूता पहनने लगा और बोला-
     ‘‘उसका न तो मार्केटिंग अच्छा है न नियत। मुझे तो ये भी नहीं पता कि कितना काॅपी छापा है। बस पचास काॅपी हमको दे कर निश्चिन्त हो गया। जब भी फोन किया तो उसने कहा कि एक भी नहीं बिकी। ये विश्वास करने लायक बात ही नहीं है। दुनिया में ख़राब से ख़राब किताब की भी कुछ न कुछ काॅपी बिक ही जाती है। मनोहर जी ने कहा है कि उनके प्रकाशक की बाज़ार पर पकड़ बहुत अच्छी है। कोई भी किताब हो पाँच-दस हज़ार काॅपी खपत करवा ही देता है।’’
     बाबूजी पालथी मार कर बैठे थे। थोड़ा आगे झुक गये और कुहनी को घुटने से टिका कर बाँये हाथ को ललाट पर रख कर बोले-
     ‘‘अरे! बहुत पेंच है इन सबों में। पटना युनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर होते तो तुम्हारा भी छपता। किसी लाॅबी में तो तुम हो नहीं। हज़ारों लिखने वाले हैं और पढ़ने वाला अब कोई नहीं है। अपनी रचना, अपनी संस्था, अपनी लाॅबी, अपना अवार्ड आपस में ही बाँट रहे हैं और एक दूसरे की पीठ थपथपा रहे हैं। कोई भोपाल की लाॅबी में है, कोई इलाहाबाद की लाॅबी में है तो कोई दिल्ली की लाॅबी में है। जी नहीं पाओगें साहित्य रच के। अपने लिये कुछ सोचो अब।’’
     ‘कुछ और सोचो!’ बस इसी के बाद सम्वाद ख़त्म या सम्वाद का दूसरा दौर शुरू। अगर शुरू हुआ तो सुबोध फिर चिल्लायेगा। लेकिन उसे मनोहर जी से मिलने जाना है। अभी इस बहस में पड़ना मुनासिब नहीं लग रहा है। बाबूजी अपनी जगह सही हैं। लेकिन उनका सही रहना साहित्य की दुनिया का कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि साहित्यकारों का जीवन साहित्य से नहीं बल्कि किसी और स्रोत से चल रहा है। सुबोध पिताजी को ग़लत होते देखना चाहता है और वो भी उनके जीते जी।
     अनिसाबाद में लाल मन्दिर के पहले उसकी मोटरसाईकिल, घुरघुरा के बन्द हो गई। गाड़ी रिर्ज़व में आई थी। अब तेल लेने बोरिंग रोड जाना पडे़गा। अनिसाबाद के दोनों पेट्रोल पम्प चोर हैं  आधा-आधी तो नहीं लेकिन कम से कम एक चैथाई किरासन तेल तो ज़रूर मिलाते हैं दोनो। धुँआ भी ज्यादा देने लगती है गाड़ी। इन्जन पेट्रोल के लिये बनाया गया है, किरासन तेल के लिये नहीं। पेट्रोल के लिये बना इन्जन किरासन तेल पूरी तरह जला नहीं पाता तो धुँआ निकलना लाज़िमी है। तेल का टैप रिज़र्व में कर किक मारने को हुआ कि विनोद यादव दिखा। एकदम चकाचक। पहली बार जूता पहने दिखा। इससे पहले हमेशा सैंडल या हवाई चप्पल में ही दिखता रहा था।
     ‘‘अरे सुबोध भाई! क्या हो गया?’’ - उसने चहकते हुये कहा -
     ‘‘बस रिर्जव में आ गया था। तुम इधर?’’
     ‘‘हाँ आये थे पोस्ट आॅफिस। सुकन्या सम्वर्धन योजना में पैसा डालने। बेटी आजे तीन साल की हुई है।’’
     ‘‘वाह! बढ़िया है! तब क्या चल रहा है आजकल?’’
     ‘‘वही सब! स्क्रिप्ट, कहानी, डाॅयलाॅग और क्या? अभी मुरली सिन्हा का दो फिल्म किये हैं। एक तो रिलीज हुआ चार महीना पहले- ‘प्रेम ना रही त कुछौ ना रही।’ और एक रिलीज होने वाला है। ऊ भी मुरलिये सिन्हा का है- ‘दीदी के देवर बड़का सयाना।’’
     फिर दोनों साथ चल पडे़। सुबोध को जी.पी.ओ. तक जाना था। रास्ते में विनोद अपनी लिखी फ़िल्मों की कहानी सुनाता रहा। सुबोध मुस्कुराता रहा। वही ठाकुर, वही हवेली, वही घास गढ़ने वाली की बेटी, वही नीची जात का लड़का और वही ठाकुर का आवारा, लड़कीबाज, दारूबाज बेटा। एक बार सुबोध ने शिवराम शानू को एक कहानी दी थी। शिवराम ने सुनने के एक सेकेन्ड बाद ख़ारिज कर दिया। उसने कहा कि गाँव के लिये ऐसी कहानी नहीं चलेगी। फिर सुबोध ने पूछा था -
     ‘‘कैसी कहानी चलेगी।’’
     ‘‘देखिये, आपको हम एक सिचुएशन देते हैं। उसको आप इन्लार्ज कीजिये। एक गांव है। उसमें एक गरीब किसान है, जिसकी एक बहुत सुन्दर बेटी है। उसी गांव में एक छोटे जात का लड़का है। बड़ा होनहार है... एक ठाकुर भी है... उसका एक बेटा है... दारूबाज... रंडीबाज़...लफुआ...!’’
     तब तक जी.पी.ओ. गोलम्बर आ गया और सुबोध की याददाश्त का वो कोना भी वापस चला आया जो शिवराम शानू एपिसोड में चला गया था। विनोद की गाड़ी चल  पड़ी है। काम मिलने लगा है। बतौर स्क्रिप्ट राईटर और कहानीकार, चार फ़िल्में और मिली हैं उसे। पिच्च से थूकने की आदत गई नहीं विनोद की। ओ.के. बाय बोलकर उसने पिच्च से थूका और अशोक सिनेमा की तरफ़ बढ़ गया। आजकल रिवाईव स्टुडियों में इन सबका जमावड़ा लग रहा है।
     सुबोध दस मिनट के बाद राजेन्द्र नगर पहुँच गया। पुरुषोत्तम अपने आॅफ़िस में था। बचपन का दोस्त। सुख का रहे न रहे लेकिन दुःख का साथी ज़रूर है। बहुत बड़ा आदमी हो गया पुरुषोत्तम लेकिन उस कृष्ण की तरह है जो अपने सुदामा जैसे मित्र की मदद के लिये हर समय तैयार रहता है। अभी पाँच बड़ी कम्पनी का डिस्ट्रीब्यूटर है। तीन-तीन मकान है। एक अपार्टमेन्ट है। दो स्कूल है लेकिन अपने दोस्त के लिये आज भी वही पुरुषोत्तम है जो अपनी बेरोज़गारी के दिनों में हुआ करता था।
     पुरुषोत्तम ने मृणाल शर्मा मनोहर के बेटे को फोन लगाया। अपने ही अपार्टमेन्ट के जिस फ्लैट में पुरुषोत्तम रहता है, उसी के उपर मनोहर जी सपरिवार रहते हैं। फ़्लैट में वह जानबूझ कर रहता है। अपार्टमेंट में सुरक्षा ज़्यादा रहती है। दो मकान किराये पर लगे हैं।                             एक में हाॅस्टल चलता है और दूसरे में एक कोचिंग। तीसरा मकान उसका आरामगाह है जहाँ वह केवल रविवार को जाता है।
     ‘‘पापा सोये नहीं हैं ना।’’
     उधर से मनोहर जी के बेटे ने कहा- ‘‘नहीं। आपलोगों का ही इन्तज़ार कर रहे हैं।’’
     फिर दोनों चल पड़े। पुरुषोत्तम की हिन्दी भी बहुत अच्छी है। कभी-कभी कुछ लिखता भी है लेकिन व्यापार की व्यस्तताओं के कारण बहुत समय नहीं दे पाता। वह सुबोध की आगे बढ़ते देखना चाहता है। ख़ासकर उसके भीतर के साहित्यकार को आगे बढ़ाने के लिये वह भरसक कोशिश भी करता रहता है। पिछले कविता संग्रह के लिये उसी ने पैसा दिया था। सुबोध की ज़िन्दगी में कुछ ऐसे मसले आते रहे कि तीन साल पहले छपे उस किताब का आज तक विमोचन भी नहीं हो पाया। एक बार वह विनित अग्रवाल से मिला भी था। विनीत ने विमोचन का कुछ ऐसा ख़र्च बताया कि उसकी हिम्मत टूट गई। कविता कोई नहीं पढ़ता अब। सौ, दो सौ काॅपी तो विमोचन में ही बँट जायेगी। विमोचन में आया हर अतिथि उस मुफ़्त की किताब का क़दरदान होता है, कम से कम घर ले जाकर रैक में सजा देने तक। फिर जब तक किसी बड़े कवि को नहीं बुलाया जाये तब तक मीडिया कवरेज़ भी ठीक-ठाक नहीं मिलेगा। संवाददाताओं और पत्रकारों को मुर्गा-दारू और गिफ़्ट की भाषा समझ में आती है। नगद की भाषा तो सर्वव्यापी रूप से समझ में आती है। नगद की भाषा में फ़ोनेटिक्स और इटमलाॅजी फेल हो जाती है। किसी व्याकरण की ज़रूरत नहीं होती। उच्चारण दोष भी नहीं लगता। नुक्ता नाम का यक्ष कोई सवाल नहीं पूछता। जोड़ने पर पता चला कि कम से कम लाख, डेढ़ लाख का ख़र्च है। वो भी साधारण रूप से विमोचन करवाने के लिये। एकदम सादा-सादी! और तब भी कोई गारन्टी नहीं है कि इस कविता संग्रह को एक मुक़ाम मिल ही जाये। इसके बाद दूसरा चक्रव्यूह शुरू होगा। समीक्षा और समालोचना का। कौन लिखेगा समीक्षा? सभी पत्रिका और अख़बार वाले दो-दो काॅपी लेकर अपने-अपने आॅफ़िस की लाइब्रेरी में रखवा देंगे। उसके लिये लगना होगा। खुशामद करनी होगी। एक नेटवर्किंग करनी होगी। डेस्क इडीटर को अनुगृहित करना होगा। ऐसा न हो कि एक समीक्षा आज छपी और दूसरी छः महीने बाद। इसका कोई फायदा नहीं। अगर तीन महीने के भीतर सभी महत्त्वपूर्ण पत्रिकाओं और अख़बारों में समीक्षा एक एक कर आती रहे तो आपका और आपकी किताब का कुछ हो सकता है।
     सुबोध उस समय मन ही मन बोला - ‘‘मुझ से तो रन्डी भली।’’ वह पुरानी हो जाती है तब लोग समीक्षा और आलोचना करते हैं। यहाँ पहले प्रयास से ही समीक्षा और समालोचना शुरू हो जाती है। अगर लेखक असक्षम है तो वो भी नहीं होता। बस परीक्षा और आलोचना होती है। समीक्षा और समालोचना तो नामवर लेखकें की किताबों की होती है।
     मनोहर जी के बेटे मुरलीकृष्ण ने दरवाज़ा खोला। पाँच मिनट बाद मनोहर जी बैठक में आये। पहले पुरुषोत्तम की तरफ़ देखा। दुआ-सलाम हुई। बड़ी अजीब बात नोटिस की सुबोध ने। एक सहज भाव के तहत नाई पहले नाई को देखता है और धोबी-धोबी को  चाहे वे नाई या धोबी आज जीवन का पहला ही काम  कर के क्युँ न आये हों लेकिन स्थापित हो चुके साहित्कार मनोहर जी नवोदित साहित्यकार सुबोध की तरफ़ देख भी नहीं रहे थे। सिर्फ पुरुषोत्तम से बतिया रहे थे। बर्फ़ कितना सहेगा। कभी न कभी उसको पिघल ही जाना है। दस मिनट के बाद मनोहर जी उसकी और देख कर बोले-
     ‘‘और क्या हाल है साहित्यकार?’’
     ‘‘जी बस ठीक है।’’
     ‘‘तब क्या हो रहा है? कैसा गयी परीक्षा।’’
     ‘‘चाचा जी परीक्षा क्या। बस बाबूजी की ख़ुशी के लिये थे सब कर रहा हूँ।’’
     ‘‘काहे, ऐसा काहे, बोलते हैं। नौकरी मिलने से किस बेरोजगार को दुःख होता है।’’
     पुरुषोत्तम से रहा न गया। ‘‘बात नौकरी की नहीं है चाचा जी। बात मन लायक नौकरी की है। क्या करेगा सचिवालय में असिस्टेन्ट बन के? नौकरी से परहेज़ नहीं है लेकिन काम साहित्य से जुड़ा हो तो कुछ मज़ा आये।’’
     ‘‘हाँ, ठीक है, लेकिन जो मिले पहले कर लेना चाहिये। है की नहीं? हम्हीं को देखिये। कहाँ से कहाँ आ गये। कहाँ दरभंगा में इतिहास का प्रोफेसरी करते थे और रिटायर हुये राजभाषा विभाग से। तनखा मिलते रहता है और पेट भरा रहता है तो हर समय कहानी सुझता है। बिहार गौरमेंट में कामे कितना करना पड़ता है। एक बार पाँव जमा लीजिये फिर करते रहिये साहित्य सृजन।’’
     सुबोध को ऐसा लगा कि दूर कहीं एक पलंग अपने ही बोझ से चरमरा रहा हो। अन्दर से यह आदमी नौकर है और बाहर से सृजनशील तभी आज तक फणीश्वर नाथ रेणु के कैनवाॅस से निकल नहीं पाया। हर कहानी, हर उपन्यास में एक ही शिल्प, एक ही तरह का कथानक, रेणु की तरह की ट्रीटमेन्ट और उन्हीं के तरह के चरित्र। कितना पीछे है यह आदमी। अपनी ही बोझ से चरमराया हुआ है फिर भी सम्पादक और प्रकाशक इसी को छापते हैं। कैसी बिडम्बना है कि इतना प्रसिद्ध साहित्यकार रेणु की छाया से बाहर आ ही नहीं पाया। पद का लाभ खूब उठाया इन्होंने। दिल की आवाज़ बड़ी दूर तक जाती है। इनका दिल बोल रहा है कि प्रोफेसर होने और राजभाषा विभाग में निदेशक होने से इनको पहुँच अच्छी मिली। सम्पादकों और प्रकाशकों को अनुगृहित करने के अनेकों अवसर मिलें।
     तब तक चाय आ गई।
     ‘‘खैर, छोड़िये इ सब। कुछ लिखे हैं कि नहीं इधर, कविता के अलावा।’’ मनोहर जी सोफ़े पर लेटते हुये बोले।
     ‘‘हाँ, इधर बहुत कुछ। एक कविता संग्रह, एक कहानी संग्रह कम्पलीट है। इधर व्यंग्य में हाथ लगाये हुये हैं।’’
     ‘‘अच्छा, लाये हैं कुछ।’’ मनोहर जी उठ कर चाय लेते हुये बोले।
     ‘‘हाँ! कुछ व्यंग्य लाये हैं।’’ सुबोध ने साथ लाये पाॅलिबैग से ए-फ़ोर के आकार का एक टाईप किये हुये काग़ज़ का बन्डल निकालते हुये कहा।
     ‘‘किस तरह का व्यंग्य है।’’ मनोहर जी चाय की पहली चुस्की लेते हुये बोले।
     कन्टेम्प्रोरी है। छोटा-छोटा है। तीन-तीन, चार-चार पेज़ का। सोशल पाॅलिटिकल, सब है इसमें। अमेरिका का चाल चलन भी है। मोदी, केजरीवाल, लालू, नीतीश भी है। अतरंगी लोगों का अतरंगी व्यवहार भी है।’’
     ‘‘कोई सुनाईये एक छोटा सा।’’-मनोहर जी गम्भीर होकर बोले।
     सुबोध व्यंग्य छाँटने लगा। बड़ा मुश्किल होता है कोई एक चुन के सुनाना। जिसने लिखा हो, उसके लिये चुनना तो और भी मुश्किल होता है। फिर भी उसने एक लेख चुना- ‘बकरी चढ़ी पहाड़ पर’ और सुनाना शुरू किया। तभी मनोहर जी के लड़के मुरली का मोबाईल बजा और वह उठ कर भीतर कमरे में चला गया। मनोहर जी बोले -
     ‘‘शुरू कीजिये।’’
     ‘‘मुरली जी को आ जाने दीजिये। वो भी सुनेंगे तो अच्छा रहेगा।’’ सुबोध उनकी ओर देख कर मुस्कुरा के बोला। तब मनोहर जी थोड़ा अनमनयस्क से बोले-
     ‘‘अरे छोड़िये, ऊ क्या सुनेगा। समझता कूच्छो नहीं है और बोलता बहुत है। हिन्दी लेकर तीन बार यू.पी.एस.सी. क्या दे दिया है, अपने को हजारी प्रसाद द्विवेदी समझता है।’’
     सुबोध शुरू हो गया - ‘बकरी चढ़ी पहाड़ पर।’ एक पन्ना ख़त्म होने के बाद मुरली भी वापस आया और बैठ कर सबके साथ-साथ सुनने लगा। थोड़ी देर में चाय और व्यंग्य एक साथ ख़त्म हो गये। सुबोध बीच-बीच में तीनों से निगाहें मिलाता रहा ताकि पता चलता रहे कि दिलचस्पी ख़त्म तो नहीं हो रही। तीनों के चेहरे पर मुस्कुराहट और हँसी के बीच का भाव था। थोड़ा भी बढ़ जाये तो हँसी और थोड़ा भी घट जाये तो मुस्कुराहट।
     मनोहर जी पुरुषोत्तम की ओर देख कर बोले-
     ‘‘बहुत अच्छा है। क्या कहते हैं आप?’’ लेकिन पुरुषोत्तम के कुछ कहने से पहले ही मुरली बीच में बोला - ‘‘अच्छा, आपको ऐसा नहीं लगता कि आपने इसमें बहुत सी बातों का समावेश कर दिया है?’’
     ‘‘तो, ये तो अच्छी बात है न।’’ पुरुषोत्तम बोला। मुरली, पुरुषोत्तम  का मुँह देख कर मुस्कुराया।
     ‘‘नहीं, मेरा कहने का मतलब बात कहाँ से शुरू हुई और कहाँ पे ख़त्म हुई। ख़त्म तो ठीक हुई। बात का मतलब भी समझ में आया। लेकिन वो पन्चतन्त्र सरीखा प्रीफ़ेस, फिर बाद में केजरी, मोदी और भी न जाने क्या क्या...। मतलब, थोड़ी बातें छोड़ी जा सकती थी इसमें।’’
     मनोहर जी थोड़ा उबा हुआ सा भाव लेकर मुरली को देखने लगे।
     ‘‘एक्चुअली, आप पहला पेज़ मिस कर गये थे इसलिये। पन्चतन्त्र टाईप की कहानी से जो शुरूआत हुई थी उसे आपने बीच से सुना और वैसे भी आप देखिये, हर न्यूज़ चैनल पर एक चार लाईन के न्युज़ को चार घन्टे तक दिखाया जाता है। फिर रात में रिपीट टेलिकास्ट भी किया जाता है। लोग, ख़ासकर के राइटर्स एकदम अपंग जैसे होते जा रहे हैं। किसी के पास नया काॅन्टेन्ट नहीं है। एक ही काॅन्टेन्ट को नये-नये मसाले में लपेट कर परोस रहे हैं और एक मेरा दोस्त है, जो एक काॅन्टेन्ट में, एक ब्लाॅग में या एक लेख मैं सौ पहलुओं पर विचार कर ले रहा है। हर बार एक नई चीज़ ला रहा है। इसमें ख़राबी क्या है?’’ पुरुषोत्तम ने इतनी देर में पहली बार बेचैनी से कहा।
     तब मनोहर जी मुरली को और देख कर बोले- ‘‘तुमको याद है उसका, ऊ सुनील प्रभाकर।’’
     मुरली एकदम से चहक कर बोला - हाँ, हाँ, वही न, जो बंगलोर चले गये।’’
     तब मनोहर जी सुबोध की ओर देखते हुये बोले- ‘‘एक्चुअली, आप बहुत एक्सपेरीमेन्टल टाईप के लेखक हैं। आपकी राइटिंग में ढ़र्रा नहीं होता है। आपकी कविता की किताब हम पढे़, बेजोड़ एक्सपेरिमेन्ट है उसमें भी। आपकी वो दोनों कहानियाँ भी पढे़, जो आप दे गये थे। उन दोनों में भी एक्सपेरिमेन्ट हैं। अभी जिसका नाम लिये, सुनील प्रभाकर, वो भी वैसा ही राईटर था। तरह-तरह का एक्सपेरिमेन्ट करता था! अच्छा लिखता था। आपका ट्रीटमेन्ट भी अलग तरह का रहता है जैसा सुनील प्रभाकर का रहता था।’’
     सुबोध और पुरुषोत्तम एक दुसरे को देख कर मुस्कुराये।
     ‘‘दिक्कत क्या है सुबोध जी कि जो आप लिख रहे हैं, वो अभी हिन्दी साहित्य का स्तर नहीं है। ये स्तर आयेगा, लेकिन दस पन्द्रह साल के बाद। अभी एकदम स्ट्रेट फारवर्ड कहानी चलती है। स्ट्रटे फारवर्ड व्यंग्य चलता है। मन मार के रिपोर्टर जैसा लिखना पड़ता है। पाठक है ही नहीं अब। इतना टेन्सन है लोगों के जीवन में कि कोई दिमाग नहीं लगाना चाहता। पढ़ा, समझा और भूल गये। फिर वैसा ही कुछ पढ़ा, समझा और भूल गये। आपका कैनवास बड़ा है। सोच में मार्डनिज्म बहुत ज्यादा है। अब जो साहित्य पढ़ने वाले बचे हैं उनमें से नब्बों लोगों को आपका वो सब लिखा समझ में नहीं आयेगा, जो आप इस व्यंग्य में यूज किये हैं।’’
     मुरली बीच में बोला - ‘‘हाँ, वो जो तुलना है सेलेराॅन प्रोसेसर वाला और वो वाला कि फ़ेसबुक पर लाॅगिन किये, थोड़ा गीला किये थोड़ा सूखा किये और लाॅग आऊट हो गये वाला।’’
     मनोहर जी बीच में बोले - ‘‘हाँ ऐसा ही सब। अब हम्हीं नहीं जानते हैं कि सेलरौन क्या है, प्रोसेसर किसको कहते हैं और लाॅग इन, लाॅग आऊट क्या होता है जबकि हम दिन रात पढ़ते ही रहते हैं। महीना में तीस-पैंतीस गो मैगजीन मंगाते हैं सब पढ़ जाते हैं।’’
    पुरुषोत्तम असहज हो रहा था। सुबोध मुँह पर निर्विकार भाव लिये तो था लेकिन अन्दर से बैचैन हो रहा था। कैसे राईटर हैं ये। अपडेट रहने का मतलब नहीं समझते। अगर कोई रिटायर्ड पेन्शनधारी सेनसेक्स, डीमैट, क्वारनटाईन, सेलेराॅन, आई-सेवन, एच-फाईव-एन-वन, पी.सी., फ़ेसबुक का मतलब न समझे तो माफी के लायक है लेकिन एक आदमी जो खुद को राईटर कहता है और जिनको दुनिया पढ़ती है और अनुसरण करती है अगर वो न समझे तब तो हिन्दी साहित्य की दुनिया सचमुच ख़तरे में हैं। उस हिसाब से तो सही में हम अंग्रेजी साहित्य के पिछलग्गु हैं और यही हिसाब रह गया तो हम सदियों तक पिछलग्गु ही रह जायेंगे। पाठक हैं नहीं या पाठक को हिन्दी साहित्य से विरवत किया जा रहा है? अभी भी जर, जोरू, ज़मीन और राजनीति से हट के लिखने वाले बहुत कम हैं और कुछ रिश्तों पर लिखने वाले हैं। एकदम फ़ाॅरमेट में लिख रहे हैं लेखक। जहाँ कहानी में तकनीक की बात या इन्टरनेट की बात हुई नहीं कि आलोचक, समालोचक, परीक्षक, समीक्षक उस तीसरे क्लास के बच्चे की तरह छटपटाने लगते हैं जिससे विद्यालय निरीक्षक ने संवेग के संरक्षण का सिद्धान्त पूछ दिया हो। न तो लेखक अपडेट हो रहा है न ही समालोचक। वही ठाकुर, वही उसकी रखैल, वही रखैल की बेटी, बेटी का मन्त्री बनना, ठाकुर के बेटे का सप्लायर बनना, लड़की या लड़के में से किसी एक का नीची जाती का होना। हर कहानी में एक औरत का एंगल चला ही आता है। एक लेखक का सृजन मसालों पर क्यूँ निर्भर होता जा रहा है, समझ के नहीं आता, वो भी वही आठ दशक पुराने मसाले। फिर भी शिकायत है कि पाठक नहीं हैं। कहाँ से रहेंगे पाठक। नई सोच और नई क़लम को जगह मिल नहीं रही। टाइपराईटर के ज़माने के लेखक बदस्तूर वमन करने में लगे हैं। संगीत बदल गया है, लिबास बदल गया है, सोच बदल रहीं है। भारत में लगभग सनतानवे करोड़ लोग मोबाईल का इस्तेमाल कर रहे हैं और उनमें से इक्कीस करोड़ लोग मोबाईल पर इन्टरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं। घड़ी की उपस्थिति विलुप्तप्राय प्राणी की तरह हो गई है। चिट्ठी लिखे और पढे़ ज़माना हो गया है। इन्टरनेट, हर शहरी आदमी के जीवन में दस्तक दे चुका है और अब भी वही ठाकुर, उसका रंडीबाज़ बेटा, नीची जात की लड़की, जातिय संघर्ष। सच तो यह है कि किताब खरीदने वाला और मजबुरी के अलावा कुछ पढ़ने वाला, ख़ास कर साहित्य, सर्वहारा वर्ग से है ही नहीं। कौन पढ़ता है साहित्य? कौन किताब में पैसे ख़र्च करता है ये विचार करने वाली बात है? अब जो वर्ग किताब के लिये पैसे ख़र्च कर रहा है उसको आप आठ दशक से चले आ रहे फ़ार्मेट को नये-नये मसाले में लपेट के परोस रहे हैं। तब वो क्यूँ पढे़गा? वो तो आॅडियो-विज़ुअल माध्यमों की तरफ़ भागेगा ही और आप शिकायत करते हैं कि पाठक नहीं है। हैं पाठक, लेकिन अब वो आॅडियो-विज़ुअल माध्यमों की तरफ़ और अंग्रेजी साहित्य की तरफ़ प्रयाण कर रहे हैं। एक्सपेरीमेन्ट का मज़ा ले रहे हैं। जब रूपया लगाना ही है तो बासी में क्युँ लगायें। अगर काॅलेज़, स्कूल, विद्यालय, महाविद्यालय और सरकारी संस्थाओं में किताबें खपाने का प्रचलन बन्द हो जाये तो किसी भी लेखक की पाँच सौ किताब भी नहीं बिक पायेगी और अगर बासी ही पढ़ना है तो प्रेमचन्द जैसे लाजबाब लेखकों की कृति तो हर महीने पुर्नमुद्रित हो रही रही है। सेलेब्रिटी फ़ैक्टर भी कोई चीज़ होती है कि नहीं।
     ‘‘चाचा जी, मैं आपकी बात पर गर्वान्वित महसूस करता हूँ।’’ सुबोध थोड़ा आगे झुक कर बोला। मनोहर जी उसे ध्यान से देखने लगे।
     ‘‘मान लीजिये मैं सबकी तरह लिखता, जैसा सब लिख रहे हैं तो आप ही कहते कि सुबोध, तुममें नया क्या है जो तुम छपोगे। तुम जो लिख रहे हो, वैसा तो लोग पहले से लिख रहे हैं। तब तुम्हारे लिये जगह कौन बनायेगा। आज मैं अलग ढंग से लिखता हूँ, एक्सपेरीमेन्ट करता हूँ, तभी तो आप थोड़ी सी रूचि ले रहे हैं। आपको भी कुछ नया-नया सा लग रहा है। मैं भी सभी की तरह लिखता तो आप ही कहते, देखो फ़लाने की तरह लिखता है। मुझे किसी अलाने-फ़लाने की तरह नहीं लिखना है। मुझे अपनी तरह लिखना है। नये पाठकों के लिये लिखना है। मैं ये नहीं कहता कि मेरी कहानी में औरत का एंगल नहीं होगा। मैं ये भी नहीं कहता कि मेरी कहानी शोषित और सर्वहारे वर्ग पर नहीं होगी। बिल्कुल होगी। लेकिन मैं इसलिये नहीं लिखुँगा कि बाक़ी सब ऐसा ही लिख रहे हैं तो मुझे भी लिखना चाहिये बल्कि तभी लिखुँगा जब मेरे सामने ऐसा कुछ घटेगा जिसकी गवाही मेरा दिल और दिमाग़ दोनों देगा।’’
     ‘‘हम कहे थे न’’ मनोहर जी बीच में बोले और पुरुषोत्तम की ओर देख कर फिक्क से मुस्कुरा दिये। तभी मुरली बोला-
     ‘‘सुबोध जी, मुझे लगता है कि आपका व्यंग्य तो ठीक था लेकिन उसमें हास्य का पुट कम था। आप हास्य क्युँ नहीं लिखते हैं।’’
     पुरुषोत्तम बोला- ‘‘हास्य भी लिख सकता है लेकिन तब आप कहते की व्यंग्य क्युँ नहीं लिखते। हर लेखक को वही लिखना चाहिये जो वह लिखना चाहता है। पाठक क्या चाहता है यह सोच कर लिखा जा रहा है तभी तो हिन्दी साहित्य का स्तर बढ़ नहीं रहा है। साहित्य केवल मनोरंजन नहीं है। एक संस्कार है। शिक्षा का एक पूरक अंग है। शिक्षा के इस माध्यम को इतना भी लाचार नहीं बना देना चाहिये कि कुछ दिन बाद पाठक बैठ कर लिखवाने लगें। पाठक साहित्य की दशा पर चिन्ता कर सकते हैं लेकिन दिशा तय करना उनका काम नहीं है। अगर पाठक दिशा तय करने लगे तब हो चुका साहित्य का उद्धार। मैं मानता हूँ कि पाठक को मनोरंजन चाहिये, लेकिन साहित्य की अस्मिता और अस्तित्व के बदले तो क़तई नहीं।’’
     कुछ देर कमरे में चुप्पी छाई रही। सब ऐसे सर को झुका कर हल्के-हल्के हिला रहे थे मानों कुछ सोच रहे हों। दो लोग बात काटने के बारे में सोच रहे थे और दो लोग बात बनाने के बारे में सोच रहे थे। तभी मनोहर जी पुरुषोत्तम की ओर देखते हुये बोले -
     ‘‘अरे, वो पारस पत्रिका का सम्पादक आपके बारे में पूछ रहा था। उसके बाद कोई आर्टिकल दिये नहीं आप।’’
     तभी मुरली बोला -
     ‘‘हाँ, पुरुषोत्तम जी! आप का वो लेख लाजवाब था। आप रेग्यूलर काहे नहीं लिखते हैं। बहुत अच्छा लिखते हैं आप। परसो हमको जाना भी है उनसे मिलने। अगर कल शाम तक कोई आर्टिकल हो जाये तो हमको दे दीजियेगा। हम दे आयेंगे।’’
     पुरुषोत्तम, सुबोध को देख कर हल्के से मुस्कुरा दिया। कैसा खेल है? जिसके पास लिखने का समय नहीं है उससे आग्रह पर लेख माँगा जा रहा है- आर्टिकल आॅन डिमान्ड! और जो साहित्य के लिये सब कुछ क़ुर्बान कर चुका है उसकी छीछालेदर की जा रही है। पुरुषोत्तम, जिसके पास समय नहीं है और उनके हिसाब से सुबोध, जिसका साहित्य वर्तमान स्तर से दस-पन्द्रह साल आगे है, दोनों एक ही तीर में धाराशायी। एक लिखेगा नहीं और दूसरे को मौक़ा ही नहीं देना है। उसने कहा -
     अच्छा चाचा जी, ये आया था अपनी कहानी संग्रह के बारे में बात करने। ज़रा प्रकाशक को एक दिन बुलवाते।
     मनोहर जी मुरली की तरफ़ देखने लगे। मुरली बोला-
     ‘‘कुछ पैसा-वैसा तो लेंगे ही सुशील जी? हमको नहीं लगता है कि बिना पैसा लिये छापेंग।े’’
     मनोहर जी बोले- ‘‘हाँ, ऊ त लेवे करेगा। लेकिन इ देंगे कहाँ से।’’ फिर पुरुषोत्तम की ओर देख कर बोले- ‘‘है कि नहीं, बेरोज़गार आदमी पैसा कहाँ से देगा, आप ही बताईये।’’
     तभी मुरली हँसते हुये बोला -
     ‘‘अरे! वैसा वाला बेरोज़गार भी नहीं हैं सुबोध जी, एक किताब छपवाना इनके लिये बाँये हाथ का खेल है।’’
     तब मनोहर जी बोले-
     ‘‘अच्छा आप उसका नम्बर लीजीये। कल नौ से दस के बीच में फोन कीजियेगा। कहियेगा कि मनोहर जी नम्बर दिये हैं। बोले हैं कि छापा जा सकता है। आप चाहें तो अपने किसी आदमी से समीक्षा करवा लें और कह दीजियेगा कि हम पैसा नहीं दे सकते हैं।’’
     पुरुषोत्तम फिर सुबोध को देख कर मुस्कुराया। पिछली बार यही मनोहर जी थे जिन्होंने आश्वासन दिया था। यही मनोहर जी थे जिन्होंने कहा था कि प्रकाशक को घर पर बुला कर सुबोध से मिलवा देंगे। छापेगा कैसे नहीं। आज वही ढ़ाई घर कूद कर बोल रहे हैं। उस दिन वज़ीर बन कर बात कर रहे थे और प्रकाशक सुशील के संघर्ष के दिनों में दी गई अपनी मददों के बारे में बताते अघा नहीं रहे थे।
     सुबोध का मन छोटा हो गया। ऐसे रिकमेन्ड करने का क्या अर्थ होता है, वह अच्छे से देख चुका है। ऐसे लग्गी वाले रिकमेन्डेशन को वह पचासों बार जी चुका है। एक दर्जन बार अपमानित हो चुका है।
     उसके बाद साहित्य की दशा और दिशा पर चर्चा होने लगी। मनोहर जी बीच-बीच में अपनी कहानियों का हिस्सा सुनाते रहे। मुरली यथावत लीक से हट कर प्रश्न करता रहा। सुबोध भीतर से तप रहा था। कुछ ऐसा हुआ कि बातचीत का सिरा सुबोध के हाथ में आया और उसने कहना शुरू किया-
     ‘‘हज़ारों वर्ष पहले पृथ्वी पर नागों का शासन था। इसे एक लोक कथा समझिये। लेकिन वे दिन में बाहर नहीं निकलते थे। कारण थे पक्षी। पक्षियों की संख्या उनके जितनी तो नहीं थी लेकिन हवा में उड़ पाने के कारण वो नागों पर भारी पड़ते थे। तब नागों के राजा ने नागदेवता की तपस्या शुरू की। नाग देवता प्रकट हुये और बोले- बेटा, हम तुमलोगों की समस्या से अनजान नहीं हैं। हम जानते हैं कि दिन में तुमलोग पक्षियों के कारण बाहर नहीं निकलते हो और रात में अन्धेरा होने के कारण शिकार करने में कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। तुम्हारी उम्र अभी सनतानवे साल है। जिस दिन तुम सौ साल के हो जाओगे उस दिन तुम्हें स्वयं ही इसका समाधान मिल जाये। नागराज थोड़ा आश्वस्त हुआ कि चलो तीन साल बाद समस्या सुलझ जायेगी। जिस दिन नागराज सौ साल का हुआ उसी रात उसके सर पे एक मणि प्रगट हो गई। मणि में इतना प्रकाश था कि लगता था साक्षात चन्द्रमा उसके साथ चल रहे हैं। नागों के जीवन में बहार आ गई। रात का अन्धेरा उनके लिये कोई समस्या न रहा लेकिन दुर्भाग्यवश नागराज के मन में अहंकार समा गया। उसे लगा कि उसकी मणि के कारण ये सब जी खा रहे हैं वरना ये तो मर ही जाते। कुछ नये-नवेले नाग नई विचारधारा के थे। जीवन में नई पद्यति लाना चाहते थे। शिकार का नया तरीकीबों को आज़माना चाहते थे। गाहे बगाहे उनकी नागराज से बहस भी हो जाती थी। अहंकार के मद में चूर नागराज इस बात से और चिढ़ गया और एक शाम चुपचाप उसने मणि को सर से उतार कर अपने फन से ढँक दिया। साँपों को मणि की रोशनी में शिकार करने की आदत पड़ गई थी सो वे व्याकुल हो उठे। इस व्याकुलता के आलम में हज़ारों साल बीत गये। उधर नागराज मणि को अपनी ज़रूरत भर निकालता रहा और छुपाता रहा। उनकी दुनिया कमज़ोर होती गई लेकिन नागराज पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। वह तो अपने पुराने तरीके से चलना चाहता था। मणि को वह अपने तरीके से इस्तेमाल करना चाहता था। अन्ततः उसकी दशा भी अन्य नागों की तरह ही हो गई लेकिन वह कुछ नहीं कर सका क्युँकि तब तक रात में शिकार करने वाले पक्षी अस्तित्व में आ गये थे।’’
     इतना बोल कर सुबोध ने पुरुषोत्तम, मनोहर जी और मुरली को बारी-बारी से देखा।
     मुरली से रहा न गया। बोला -
     ‘‘इस कहानी का अभिप्राय समझ में नहीं आ रहा है सुबोध जी और कहानी अधूरी भी लगती है।’’
     सुबोध सोफ़ा पर थोड़ा पीछे लद गया और बोला- ‘‘मुरली जी, कहानी अधूरी नहीं है, पूरी है। हमलोग अभी साहित्य की दिशा और दशा पर बात कर रहे थे। ये कहानी उसी संदर्भ में है। जो नागराज है वो पुराने साहित्यकार हैं। पास में मणि है लेकिन दूसरे को राह नहीं दिखायेंगे। उसका इस्तेमाल अपने पुराने और आउटडेटेड लेखनी के साधन में करेंगे और कहानी में जो विद्रोही नाग हैं, वो नये लेखक हैं। नये रास्तों पर चलना चाहते हैं। लेकिन प्रकाश के अभाव में न तो उन्हें कोई रास्ता मिल रहा है न ही कोई दरवाज़ा, जहाँ से वे साहित्य की प्रोफ़ेश्नल दुनिया में घुस सकें। पक्षियों के बारे में इतना कहुँगा कि वो इन्फोटेनमेंन्ट के अन्य साधन हैं जो साहित्य के काॅन्टेन्ट को निगल जा रहे हैं, क्युँकि उन्हें उड़ना आता है। अगर मैं वैसा साहित्य लिख पा रहा हूँ जो दस साल बाद लिखा जाना है तब तो मैं बाक़ी साहित्यकारों से आगे देख सकता हूँ, आगे सोच सकता हूँ। फिर मुझे मौका क्युँ नहीं मिल सकता। अगर मैं साहित्य के वर्तमान स्तर को दस साल आगे ले जाने की क्षमता रखता हूँ तो इसमें बुरा क्या है। लोग मेरे जैसे लेखकों की लेखनी से नहीं जुडे़गे या नहीं समझ पायेंगे ये पहले कैसे मान लिया जा रहा रहा है। इतना संदेह क्यूँ? पुरानी चीज़ों को ढ़ोते रहने का मोह क्यूँ? नये कोपलों की पत्तियाँ बनने से पहले ही इतनी निन्दा क्युँ? और तब भी आप साहित्य की दशा और दिशा पर व्याख्यान का आयोजन कर रहे हैं। इसकी तो कोई दिशा हो ही नहीं सकती। क्युँकि यह दुनिया अब विजनलेस होती जा रही है। दूरदृष्टि रखने वाले साहित्यकारों को दुरदुराया जा रहा है। चालीस साल से चली आ रही कहानियों को फ़ार्मेट बदल-बदल कर परोसा जा रहा है। कोई रेणु जैसा लिख के प्रसिद्ध हो रहा है और छापा जा रहा है तो कोई कृष्ण बलदेव वैद्य और भीष्म साहनी जैसा लिख कर धन्य हुआ जा रहा है। जहाँ आगे सोचने वालों की जगह ही नहीं हैं, उसकी दिशा की तो बात ही बेमानी है। आज दस करोड़ लोग फ़ेसबुक का इस्तेमाल कर रहे हैं। ढ़ाई करोड़ लोग ट्वीटर का इस्तेमाल कर रहे हैं। तब भी पुराना साहित्यकार स्टेटस अपडेट का मतलब नहीं समझता। आज हिन्दुस्तान में करोड़ों लोग ई-मेल का इस्तेमाल कर रहे हैं और आधे से ज़्यादा पुराने साहित्यकारों को ई-मेल सर्विस का इस्तेमाल करना नहीं आता। वास्तव में हैं वो पीछे लेकिन नये साहित्यकारों पर ज़रूरत से ज़्यादा आगे रहने का दोष मढ़ दे रहे हैं।’’
   पुरुषोत्तम उसका चेहरा देख कर मुस्कुरा रहा था। मनोहर जी को अच्छा नहीं लगा। मुरली सर झुकाये अपने पैरों को देख रहा था। तब पुरुषोत्तम ने कहा-
     ‘‘अच्छा चाचा जी, इसको एक जगह काम से जाना है। अब निकलते हैं हमलोग। आपका भी स्नान ध्यान का समय हो ही गया है। कल ये प्रकाशक से बात करेगा, फिर आप जैसा कहियेगा कर लेंगे।’’
     मनोहर तुरन्त जी उठ खडे़ हुये जैसे उनके जाने का ही इन्तज़ार कर रहे थे।
     दिन तो इधर-उधर की भागदौड़ में गुज़र गया। शाम में बच्चे बीबी ने वक़्त ले लिया। जब सब सो गये तब सुबोध लिखने बैठा। ग्यारह बज रहे थे। चार बजे कहानी पूरी हो गई। तभी बाबूजी पेशाब करने उठे। सुबोध के स्टडी रूम की जलती बत्ती देख झाँकने चले आये। सुबोध के हाथों में क़लम थी और वह कहानी का शीर्षक सोच रहा था। क्या शीर्षक अच्छा होगा इस कहानी का। ‘साँप की मणि’, नहीं... ‘अभागी कोपलें’ या फिर ‘पूर्वाग्रह’। कुछ भी नहीं जँच रहा था उसे। बाबूजी उसपर एक नज़र डाल कर बाथरूम चले गये। सुबोध काॅपी बन्द कर स्टडी रूम में लगे पलंग पर लेट कर सोने की कोशिश करने लगा। कब आँख लगी, मालूम नहीं।
     सुबह सभी छोटी बड़ी प्राकृतिक शंकाओं से निवृत होकर सुबोध डायनिंग टेबल पर आ बैठा। बाबूजी बगल में लगी चैंकी पर बैठ कर अख़बार पढ़ रहे थे। माँ नाश्ता निकालने लगी। बाबू जी ने पूछा- ‘‘कल मनोहर जी के यहाँ क्या हुआ?’’
     सुबोध ने पूरी घटना संक्षेप में सुना दी। बाबूजी ने अख़बार रख दिया और उसी तरह बाँये हाथ से ललाट को ढँककर आगे-पीछे डोलने लगे। कुहनी, मुडे़ हुये घुटने पर अड़ी थी। कुछ देर बाद बोले-
     ‘‘रात में चार बजे तक क्या कर रहे थे? इतना देर मत जगो बेटा। प्रथम सुख निरोगी काया। स्वास्थ्य से खिलवाड़ करना अच्छा नहीं है।’’ माँ नाश्ता ले आई। नाश्ता करने के बाद उसने प्रकाशक का नम्बर मिलाया। दो तीन पूरी घन्टी बजने के बाद भी उसने नहीं उठाया। दिन अभी कटना बाक़ी था। कुछ नया लिखने की इच्छा ही नहीं हो रही थी सो रात कटना भी बाक़ी था। अगले दिन उसने फिर फ़ोन किया लेकिन प्रकाशक ने नहीं उठाया। तब उसने एक मैसेज़ किया। आजकल टेलीमार्केटिंग करने वाले इतना फ़ोन करते है कि लोग अन्जान नम्बर नहीं उठाते, ख़ासकर व्यस्त लोग। चार दिन बीत गये। ना तो मैसेज़ का कोई जवाब आया और ना ही उसने काॅल बैक किया। चैथे दिन शाम में उसने पुरुषोत्तम को सारी बातें बता दी। पुरुषोत्तम क्या बोलता। उसने ढ़ाढ़स सा दिया और कहा-
     ‘‘कुछ लिखे इधर?’’ सुबोध ने कहा- ‘‘एक कहानी लिखे हैं , मनोहर जी से मिल के आने के बाद।’’
     ‘‘क्या टाईटल रखे हो ?’’ पुरुषोत्तम ने पूछा।
     ‘‘बहुत गन्दा टाईटल रखे हैं।’’- सुबोध ने मुस्कुराते हुये कहा।
     पुरुषोत्तम हँसने लगा और बोला- ‘‘अच्छा! क्या रखे हो, बता दो?
     सुबोध ने हँस कर कहा- ‘‘मुझ से तो रन्डी भली!’’ 

(मेरे साथ घटी और घाट रही सच्ची घटनाओं पर आधारित )
निर्मल अगस्त्य 
पटना, बिहार 

Sunday, March 22, 2015

‘‘एक अकेला इस शहर में-गोलघर पर पहला शॉट!’’


                         ‘‘एक अकेला इस शहर में-गोलघर पर पहला शॉट!’’

                                                                             ‘‘निर्मल अगस्त्य’’



लोकाचारी निभाना कितना जटिल होता जा रहा हैे! है न...? और हमेशा की तरह मेरी बात महफिल के मुँह में हवा मिठाई की तरह छू-मन्तर हो गई। करीबी मित्र ने नयी कार ली थी सो बधाई देने वालों की भीड़ में मैं भी शामिल हूँ। आदतन नहीं, बल्कि मेरे कुछ युवा पत्रकार मित्र मुझे घसीट लाये हैं ताकि दो-चार पैग व्हिस्की और कुछ उन्मुक्त पलों का मजा मैं भी ले सकूँ। उन्हें मालूम है कि मेरा घर कुछ समयातीत लेकिन पावन संस्कारों का पुलिन्दा है जिसकी गाँठ को पिताजी हर वक्त कसने में लगे रहते हैं।


सिहरा कर चली जाती है उस साल के उस महीने की याद। केन्द्र ने चार दिन पहले तीन सौ छप्पन हटा लिया था। लेकिन हवा में अब भी वही अल्लहड़पन था। सभी पार्टियाँ अपने-अपने तरीके से प्रतिक्रिया व्यक्त करने और सहानुभूतियाँ बटोरने में जुटी हुई थीं। स्टेशन रोड की भीड़, बीत गये हर दिन की तरह अर्धबेहोशी में फूटपाथ पर उगी घास छीलने और धूल उड़ाने में व्यस्त थी। किसी के चेहरे पर प्रजातन्त्र की बदहाली को कोई खास सबूत नहीं था। शंकर बिगहा बाले हादसे का लहू सूखा भी नहीं कि उस दिन जहानाबाद में सात लोगों को मौत की नींद सुला दिया गया। समाचार पढ़ कर लोगों की मुठ्ठियाँ नहीं भिंचती, आँखों में लहू नहीं तैरता, बल्कि अँगुलियाँ पृष्ठों को तेजी से पलट कर सर्राफा और जिन्स के भावों वाले पन्ने की ओर ले जाती हैं। क्या पता, प्याज फिर से अस्सी रूपये हो गया तो? सचमुच, प्याज उस देश के लिये एक बड़ा मुद्दा है जिसकी अखन्डता प्याज के परतों की तरह है। छीलते जाईये और रंग बदला-बदला सा देख भी जीते जाईये।            
प्याज सरकार पलट सकती है। रातों-रात टी.वी. के हजारों सेट बिकवा सकती है और सबसे गौरतलब बात तो यह है कि उस साल मेरे गाँव में एक शादी तक टूट गई क्योंकि लड़के वालों ने दहेज में दो सौ मन प्याज माँग लिया था।

ऐसे डरे और सहमे हुये हैं, चक्रवर्ती सम्राट, अशोक मौर्य की घरती के लोग। बेटा- बेटी, बूढ़े माँ-बाप, जवान बहू... अनेक विवशतायें हैं। क्या जाने बाबा की हजार बाहें लोगों को अपनी ओर बुलाती भी है या नहीं ?

       
  ‘‘देखोगे सौ बार मरूँगा, देखोगे सौ बार जिऊँगा
हिंसा मुझको थर्रायेगी, मैं तो उसका खून पिऊँगा
प्रतिहिंसा ही स्थायित्व है मेरे कवि का
जन-जन में जो उर्जा भर दे मैं उद्गाता हूँ उस रवि का।’’
(नागार्जुन- हजार-हजार बाँहों वाली से।)

इतिहास के पन्नों में पाटलिपुत्र अजर है। पर हमने कभी सोचा भी नहीं था कि माँ गंगा की गोद में बसा यह शहर आज संस्कृति की चौखट पर धूल-धुसरित हो औंधा पड़ा रहेगा। गुलाबों की नगरी, उदयिन  का सपना, अशोक का वैभव, किताबों की कैद में है और लोदीपुर के पास स्थित संग्रहालय में संग्रह-सुरक्षा के आक्सीजन पर जीवित तो है लेकिन कोमा में।

उस वक्त जब मेरी जवानी के दिन लगभग शुरू ही हुये थे, कुछ बड़े और खुले दिल के चौर्य-ज्ञानी युवा, महानगरों का ज्ञान थोड़ी-थोड़ी संस्कृति, फैशन और जीवनशैली दिल्ली, बम्बई, पुणे और बंगलोर जैसे शहरों से चुराने लगे थे और कर्ण की तरह पटना के युवाओं को दान करने में लगे थे। उनकी ही कृपा से शहर हिस्सों में बँटने लगा था। उधर कुछ वर्षों में पटना मार्केट, बोरिंग कैनाल रोड, मौर्या कॉम्पलेक्स और उससे सटे डाकबंगला रोड वाले इलाके, उच्च वर्ग से लेकर उच्च मध्यम वर्ग की सम्वेदनाओं को समेटने में लगे थे। स्टेशन के पास दुमंजिले पर लिट्टी और चन्द्रकला की दुकान, आर-ब्लॉक चौराहे के पास डाक-तार संगीत संस्था से सटी चाय की दुकान, निम्न मध्यवर्ग के लोगों की जमावट को पालते थे। मूल तौर पर दोनों क्रमशः पूंजीवाद और समाजवाद की वकालत करने वाले लोगों का समूह था। सिगरेट के धुँओं से निकले छल्लों के बीच अगर कहीं ‘मिस यूनीवर्स’ और ‘द मुअर्स लॉस्ट साइट’ का जिक्र होता है तो लगता था हम बोरिंग रोड या मौर्या कम्पलेक्स में हैं लेकिन जब केन्दू के पत्तों की गन्ध के बीच सुनाई पड़ता था-
‘‘अस्सी चुटकी नब्बे ताल
तब पूछो खैनी का हाल’’

और कहीं-कहीं ये भी सुनाई पड़ता था-
    ‘‘अस्सी चुटकी न दे ताल
रगड़ के खैनी मुँह में डाल’’

घुमा फिरा कर दो तरह के खाने वाले थे। एक, जो ताली मार कर रगड़ी हुई खैनी की धूल उड़ा देते थे और दूसरे जो बिना धूल उड़ाये केवल रगड़ के खाना पसन्द करते थे। अचम्भे की बात ये है कि आज सन दो हजार पन्द्रह ईसवी में भी यही दो प्रकार के खैनी खाने वाले लोग हैं। बदलाव के इस भयावह दौर में खैनी खाने का तरीका नहीं बदला। खैनी उन गिनी चुनी वस्तुओं में से है जो समाजवाद को जिन्दा रख सकता है।

बीच-बीच में हड़ताल और अतिक्रमण विरोधी कार्यवाईजन्य समस्याओं से बिगड़े फूटपाथी विक्रेताओं की देसी गालियाँ सुनाई पड़े तो यकीनन हम आर-ब्लॉक या दोमंजिले लिट्टी की दुकान में थे। मिला जुला के मध्यमवर्ग  कहीं का नहीं है। इन्हें दो पैग का नशा चढ़ा नहीं कि अरून्धती रॉय और जुबिन मेहता याद आते हैं और एक महीने तनख्वाह नहीं मिली तो बाबा नागार्जुन और प्रेमचन्द याद आने लगते हैं। मेरा मित्र अभी पायदान पर लटका हुआ है। क्या पता लोन पर लिये इस कार को खरीदने के बाद उपर चढ़ने में और ज्यादा दमखम और साहस का परिचय दे जाये। पार्टी में गहमा-गहमी तो नहीं थी लेकिन गाने की आवाज ज्यादा होने से लग रहा था कि हम मेले में धीरे-धीरे बढ़े जा रहे हैैंं। तभी एक कोने से हुर्रे की आवाज से हम सभी चौंके। देखा चार लड़के जीवन को कन्धे पर उठा कर चिल्ला रहे थे। धीरे-धीरे पता चला कि जीवन जिस लड़की को फांसने में अपने सारे अनुभव खर्च कर चुका था, उसी लड़की ने उस दिन एक अखबार में उसके नाम खुला संदेश दिया था। ओह्! उस रोज ‘वैलेन्टाइन्स डे’ था। मैं जैसे नींद से जागा।
     

कभी फुर्सत मिली तो जीवन से वैलेन्टाइन का मतलब पुछूँगा। वह भी तीन साल तक दिल्ली के सातों घाट का पानी पी कर लौटा है। हम सभी दोस्त इस पार्टी में अपने होने की सही वजह तलाश रहे थे।
बहरहाल उस दिन जिस दरम्यान मेरी जवानी के दिन लगभग शुरू ही हुये थ, रैपिड एक्शन फोर्स वालों की पटना के मुख्य मार्गों पर पुरजोर हुकूमत रही। लेकिन मजे की बात देखने को यह मिली की पूंजीवाद के प्रतिनिधित्व करते सारे इलाके खामोश रहे। दुकाने बन्द थीं, जगह-जगह नियॉन बल्ब और ग्लो साइन्स के रेजे फूटपाथ पर ही बिसरा दिये गये पदचिन्हों को चूम रहे थे। लेकिन स्टेशन रोड वाली लिट्टी-चन्द्रकला और आर. ब्लॉक वाली चाय की दुकान पर शाम होते ही यथावत गहमागहमी हो चली। केन्दू के पत्तों की गन्ध और खैनी के उड़ते चूरन से हवा में उठती सुरसुराहट के बीच, मैं और जीवन भी छुपते-छुपाते वहा पहुँचे और चाय सिगरेट का मजा लेने लगे। जीवन टेलीफिल्म को लेकर ज्यादा ही चिन्तित दिखा। कहानी, पटकथा, डॉयलाग, संगीत-निर्देशन और मुख्यपात्र की सारी जिम्मेदारी मेरे कंधे पर डालने के उपरान्त भी। पटकथा के अनुसार पहली ही सीन में मुझे गोलघर के बाहरी चबूतरे पर खड़े होकर ‘टाईटेनिक’ फेम ‘लियोनार्डो डी कैप्रियो’ की तरह बाँहों को फैलाकर आसमान समेटना था।

जीवन कई सालों से बिहार से बाहर रह रहा था और उसको समझाना बड़ा मुश्किल था कि पटना में रह कर आदमी कुछ नहीं समेट सकता, खासतौर पर उस मन्डल-कमन्डल के बीच चल रहे रस्साकशी के भयावह दौर में और खास कर कला के क्षेत्र में। दो चार नामों को अपवाद में लिया जाये तो पता लगता था कि अधिकांश लोग संगीत के नाम पर अच्छी खासी लूट मचा रहे हैं। सपने एकरंगे होते हैं- ‘मोनोक्रोम’। लेकिन उस दौर में जब मेरी जवानी के दिन लगभग शुरू ही हुये थे, महसूस हुआ कि सपने बेसूरे भी होते हैं, अगर आपकी ख्वाहिश संगीत के क्षेत्र में सुसंस्कृत बने रहते हुये कुछ कर दिखाने की है, वह भी इस शहर की बदल दी गई सभ्यता को आद्योपांत स्वीकार करते हुये। मेरी इस बात को कस कर थाम लिया जीवन ने और इसका पोस्टमार्टम कर टेलिफिल्म का नाम भी ढ़ूँढ़ लिया उसने -‘‘एक बेसूरा सा सपना।’’ 
नोट्रेडेम कम्युनिकेशन सेन्टर से सारी तकनीकी सुविधायें ली जानी थी और देखना यह था कि जीवन सिंह इस कमसिन शुरूआत के बाद आगामी कुछ वर्षों में क्या बनता है। ‘जीवन स्टीवेन स्पीलबर्ग’ या ‘जीवन कैमरून सिंह ’।
 
मुझे उम्मीद नहीं थी कि मैं कम से कम निर्मल अगस्त्य बने रहने में कामयाब रहुँगा भी या वही नीरजवा या निर्मलवा बन कर किसी प्राइवेट कम्पनी मे यस बॉस-यस बॉस का मन्त्रोचारण करते हुये आपाधापी के देवता की पूजा आराधना करनी होगी। तब तक मन्डली में दो मित्र और आ गये और एक नयी बहस छिड़ गयी थी।
‘‘यार तुम जे.एन.यू. क्यूँ नहीं जाते।’’
मेरे एक बुजुर्ग मित्र की अलुआ के भाव वाला मशवरा पहले को बहुत नही जँचा।
‘‘धूर..., काहे लऽ...? का बुझते हो, ई बिहार का संस्कृति कौनो विश्वविद्यालय से कम है का?’’

यह प्रतिक्रिया उनके साथ आये कंचे जैसी आँखों वाले एक सज्जन की थी जो पिछले पाँच सालों से क्षेत्रिय राजनीति के रथ पर चढ़ने के लिये बेहाल थे। मसला में रोमांच पिरोने के लिये मैंने उनसे पूछा- ‘‘कहिये मुनि लाल जी, अबकि टिकट मिलने की कुछ उम्मीद।सरकार बदल गई है।’’ 
उसने एक चुस्की मारते हुये कहा- ‘‘अरेऽऽ... अगस्त्या बाबू..., का बतायें, ई अपना बिहार जो है न, एकदम धुरफन्दियों का चरागाह है, समझे। किसी से कहियेगा नहीं। रूलिंग पाटी के दो चार दबंग नेतवन के पास गये तो कहिस कि अरेऽऽ, तुमरा बाप तो यादव है न..., स्साले भागते हो की नहीं, और विपक्षी पार्टी में गये त मेन दलाल कहिस कि हमरे पारटी में आना था तो भूमिहारिन से बियाह काहे ले कर लिया रे अभागाऽऽऽ...।’’
 
मुझे  ताज्जुब  हुआ कि मुनि मनोहर राय अपने बारे में कहते और अपनी ही बखिया उधेड़ते समय भी इतना बेबाक कैसे था। लगता है बिहार प्रदेश की राजनीतिक दाव-पेंच ने उसे कड़वाहट पीना अच्छी तरह सिखा दिया था।
 
बहरहाल, होली के कुछ ही दिन बाकी थे। मेरे मुहल्ले से पश्चिम में बाबा चौहरमल टोले में रात के नौ बजते-बजते होरी का आलाप शुरू हो जाता है। कभी भी धीमे लय वाला गाना नहीं होगा और ताल सिर्फ कहरवा या दादरा। ज्यादातर कहरवा। यह शुरू हुई हारमोनियम और ढ़ोलक की जुगलबन्दी।
"धाऽऽ तिनकधिनऽऽ... धगे तिनक धिनऽऽ..."

और इसके पीछे-पीछे शुरू हुआ चौहरमल टोले के सबसे खनकदार आवाज वाले शम्भू पासवान और उसके सहयोगी।
"अबकी फागुन में हो बबुनीऽऽ
अबकि फागुन मेंऽऽ.............................(कोरस)
गौना के डोलिया ले ऐबुऽऽ
अबकि फागुन मेंऽऽ"..........................(कोरस)
बगल में मुस्लिम बाहुल्य इलाका है लेकिन आज तक किसी को कोई एतराज नहीं हुआ। अच्छा लगता है यह देखकर कि ईद की सेवई और होली के मालपुये में एक जैसा स्वाद है। फिर जातीय और धार्मिक हिन्सा की जिम्मेदारी किसके कन्धों पर सौंपी जाय। मुझे नहीं लगता कि कोई सामान्य आदमी बिना वजह एक दुसरे को कष्ट पहुँचाना चाहता है, परोक्ष रूप से भी नहीं।
 
बुद्ध महावीर और अशोक महान के इस प्रदेश को किसी की नजर लग गई है शायद। मौत और संहार के लिये जाति या धर्म विशेष कोई योग्यता नहीं है और ना ही शोभनीय है उन आँकड़ों का पुर्नआकलन। सभी नरसंहार में प्रायः ऐसे लोग मरते हैं जिनके पास तन ढंकने के लिये ना तो ढंग का कपड़ा होता है ना ही दो जून खाने के लिये रोटी या फिर ऐसे लोग जो एक चींटी तक नहीं मार सकते। स्पष्ट है कि यह उसी दाँव-पेंच का एक घातक पैंतरा है जिससे मुनि मनोहर राय और उसके जैसे कई युवा घायल हो रहेे थे।
 
फिर भी उस दरम्यान जब मेरी जवानी के दिन लगभग शुरू ही हुये थे और मैं बिना गाल और गला काटे दाढ़ी बनाने की महारत के क्वालीफाईंग राऊँड में हर दूसरे दिन एक मैच हार रहा था, बिहार प्रदेश आज की तरह उतना बनावटी नहीं था। कच्चा था, हरा था, जैसे दार्जिलिंग पहाडि़यों से टूँगी गई चाय की पत्तियाँ। विदाउट प्रोसेस्ड्, विदाउट फिल्टर्ड, एंड विदाउट पैक्ड्। यहाँ की चालीस प्रतिशत आबादी गरीब है और पैंतालीस फीसदी से ज्यादा अनपढ़, बावजूद इसके--
‘‘असम के लोगों का भोलापन था यहाँ
पंजाब के आर्यों की ताकत भी थी यहाँ,
खुले गाँव, सड़क, महाराष्ट्र के तमाशे से थे
नाल-ढोलक की थाप में बंगाल के ताशे भी थे’’

इस इन्टरनेट ने सब कुछ घाल मेल कर के रख दिया और उसपर फेसबुक पर विचरते ज्ञानियों की असीम अनुकम्पा। अब बिहार, बिहार न रहा। ठेठ और मॉडर्न का हाई-ब्रीड हो गया है।   

एक बार केरल गया था, राष्ट्रीय कैरम टूर्नामेंट में बिहार के जूनियर टीम का कप्तान बन कर। वहाँ त्रिवेन्द्रम की एक लड़की से दोस्ती हुई। वह भी हिन्दी की वजह से। वह हिन्दी बहुत अच्छा बोल लेती थी। उसके प्रति मेरा यह आश्चर्य धीरे-धीरे दोस्ती में बदल गया। प्रतियोगिता के तीसरे दिन  बिहार की टीम सारी प्रतिर्स्पद्धाओं से बाहर हो चुकी थी। हमलोग फुर्सत ही फुर्सत में थे। वह मुझे और चौबे को अपने घर ले गई और कॉफी के साथ केले और कटहल का चिप्स खाने को दिया। उस कॉफी में एक अजीब सा स्वाद था और मनभावन सी खुश्बू भी। लगता था चॉकलेट को सिगरेट के धुएँ में पकाया गया हो। हमलोगों  के पूछने पर उसने बताया कि वह कच्ची कॉफी थी। बगीचे से तोड़ा, धूप में सुखाया और दुध, पानी, चीनी के मिश्रण में डाल कर चूल्हे पर चढ़ा दिया।
   
बस यही था बिहार प्रदेश। कच्चे कॉफी की तरह। उस पार्टी के अगली सुबह टेलिफिल्म के भाग दो की पटकथा के लिये बख्शी आने वाला था। ऐसी भी छत पर बैठे एक घंटे हो गये थे लेकिन सामने वाली खिड़की में हर रोज दिखने वाला चेहरा दिखा नहीं। शायद वे लोग कहीं बाहर गये हों। तभी मुहल्ले के ही एक अतिपरिचित वरिष्ठ पत्रकार दूध का कैन ले कर बगान की तरफ जा रहे थे। बिना रेलिंग के छत की क्या प्राईवेसी उसपर जब मकान भी नीचा हो। सोचा जल्दी से छुप जाऊँ वरना वे पूछ बैठेंगे-
‘‘क्या निर्मल जी कैसे हैं... कैसी चल रही है साहित्य और संगीत की जुगलबंदी...? मेरे मिंटु के लिये कोई ज्ञानवर्धक लेख हो तो....’’।
सभी जानते थे की सुत-चरित-परिमार्जन नाम के एक जिन्न ने उन्हें ओ.सी.डी. की तरह जकड़ रखा है और उनका ग्वाला, ‘पूत कपूत तो क्या धन संचय;  पूत सपूत तो क्या धन संचय’ जैसा धर्मसंकटीय विषय देकर रोज ही उन्हें व्याख्यान के चक्कर में डाल कर उनके कैन में पानी मिला देता था। अब वे बस चार खम्भों की दूरी पर थे।
           
मैंने जल्दी से छत पर फैले सारे सामान, जैसे गिटार, चटाई, डायरी, कलम, प्लेक्ट्रम, कप, प्लेट वगैरह समेटे लिये और चुपचाप नीचे चला आया। ‘‘निजं शरणम् गच्छामि’’...।

‘‘निर्मल अगस्त्य’’
26 जनवरी 2015
पटना




Saturday, March 21, 2015

‘‘भगवान फुर्सत में और पन्डित व्यस्त!’’

‘‘भगवान फुर्सत में और पन्डित व्यस्त!’’


कान्हा को प्यार हुआ... उन्नीसवीं बार। कान्हा के पास कोई ब्रान्डिंग नहीं है इसलिये उसका प्यार कभी नोटिस नहीं हो पाता। जब ग्यारह साल की उम्र में उसे अपनी तीस साल की मामी से प्यार हुआ तो भी यह, वात्सल्य के बहाने नोटिस नहीं हुआ था। आज जब उसे अपने से आधी उमर की लड़की से प्यार हुआ है तो भी, स्नेह के बहाने यह प्यार नोटिस नहीं हो पा रहा।
वास्तव में कसूर कान्हा का भी है। उसे प्यार होता है तो, बस हो जाता है। और ऐसा भी नहीं कि वह सीमाओं से डरता है वह कहता है-
‘‘प्यास का मारा जल-जल बोले, आग का मारा जला-जला,
चुप रह कर कु-अर्थ से बचिये, गूंगे का गुड़ भला-भला!’’
उस दिन कान्हा को उसका एक मित्र मिल गया।
मित्र बोला- ‘‘चलता है?’’
कान्हा ने कहा- ‘‘चल!’’
मित्र बोला- ‘‘पूछेगा नहीं, कहाँ?’’
कान्हा ने कहा- ‘‘लो पूछ लिया, कहाँ?’’
मित्र बोला- ‘‘कालीबाड़ी।’’
कान्हा बोला- ‘‘बड़ी मस्त जगह है।’’
मित्र ने डाँटते हुये कहा- ‘‘कान्हा...!’’
कान्हा बोला- ‘‘अरे यार, वहाँ के संदेश खुब भालो...।’’
मित्र बोला- ‘‘पैसे-वैसे नहीं है मेरे पास।’’
कान्हा बोला- ‘‘कोई बात नहीं यार, वहीं पर किसी से उधार ले लेंगे।’’
मित्र बोला- ‘‘कमाल कमबख़्ती है तेरी। प्रसाद भी उधार की चढ़ायेगा।’’
कान्हा बोला- ‘‘कमीनगी तो तू कर रहा है। मैं संदेश की बात कर रहा हूँ और तू प्रसाद की बात कर रहा है। मैं सजी-धजी बंगालिन औरतों की बात कर रहा हूँ तू काली की पूजा की बात कर रहा है।’’
मित्र गुस्सा हो कर अकेले ही चल दिया। उसे चिढ़ाता मनाता, कान्हा उसके पीछे-पीछे। इसलिये दोनों की दोस्ती वर्षो से संरक्षित है। एक ने माया में ही राम ढूँढ़ लिया इसलिये चिढ़ाता रहता है, दूसरा राम में माया ढूँढ़ रहा है इसलिये चिढ़ता रहता है।
राम और माया का यह खेल पुराना है भाई। कोई एक खम्भा थाम लो तो अच्छा है। बाद में ये न कहना कि-
‘‘माया मिली न राम...’’
मित्र बंगाली है और उसे कालीबाड़ी के पन्डित का अॅप्यान्टमेन्ट लेना है। घर में काली पूजा करवानी है। कान्हा थोड़ी देर के लिये बंगाली बन कर संदेश और सुन्दरता का आनन्द लेना चाहता है। बहरहाल दोनों की मंजिल एक ही है- कालीबाड़ी!
मन्दिर तक पहुँचते-पहुँचते मित्र ठन्डा हो गया और दोनों साथ-साथ मन्दिर प्रांगण में घुसे। कान्हा लापरवाही से इधर-उधर देखता मन्दिर की सीढि़याँ चढ़ने लगा। न कोई प्रणाम-पाती न चेहरे पर कोई विनम्रता। आधी सीढि़याँ चढ़ने के बाद उसने पीछे मुड़ कर देखा।
मित्र तो उल्टा चला जा रहा था।
कान्हा चिल्लाया-‘‘मित्र उधर कहाँ...?’’
मित्र धीमी आवाज में बोला- ‘‘तुम उधर कहाँ...?’’
कान्हा बोला- ‘‘अमां, काली पूजा करवानी है न?’’
मित्रा बोला- ‘‘अबे नीचे आ गदूद। आफिस इधर है। पहले पन्डित चाहिये होता है न!’’
कान्हा ठठा कर हँसने लगा। दो युवतियाँ जो पूजा सामाग्री ले कर उपर चढ़ रहीं थी हड़बड़ा गयीं और रेलिंग से सट कर चढ़ने लगीं। कान्हा हँसता रहा और सीढ़ियाँ उतरता रहा। फिर मित्र के पास पहुँच कर बोला-
‘‘कमाल है यार, ये पंडितों के लिये ऑफिस कब से होने लगा?’’
मित्र चिढ़ कर बोला- ‘‘तेरी इसी चौधरीगिरी से चिढ़ है मुझे। अरे पन्डित तो मंदिर के भीतर ही होगा लेकिन उसकी बुकिंग ट्रस्ट ऑफिस के थ्रू ही होगी।’’
कान्हा बोला- ‘‘छुप-छुपा के भी नहीं।’’
मित्र बोला- ‘‘नहीं, और अब अन्दर अपना भाड़ जैसा मुँह मत खोल देना... जोतो माथा, तोतो व्यथा!’’
दोनों कार्यालय के अन्दर घुसे तो तीन लोग अन्दर बैठे थे। दो सिगरेट पी रहे थे और तीसरा सुलगाने की तैयारी में था। मित्र ने परचा निकाला और बोला कि उसने पुजारी की बुकिंग के लिये नम्बर लगाया था। जो सिगरेट सुलगाने की तैयारी में था, बड़े स्टाईल से उँगलियों में सिगरेट घुमाता हुआ बोला- ‘‘तो...?’’
उसका ‘तो...’’ तो उस थाना इन्चार्ज से भी ज्यादा रोबदार था जिससे किसी ने कहा हो कि हुजूर हमने कल एक एफ.आई.आर. करवाया है और उसने कहा हो- ‘तो...?’’
तो एहसान किया क्या। ये ‘एहसान किया क्या’ अलग से बोलने की जरूरत नहीं है। कड़क कर ‘तो’ बोलो तो ये अपने आप जुड़ जाता है। न्युमोनिया और साइकोलॉजी के ‘पी’ की तरह। मित्र किचिंत लजाता-शर्माता, कर्ज लिये हुये अभागे की तरह मुस्कुराता बोला- ‘‘जी, बुकिंग शनिवार की मिली है और शनिवार को पिताजी मना कर रहे हैं।’’
टेबल के उस पार बैठा दुसरा सिगरेटिया बोला- ‘‘क्यूँ, शोनिवार में क्या तोकलीफ है?’’
मित्र बोला- ‘‘शनिवार को पिताजी भी फ्री नहीं है और मेरा भी बैंक का कुछ काम है।’’
तीसरा सिगरेटिया तपाक से बोला- ‘‘ताले कोब चाहते हो।’’
मित्र बोला- ‘‘रविवार को।’’
पहले सिगरेटिये ने ऐसा मुँह बनाया मानो एक भिखारी ने उसकी बेटी से विवाह का प्रस्ताव रख दिया हो।
वह तमतमा कर बोला- ‘‘शोनिवार को पोंडित फ्री नेई आछे भाई।’’
कान्हा के सब्र का बांध टूटने ही वाला था कि मित्र बोला-
‘‘कोई और पन्डित हो...?’’
तीसरा सिगरेटिये ने एक रजिस्टर उठाया और पहले सिगरेटिये को देते हुये कहा-
‘‘एक टू ठीक से चेक कोरे देख तो। देखो कोई फ्री है क्या?’’
पहले सिगरेटिये ने रजिस्टर हाथ में लिया और हाथ में उठाये-उठाये कहने लगा- ‘‘सुबह में बोनर्जी आरो घोष... दुपोर, प्रोदीप सोरकार.. दू पुजो। विकाले प्रोखोर मोंडल के यहाँ छोट्ठी और रात में मुखोर्जी कोरपोरेटर का आरती। ना रे... मुझे सब मुजबानी याद है... रोविवार तो एक भी पोन्डित फ्री नोही है।’’
तीसरा सिगरेटिया अकड़ कर बोला- ‘‘होबे ना भाई, शोनिवार को कोरना है तो कोरा लो नहीं तो कुरी दिन रूक जाओ।’’
मित्र बोला- ‘‘बीस दिन...?’’
दूसरा सिगरेटिया बोला- ‘‘यहाँ का नियम है कि एक ही आदमी बीस दिन के भीतोर दो नोम्बर नहीं लगाने  सोकता।’’
कान्हा बोला- ‘‘अमां मित्र...। शनिवार को तुम फ्री नहीं हो... रविवार को पन्डित फ्री नहीं है... जरा मन्दिर के भीतर चल के काली से तो पूछ ले कि वो फ्री है की नहीं...।’’
ऐसी मस्तानी आवाज में उसने अलापा कि तीनों सिगरेटिये भौंचक्क होकर उसे देखने लगे।
मित्र को तो मानो ‘माइस्थेनिया ग्रेविस’ का अटैक होने को आया।
तभी नरमुन्डों की माला पहने काली अन्दर घुसी और बोली- ‘‘आमी तो फ्री गो...! किन्तु आमाके जिगस कोरा उचित। कान्हा शोत्ती बोलछे...। आमि सोब दिन फ्री...!’’
तो ये आलम है। फूल वाला व्यस्त है। प्रसाद वाला व्यस्त है। रोली, टीका, चन्दन, केसर वाला व्यस्त है। भक्त व्यस्त हैं, पन्डित व्यस्त है। लोग अपना शिड्डयुल देख रहे हैं। भगवान के दरबार में जाने से पहले कोई बच्चों की परीक्षा खत्म होने का इन्तजार कर रहा है तो कोई एल.टी.सी. के ग्रान्ट होने का। कोई रोपनी खत्म होने का इन्तजार कर रहा है तो कोइ फसल कटने इन्तजार कर रहा है। दुःख क्या है? जब सब कुछ इन्सान की क्षमता से बाहर हो जाये। उस वक्त वो इन्सान भगवान के दरबार में जाने की सोचता है या तब, जब वो फुर्सत में हो। हम एक अदद परिवार और एक अदद नौकरी के बीच बड़ी मुश्किल से समय निकाल पा रहे हैं और ये उम्मीद कर रहे हैं कि जो समूचा सन्सार चला रहा है वो ‘एट योर डिस्पोजल’ टाईप से हमारे लिए फुर्सत ही फुर्सत में है।

‘‘निर्मल अगस्त्य’’
22 मार्च 2014
पटना


Thursday, March 12, 2015

‘‘ब्रान्ड वैल्यू की जय!’’

‘‘लपकचुन्नुओं के देश में’

                                                        ‘‘ब्रान्ड वैल्यू की जय!’’

क बार प्रोफ़ेसर शम्भूनाथ को उसके एक मित्र ने उपहार में एक कमीज़ दी।
अव्वल... कमीज़ तो कमीज़ है...। कॉलर वाली... दो बाँहों वाली... और क़रीब आधे दर्जन बटनों वाली।
उसके जाने के बाद प्रोफ़ेसर शम्भूनाथ कमीज़ को उलट-पलट कर देखता रहा। वह कमी में तमी ढूँढ़ने लगा। चटक पीला रंग! फूल पत्ते सी प्रिन्टिंग, डेढ़ हाथ का कॉलर और सीपिओं के बटन। बिल्कुल गोआ समुद्रतट स्पेशल!
उसने कमी को मरे हुये चूहे की तरह उठाया और पत्नी से जाकर बोला-
‘‘कैसा विचित्र आदमी है बताओ। चौतीस सौ रूपये में ये चद्दर ख़रीद लाया और वो भी उपहार में देने के लिये।’’
पत्नि बोली- ‘‘तो क्या हुआ...?’’
शम्भुनाथ बोला- ‘‘गज़ब करती हो यार, मैं कोई एक्टर थोड़े ना हूँ जो ऐसा झन्डू पन्चारिस्ट टाइप का कमीज़ पहनूँ ।’’
पत्नि बोली- ‘‘हाँ जानती हूँ कि तुम प्रोफ़ेसर हो लेकिन इससे क्या फ़र्क पड़ता है।’’
शम्भूनाथ चिढ़कर बोला- ‘‘बहुत फ़र्क पड़ता है। तुम एस्नो-पाऊडर वाली जात कभी नहीं समझ सकोगी ये सब।’’
पत्नि बुरा मान गई और उसी वक़्त मायके चली गई। इसलिये भी चली गई कि मायके बगल वाले मुहल्ले में है और शायद इसलिये भी चली गई कि बहुत दिनों से प्रोफ़ेसर शम्भूनाथ के तम्बू में सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है और शायद इसलिये भी कि प्रोफेसर औरतों के मामले में चूहा है सो इनव्हेस्टमेन्ट का मूल-सूद सब उसे ही मिलना है।
प्रोफ़ेसर की नाराज़गी का कारण एक सामाजिक गणित है और उसकी पत्नि की नाराज़गी का कारण एक मानसिक गणित।
दोनों सौर्टेड हैं और युनिवर्सिटी के सदके जी-खा रहे हैं। दोनों का सामन्जस्य सौर्टेड है। दोनों की पढ़ाई काम आ रही है।
पढ़ाई...!
मानसिक गणित...!
सामाजिक गणित...!
रस्साकशी...!
और नूराकुश्ती...!
ये सब बेहद ज़रूरी है। ये सब एक प्रकार के 'टूल्स' हैं और 'टिप्स' देने के लिये तुम्हारे पास बीबी है... माँ है... बहन है... बुआ है... चाची है...। 'टूल्स' और 'टिप्स' से तुम अपनी दक्षता, जो तुम बाल पोथी से लेकर एम. फ़िल की किताबों तक माँजते आये हो, को और चमक दे सकते हो। 'टूल्स' और 'टिप्स' तुम्हारा सबसे अच्छे दोस्त हैं। यह विश्वविद्यालयों, स्कूलों और संगठनों की नींव में भी है और आन्तरिक सज्जा में भी।
'टूल्स' और 'टिप्स' अमर रहें !
युनिवर्सिटीज़ अमर रहें !
प्रोफ़ेसर शम्भुनाथ एक रोज़ बड़ा बेचैन था। नूराकुश्ती का सप्ताह ख़त्म हो गया था और बीबी मायके से वापस आ चुकी थी। पत्नि ने चाय देते वक़्त पूछा- ‘‘अजी हुआ क्या...?
प्रोफ़ेसर पहले तो सकुचाया, फिर बोला - ‘‘अच्छा वो राहुल पांडेय.. कभी कोई पैसे-वैसे देने के लिये आये तो मत लेना, अच्छा नहीं लगता है।"
पत्नि बोली - ‘‘पैसे? काहे के पैसे? और ये राहुल पांडेय वही न, तुम्हारा दोस्त.... जिसने कुछ दिन पहले बिना किसी ओकेज़न के तुम्हें उपहार में वो तीन हजरिया कमीज़ दी थी, जिसे तुम पहनते ही नहीं हो।’’
प्रोफ़ेसर बोला.. ‘‘हाँ .. वही राहुल पांडेय..।’’
पत्नि भाँप गई!
‘‘तो तुमने उसे उधार दिया था...?’’
पांडेय ने कुछ नहीं कहा। उसने चाय का प्याला उठाया और सुड़कने लगा।
‘‘कितने रूपये दिये थे...?’’
पत्नि उत्सुक होकर पूछा।
प्रोफ़ेसर ने परे देखते हुए कहा - ‘‘यही कोई चार हज़ार।’’
पत्नि बोली- ‘‘शर्ट लेने के पहले या बाद में...?’’
प्रोफ़ेसर झल्ला कर बोला-
‘‘अरे यार, लेने के पहले, और लेने के पहले का क्या मतलब, हम गये थे क्या कमीज़ माँगने, बात करती हो।’’
प्याला उसने थोड़ा पटक कर रखा और उठते हुये बोला - ‘‘अरे उसने दी थी शर्ट, मैंने थोड़े ही लिया था।’’
पत्नि बोली - ‘‘नाराज मत हो, एक ही बात है। पैसा ले गया लेकिन कम से कम एक शर्ट तो दे गया।  वो भी ब्रान्डेड। शर्ट की कीमत और ब्रान्ड वैल्यू को फ़ील करोगे तभी तो बैलेन्स बाद में एडजस्ट करने का जुगाड़ लगाओगे।’’
प्रोफ़ेसर तुनक कर बोला - ‘‘बहुत इकॅन्मिक्स झाड़ने लगी हो आजकल।’’
पत्नी मुस्कुरा कर बोली - ‘‘नहीं....अकाऊन्टेन्सी! और एक बार कमीज़ का ब्रान्ड तो देख लो। 'लेवाईस' का शर्ट है, स्पेशल मियामी एडीशन! पहन के निकलोगे तो चार आदमी इमप्रेस होंगे। ओ.एल.एक्स वाले एक प्रचार में एक आदमी इसी तरह की कमीज़ पहने हुये है। कपड़े-जूते में खर्च तो बहुत करते हो लेकिन एक भी ढ़ंग का ब्रान्ड नहीं पहनते हो। भागलपुरिया सिल्क के कुर्ता में कितना पैसा बरबाद हो गया तुम्हारा लेकिन जब पहन के निकलते हो तो लोग एक प्राईमरी स्कूल के मास्टर की तरह देखते हैं तुम्हें। ज़माना बदल गया है। ज़माने के साथ चलो।"
ब्रान्ड वैल्यू की बात प्रोफ़ेसर के भेजे में खट से सेट हो गई और उस शाम वह वही कमीज़ पहन कर निकल गया। फूलदार! छींटदार! सीपीयों वाले बटन और डेढ़ हाथ के कॉलर वाली कमीज़।
उमेश पान भन्डार तक पहुँचते-पहुँचते उसकी तबियत में सर्राफ़ा बाज़ार सा उछाल आ गया। कदाचित सभी उसे देख रहे थे,  ऐसा उसे लगा। उसने कन्धों को हल्के से उचकाया और अपनी पीठ और सीधी कर ली। अब तक कपड़े सिलवा कर पहनता आया था लेकिन आज एक ब्रान्डेड रेडिमेड कमीज़ पहन कर निकला था। पाँच सौ का कपड़ा और पच्चीस सौ की ब्रान्डिंग। पान दुकान तक पहुँचते-पहुँचते उसकी तबियत में तीन हज़ार का कॉनफ़िडेन्स जुड़ गया सो अलग। पहनने के तीन मिनट के भीतर कमीज़ उसे अच्छी लगने लग गई। कितना सरल है यह सब। इसे प्रायोगिक ज्ञान कह सकते हो क्योंकि, प्रोफ़ेसर शम्भूनाथ कभी भी इकॅन्मिक्स  विषय को बिना ग्रेस मार्क्स के पास नहीं कर पाया था।
उमेश पान भन्डार पर दो लपकचुन्नू पहले से मौजुद थे। लपकचुन्नू मने...? मने तुम्हारी बात शुरू हुई नहीं कि तुम्हें चुन्नू-मुन्नू सरीखा  बालक समझ कर तुम्हारी बात बीच में ही लपक लेंगे। भले ही उन्हें एम.एम.एस. का फ़ुल फ़ॉर्म नहीं मालूम हो लेकिन, वो तुम्हें मेसेज की बारीक़ियाँ समझाना शुरू कर देंगे। पतली-पतली गलियों से तुम्हें घसीटते, ऐसी-ऐसी घटनाओं के बाज़ार घुमा लायेंगे कि तुम भी उनके जी.के. के कायल हो जाओगे। कौन सा पहला एम.एम.एस. था जो फलाने मशहुर गायक ने चिलाने अभिनेत्री को रात में दो बजे भेजा था और जिसकी वजह से सात लोग अपनी जान से हाथ धो बैठे थे?
किस पार्टी के मन्त्री के एक एम.एम.एस. की वजह से एक राज्य की पूरी सरकार तेल लेने चली गई थी?
किस एम.एम.एस. ने सन्सद से लेकर बालीवुड में अपनी धूम मचाई थी और एम.एम.एस क्या..., तुम कुछ भी बोल कर देखो। पान दुकान पर, ई.एम.यू., डी.एम.यू. से लेकर राजधानी एक्सप्रेस की बोगियों में, सभागारों के अन्दर भी, बाहर भी, मन्दिर की सीढ़ीयों पर और यहाँ तक की क़ब्रिस्तानों और श्मशानों में मुर्दे को विदा करने आई भीड़ में भी। तुम्हें पता चल जायेगा कि तुम लपकचुन्नुओं से घिरे हुये हो।
बहरहाल! प्रोफ़ेसर के उधार का सूद एक ब्रान्डेड शर्ट के कारण मूलधन का दुगुना हो चुका था। उस ब्रान्डेड शर्ट के चलते आये कॉनफिडेन्स में लबालब स्कूटर से बिना उतरे उसने कहा-‘‘अरे उमेेश...दो सिगरेट देना...।’’
उमेेश की बोलती सटक गई! दोनों लपकचुन्नू उसके मुँह पर आते-जाते भावों को देख जुगाली करना छोड़ प्रोफेसर को विहंगम भाव से देखने लगे। प्रोफेसर ने फिर से कन्धों को उचकाया और कहा-
‘‘क्या हुआ जी? फिर पॉलिथिन मार के बैठे हो क्या...।’’
प्रोफेसर का यह सम्वाद जैसे उमेेश के लिये स्ट्रेस बस्टर जैसा था। उसकी बत्ती जली और वह ठठा कर हँस पड़ा। सिर्फ हँसा ही नहीं बल्कि ताली मार-मार कर उस हँसी के प्रॉडक्ट पर बार-कोडिंग भी करने लगा। वस्तुतः, वह कम्फर्ट जोन में वापस आ गया था।
हँसी और तालियों के साज के संगत के बीच वह अलापा- ‘‘अरे परफेसर साहब... आप हैं... हम समझे कि त कोई गुटका कम्पनी वाला जे है से की अपना मैनेजर के भेज दिहीस है। आई तोरी के... आप तो चिन्हाईये नहीं रहे हैं। ऐसन टिन्च होके त आप कहियो निकलते नहीं हैं।’’
हो-हो-हो-, ताली और हँसी... हँसी और ताली। पान वाले की खुशी, तकल्लुफ का बाँध तोड़ कर उसके ओठों के किनारों से उपला कर, हरहराती-दनदनाती गंगा की तरह उसके ठुड्डी की आर बह चली।  यह वही उमेेश गोप है, असली नाम उमेेश चन्द्र यादव। जो उसे हमेशा मास्टर साहब कर कर सम्बोधित करता रहा है। जान-बूझ कर। नीचा दिखाने या चिढ़ाने के उद्देश्य से नहीं, बस अपनापन में। आज क्या हो गया...? अपनापन का आत्मविश्वास किस चमक के आगे धुँधला पड़ गया?
कमीज़...! फूलदार...! छीटदार...! सीपिओं के बटन और डेढ़ हाथ के कॉलर वाली एक ब्रान्डेड कमीज...! अपनापन से दुकान की साख खराब होती है और ब्रान्डिंग की चकाचौंध से अपनापन का बर्हिमुखीपन कमजोर होता है। दुकान बचानी है तो प्रोडक्ट को ब्रान्ड में लपेट कर रखो। यह वही उमेेश गोप है... वो वही रीडर शम्भूनाथ है, वही पान भन्डार, वही सिगरेट की तलब और वही पुराना सम्वाद-
‘दो सिगरेट देना...।’
लेकिन आज शम्भूनाथ नाम का प्रोडक्ट, 'री-इन्कारनेट हो गया', जैसे किसी ने नेपथ्य से कहा हो- ‘पुनर्जिवितो भवः!’ सब कुछ वहीं रह गया। बस एक मास्टर साब टाईप का अदना सा, बेचारा सा रीडर, एक ब्रान्डेड कमीज़ के कारण प्रोफ़ेसर साहब बन गया। दोनों लपकचुन्नू पशोपेश में बस जुगाली करते रह गये। ब्रान्डेड कमीज़ ने अपनी वैल्यू ऐडेड सर्विस का नज़ारा भी दिखा दिया...। जय हो ब्रान्डिंग! जय हो वैल्यू ऐडेड सर्विस...!
‘‘निर्मल अगस्त्य’’
12 मार्च 2014
पटना



Friday, February 20, 2015

‘‘चना मामा से बादाम मामा!’’

                       ‘‘चना मामा से बादाम मामा!’’


क थे चना मामा और एक थे बादाम मामा। गुणी दोनों थे लेकिन पूछ बादाम मामा की ज्यादा होती थी। चना मामा लाख कोशिश करते की वे भी चर्चित हों, लोग उनका भी पोस्ट लाईक करें, शेयर करें लेकिन उनकी यह तमन्ना उस अमरूद के पेड़ की तरह साबित हो रही थी जो अपनी शाखों पर स्ट्राबेरी उगने का ख्वाब देखने लगा हो। खैर, चना मामा जब कुछ पकाते तो धोने, छीलने से लेकर गैस का नॉब ऑफ करने तक व्यन्जन के साथ लगे रहते, रमे रहते, जीते रहते और जब व्यन्जन बन के तैयार हो जाता तब बादाम मामा एकदम से कैमियो की तरह सीन में आते। बने हुये व्यन्जन को एक मुताबिक बाऊॅल में डालते और फिर उस पर गार्निशिंग करते। कभी कसे हुये पनीर से, कभी कसे हुये मोजरेला चीज से, कभी धनिया पत्ते से, कभी अनार के दानों से तो कभी ओरिगानो से। अब डायनिंग टेबल पर तीन मिनट चर्चा होती चना मामा के पाक शास्त्र पर और तीस मिनट चर्चा होती बादाम मामा का गार्निशिंग शास्त्र पर। मामला धोने-छीलने, भूँजने से शुरू तो होता लेकिन खटाक से लेन चेन्ज कर प्रेजेन्टेशन के हाईवे पर दौड़ने लगता।

चना मामा एक दिन बड़े लाचार से, एकदम भीगे हुये सर्टिफिकेट की तरह एक पहुँचे हुए गुरू के पास पहुँचे। एकदम पहुँचे हुये! शिव के डमरू का मनका पॉकेट में लेकर घुमने वाले गुरू के टाईप। बताई अपनी समस्या। गुरू बोले - ‘‘बेटा एक कहानी सुन। कई वर्ष पहले यूनान में एक थियेटर हुआ करता था। एकदम झक्कास! लोग दूर-दूर से उस थियेटर में नाटक देखने जाया करते थे। उस थियेटर के मालिक के दो बेटे थे। बड़ा वाला बेटा उस थियेटर का संगीत निर्देशक था और पूरे संगीत मन्डली का नियन्त्रण उसके हाथ में था। कम्पोजर भी था, अरेन्जर भी और कन्डक्टर भी।
छोटा वाला बेटा एकदम शार्टकट एप्रोच वाला था। वह कहता था कि पीछे कैसेट चला दो भाई, काहे इतना मेहनत करते हो। पब्लिक को दिखाना ही है न। नाटक खत्म होने के बाद पब्लिक के सामने जाकर गरदने न झुकाना है। ऊ त तुमलोग कैसेट चला लेने के बाद भी झुका सकते हो।

बड़ा भाई एकदम से उसी सेलेरॉन प्रोसेसर वाले पी.सी. की तरह हैंग कर गया जिस पर हाई रिजाल्युशन थ्री डी ग्राफिक्स वाला ‘मैक्स पेन’ की तरह का कोई गेम चला दिया गया हो। एक महीने तक वह इसी हालत में सोचता रहा कि क्या होगा छोटे का। कैसे जियेगा यह। पुरूष पहचाना जाता है लूर से और स्त्री पहचानी जाती है लक्षण से, और यही लूर सीख रहा है अभी से। कैसेट चला दो। संगीत को मटियामेट करने पर तो तुल गया सो अलग, कामचोर बन जायेगा सो अलग। एकदम रियलटी शो वाले सिंगर की तरह बात करता है जो पीछे बजते ट्रैक  पर लिप-सिंग करते हैं और अन्त में कोडा पर गच्चाक से गर्दन झुका देते हैं।

एक महीने और सघन चिन्तन के बाद वह इस चिन्ता को लेकर अपने पिताजी के पास पहुँचा। इसकी हालत तो सेलेरोन प्रोसेसर वाले पी.सी. की तरह हुई थी, तब उसके पिताजी की हालत क्या हुई होगी जो अबेकस के जमाने के थे। आनन-फानन में निर्णय लिया गया कि अगले शो में वह भी कोई साज लेकर संगीतज्ञों की मन्डली में बैठेगा और साथ-साथ उसकी ट्रेनिंग भी चलेगी। अब ट्रेनिंग के समय उसका ध्यान मुख्य संगीत से ज्यादा स्पेशल इफ्फेक्ट वाले संगीत में रहता। सो, सी मेजर, ए माइनर और साधारण कॉर्ड प्रोग्रेशन वाले पन्ने में उसने लिख दिया - ‘‘चना।’’
और स्पेशल इफ्फेक्ट का माहौल बनाने वाले डिमिनिश, ऑगमेन्टेड, सेवन्थ, नाईन्थ, एलेवन्थ और थर्टीन्थ वाले पन्ने में उसने लिखा - ‘‘बादाम’’।
नाटक के दौरान प्रेक्टिकल ट्रेनिंग के समय उसने देखा की माहोल में गर्मी, सस्पेन्स, थ्रिल, हॉरर, एक्शन लाने के लिये यही डिमिनिश, ऑगमेन्टेड, सेवेन्थ, नाईन्थ, एलेवन्थ और थर्टीन्थ काम आते है। सो उसने जिद ठान ली की वो ‘स्टील द शो’ वाला कलाकार बनेगा और वो वही पर बजायेगा जहाँ-जहाँ ये कार्डस लगे हैं। बाप-भाई ने सोचा, चलो यही सही।
एक-आध साल के बाद छोटे का दिमाग एकदम सातवें आसमान में चला गया और उसे लगने लगा कि उसके बिना तो नाटक का संगीत एकदम घोला हुआ सत्तू है। गार्निशिंग तो उसके म्युजिक से आती है। और जनता का कमाल देखिये की वह जल्दी ही प्रसिद्ध होता गया और वैसा-वैसा दस थियेटर का मालिक बन गया जबकि बड़का भाई आज तक अपने पिताजी के थियेटर में सी मेजर, ए माइनर में ओझराया हुआ है।’’

इतना बोल के गुरूजी चुप हो गये। चना मामा एकदम उत्साहित हो के बोले - प्रभु, मुझे समझ में आ गया कि कैसे होगा मेरा ऊद्धार। ‘दीघ्रसुत्री विनश्यतमः।’ लम्बा-लम्बा काम नहीं करने का प्रभू। आत्मसन्तुष्टि के फेर में नहीं रहने का। जब कोई तेहरी बना लेवे तब उसमें दू चम्मच घी चुआ देने का।
जब कोई पूरा घर सजा देवे तब बस्स, फुस्स फुस्स एअर फ्रेशनर मार देने का। जब बीबी तीन घन्टे में तैयार हो के बाहर निकले त बस तीन सेकेन्ड में आँचल उलटा के पहना देने का। मान गये प्रभु, क्या कहानी था। समझ गये बदम्मा के सक्सेस का राज। हम फेसबुक पर दू-दू पन्ना लिख देते हैं चार गो लाईक मिलता है और उसी पर कोई लहरिया, चुट्टी काटने वाला कमेन्ट कर देता है त उसको चौदह गो लाईक मिलता है।
गज्जब प्रभू गज्जब! गज्जब है ये दुनिया प्रभू। पूरा मकान बनाने वाला राजमिस्त्री और मजूरा हेरा जाता है और मकान का नेमप्लेट डिजाइन करने वाला हीरो बन जाता है। और त और प्रभु, अब तो ‘कन्ट्रोल सी’ एण्ड ‘कन्ट्रोल वी’ वाली दुनिया में ‘कन्ट्रोल एन’ का फेर बड़ा थकाऊ होते जा रहा है। अब हम भी गानिर्शिंग के फेर में रहेंगे, पकाने के नहीं। कल से, कल से क्या आजे से चार लाईन के बिच्छुबूटी वाले कमेन्ट के फेर में रहेंगे, चौदह सौ लाईन के लेख के फेर में नहीं। ‘हॉरमोनी इन प्रैक्टिस’ नाम का महाग्रन्थ गया तेल लेने, हमको डिमिनिश चाहिये, ऑगमेन्टेड चाहिये, सेवन्थ, इलेवन्थ, थर्टीन्थ चाहिये। हमको भी बादाम मामा बनना है प्रभु। आर्शीवाद दीजीये।


‘‘निर्मल अगस्त्य’’
20 फरवरी 2014
पटना

Sunday, February 15, 2015

‘‘बकरी चढ़ी पहाड़ पर!’’

                                      ‘‘बकरी चढ़ी पहाड़ पर!’’

तीन हजार साल पहले की बात है। सेन्टोनियोटिना नाम का एक राज्य था जो चारों ओर से पहाड़ों से घिरा हुआ था। कुल मिलाकर इसका आकार एक कटोरे की तरह का था। उस राज्य के मुखिया का नाम था सेन्टोनियोकोटस। चुंकि राज्य पूरी तरह पहाड़ों से घिरा था इसलिये सुरक्षित भी था। लोग सुखी थे और मांस, दूध इत्यादि उनका प्रमुख भोजन था। पालतू पशु के नाम पर कुछ दूध देने वाले जानवर थे और उनकी सुरक्षा के लिये भेड़ियेे थे। इन जानवरों को इनकी उपयोगिता खत्म होने के बाद भोजन के रूप में इस्तेमाल किया जाता था लेकिन जब तक वे उपयोगी रहते तब तक उन्हें बच्चों जैसा प्यार-दुलार और सुरक्षा दी जाती थी।

एक दिन राज्य सेन्टो के मुखिया सैन्टो को एक विचार आया कि क्युँ न पहाड़ के उस पार जाकर दूसरी दुनिया का अवलोकन किया जाय। अब चिन्ता हुई की पहाड़ पर चढे़गा कौन। जिस राज्य में जानवरों को बच्चे जैसा समझा जाता हो उस राज्य में इन्सान की अहमियत आप खुद सोच सकते हैं। फिर निर्णय लिया गया कि पहाड़ पर भेड़ियों को भेजा जाये और ये निर्णय सर्वसम्मति से मान लिया गया। अगले दिन भेड़ियों को नहला-धुला कर, फूल-माला पहना कर पहाड़ों की ओर रवाना किर दिया गया। शाम ढ़लने तक बड़ी उत्सुक्ता बनी रही, ठीक वैसे ही जैसे सन उन्नीस सौ उन्हत्तर में स्काईलैब के गिरने के दिन लोगों में उत्सुक्ता बनी हुई थी। शाम में भेड़िये वापस लौट आये। मुखिया सैन्टो ने सारे भेड़ियों को जमा किया और लगा सवाल पूछने। लेकिन पाँच-छः सवालों के बाद ही उसे ध्यान आया कि भेड़िये तो इन्सानों की बोली जानते ही नहीं तो ये बतायेंगे क्या खाक। भेड़िये बेचारे हाव-भाव, पूँछ-कान, आँख-मुँह नचा-नचा कर कुछ बताना भी चाहते तो लगता था कि मूक-बधिरों के लिये समाचार चल रहा है। मुखिया को लगा कि ये तो गड़बड़ी हो गयी। पहले भेड़ियों को बोलना सिखाना पडे़गा।

अगले दिन फिर उन भेड़ियों को नहला-धुला कर फूल-माता पहना कर स्पीच ट्रेनिंग देनी शुरू कर दी गई। एक सप्ताह की एक्सटेन्सिव ट्रेनिंग के बाद भेड़िये बोली-चाली में पारंगत हो गये। सातवें दिन टेस्ट भी लिया गया।रिजल्ट्स पाॅजिटिव थे। ‘ए प्लस प्लस’! अगले दिन भेड़ियों को फिर से फूल-माला पहना कर चारों दिशाओं में पहाड़ों की तरफ रवाना कर दिया गया। सैन्टो बढ़ा खुश था। अब मिलेगी दुनिया की खबर। लान्च हो जायेगा ‘वोल्फबुक’। सेन्टो के निवासी लेंगे मजा बाहर की खबरों का और दुसरे चरण के लान्च में भेड़ियों को इस राज्य का समाचार देने बाहर भी भेजा जायेगा। कुल मिला कर पूरा दिन ‘द एक्सपैन्डेबल्स थ्री’ के ट्रेलर की तरह बीत गया। शाम होते होते ही लोग मुख्य मैदान में जमा होने लगे। लेकिन कम्बख्त भेड़िये पायरेट हो गये। बिल्कुल ‘द एक्सपैन्डेबल्स थ्री‘ की रीलिज के पहले की पायरेसी की तरह। एक मैना उड़ती हुई आई और मुखिया सैन्टो के माथे पर चिट्ठी लहरा कर चली गई जिसमें लिखा था- ‘‘बास सैन्टो! नोचना तो हम पहले से जानते ही थे, और बोलना तुमने सिखा ही दिया। समझ तो हमारी माता रानी की दया से ठीक-ठाक है ही। सो हमारे लौटने की उम्मीद लगाना तो बेमानी है। लिख रहा हूँ लार से स्याही मत समझना। न तो किसी और को पढ़ाना, न खुद पढ़ना। क्या है कि बेसी पढ़ लिख लेने से दिमगवा हमेशा रोमिंग में रहने लगता है। अच्छा, अब बन्द करते है। (नोट- कभी इधर आना तो मत समझना कि हम पहचान लेंगे। हमने अपने प्राईरिटी लिस्ट में एटीट्यूड को ग्रेटीट्यूड के ऊपर रखा है।)’’

सैन्टो, एकदम सिक्स्टीज के नायिकाओं की तरह लहरा के गिर पड़ा। कालान्तर में ये भेड़िये इवाॅल्यूशन के तीन हजार साल की सीढ़ियाँ चढ़ कर अलग-अलग व्यवसायों में फैल गये। ज्यादातर भेड़िये मैनेजर बन गये। कुछ पी.आई.एल करने वाले वकील बन गये। कुछ जनता के प्रतिनिधी बन गये और कुछ...। बाकी, आप खुद दिमाग लगाईये। किताब लिखने नहीं बैठे हैं। लेख लिख रहे हैं, लेख। दिमाग पर थोड़ा सा जोर डालिये, आपको भी अपने आस-पास दो पैर पर खड़ा कोई न कोई भेड़िया दिख ही जायेगा।

कुछ दिन बाद सैन्टो की इच्छा फिर से जोर मारने लगी और अगले दिन फिर इस मसले पर चर्चा हुई कि किसको भेजा जाये। गाय, भैंस और अन्य जानवर जो दूध ज्यादा देते थे, उनको भेजने के लिये कोई राजी नहीं हुआ। तब अन्त में बची बकरियाँ। बकरियों में से भी सारी बाँझ बकरियों को चुन कर, ट्रेनिंग-ट्राॅनिंग दे कर, फूल-माला पहना कर, दूसरी दुनिया की खबर लाने के लिये पहाड़ों पर भेज दिया गया। एक तसल्ली थी कि बकरियाँ मर-मुरा गई तो भी ज्यादा नुकसान नहीं होगा। उनके लौटने का समय हो जाने पर भी किसी में कोई खास उत्साह नहीं था। भेड़ियों की दगाबाजी से आहत वे अपने-अपने घरों में अपने-अपने हिसाब से खा-खेल रहे थे। लेकिन सूरज डूबने के साथ ही बकरियाँ अपने-अपने मालिकों के घरों के बाहर आकर मिमियाने लगीं। सब धपा-धप बाहर निकले। मेरे करण-अर्जुन आयेंगे टाईप्स आँसू सबकी आँखों से गिरने लगे। अब बकरियों को ससम्मान सलामी-वलामी देकर टोकरियों से ढँक दिया गया। सुबह उनके लिये लाल घास बिछाई गई जो घर-घर से शुरू होकर मुख्य मैदान में खत्म होती थी। लोगों का मजमा लगने लगा। बकरियाँ गार्ड आॅफ आॅनर लेते हुये मैदान में जमा होने लगीं। फिर सैन्टो मिट्टी का ताजी बनी श्यामपट्टियाँ (ब्लैकबोर्ड) लेकर मैदान में पहुँचा ताकि उनकी बातों को श्यामपट्टियों पर आकृत कर उन्हें सूखने दे दिया जाये। सवालों का दौर शुरू हुआ। क्या रहा? कैसा रहा? उधर क्या था? कैसी है उधर की दुनिया? उधर के जानवर और इन्सान किस तरह के हैं? आदि-इत्यादि।

लेकिन सवाल जो भी हो, बकरियों का जवाब केवल घास, पहाड़ी रास्ते, पत्तियाँ, पौधे, खाना, भरपेट, टेस्ट चेंज, पिकनिक से ही जुड़ा हुआ था। सैन्टो और सेन्टोनियोटिना के निवासी पूरा रिसाइटल सुनना चाहते थे लेकिन बकरियाँ आलाप से आगे बढ़ ही नहीं रही थीं। तो मिशन हो गया फेल और सैन्टो को समझ में आया कि बकरियाँ खाने के फेर में रह गईं और जिस काम के लिये उन्हें भेजा गया था वो उनके पल्ले पड़ा ही नहीं।
तभी से के कहावत बनी -
‘‘कि बकरी चड़ी पहाड़ पर
 और उतर गई।’’

सो मूल तौर पर बात ये है कि बकरी चढ़ी पहाड़ पर! ओक्के...! चढ़ गई़...! अब आगे? तो क्या आगे? बकरी क्या कर लेगी पहाड़ पर चढ़ कर? आसमान को सींग में लपेट लेगी कि पहाड़ को जमीन में धंसा देगी। अगर कोई बाज, गरूड़ टाईप पक्षी उठा के ले गया तो ठीक, नहीं तो अन्त में खा-पी के टाईट हो के झरबेरियाँ की मार्किंग करते हुये उतर जायेंगी। बकरियों की यही नियति है। पहाड़ पर चढ़ना और अन्त में उतर जाना।

तो ऐसी बाँझ बकरियाँ सभी पहाड़ों पर चढ़ी हैं जिनसे उम्मीद की जाती है कि वो कुछ नया बतायेंगी, नया कर पायेंगी या नई दुनिया का द्वार खोलेंगी। फेसबुक, ट्वीटर और ऐसे सोशल साईट्स पर ऐसी बाँझ बकरियों की भरमार है। लाॅगिन किया, थोड़ा चरे, थोड़ा गीला किया, थोड़ा सुखा किया, मतलब थोड़ा गिला किया, थोड़ा शिकवा किया और सोने के पहले उतर गये मने लाॅग आऊट हो गये। मैं भी उन्हीं बकरियों में से हूँ और मेरे सारे अभिन्न मित्र भी। उनको भी अपने साथ घसीट लिया। जानता हूँ बुरा नहीं मानेंगे। अगर बुरा मानते तो मैं उन्हें भिन्न मित्र कहता। घास, हरियाली, पत्ते, पिकनिक, टेस्ट चेन्ज से ऊपर जाने का टाईम किसी के पास नहीं है। दिनभर में दस चिन्तायें होती हैं। गाड़ी का माईलेज घट रहा है सो अलग टेन्शन है। मोबाईल में नेट अपने आप आॅन हो के बैलेन्स चूस जा रहा है सो अलग। गूगल पर तरह-तरह के नुस्खे ढूँढने में आधा वक्त निकल जा रहा है सो अलग। गैस भगाने के नेचुरल नुस्खे। माइलेज बढ़ाने के कारिस्तानी नुस्खे। फ्री में रिचार्ज कराने के ताईवानी नुस्खे, सेक्स पावर बढ़ाने के जापानी नुस्खे और सारे देश को गरियाने के पाकिस्तानी नुस्खे। कोई कमल को गरिया रहा है, कोई पंजा को तो कोई झाड़ू को। खुद कुछ करने का न तो टाईम है न कारण। ईश्वर का दिया इतना है कि उसी को रोटेट करते रहें, घुमाते रहें, चर्न करते रहें तो दोनों हाथ से हसोतने लायक मलाई तो मातारानी के कृपा से कहीं गया नहीं हैं। स्टैन्ड बाई मोड से हाईबरनेट मोड तक जिन्दगी कम्बल के भीतर भी चलास्टिक से कुछ ऊपर ही है और चेहरे पर प्लास्टिक ओढ़ने की कला भी काम दे ही रही है। कुछ लोग मोदी जी के फैन हुये हैं और कुछ लोग केजरी जी के और बात तो इतनी अथाॅरिटी से लिख रहे हैं जैसे कि प्रधानमन्त्री सभी निर्णय लेने के पहले इन्हीं को फोन घुमाते हैं और पी.एम. आॅफिस का सारा फाईल सिग्नेचर के पहले इनके ही घर पहुँचता है। पेट्रोल-डीजल का दाम किसी रात दो-चार रूपये घट गया तो अगले दिन ये भाजपा समर्थक फेसबुक और सोशल साईट्स की वाल को झरबेरियों से भर देते हैं जबकि हो सकता है उसी दिन पचहत्तर और चीजों की कीमतें भी घटी बढ़ी होंगी जो इनको कभी पता नहीं  चलना है। यही हाल झाड़ू समर्थकों का है जैसे अरविन्द केजरीवाल इनके ऊपर वाले कमरे में रहने वाला बेरोजगार फूफ्फा जी हैं जिनका खाना खर्ची यही लोग दे रहे हैं। आज के भारतियों की सारी चिन्ता, लाईफ, वाईफ, बाईक, और फेसबुक जैसे मसलों से ऊपर निकल ही नहीं पा रही लेकिन जब कभी भी फुरसत मिले तब पहाड़ पर चढ़ना है तो चढ़ना है और फिर उतर जाना है।
‘‘सो बकरी चढ़ी पहाड़ पर
और फिर उतर गई।’’

निर्मल अगस्त्य 
15 फरवरी 2015 
पटना 


Thursday, January 8, 2015

"खोंचर कीजिये, सुख से रहिये"

    
 "खोंचर कीजिये, सुख से रहिये
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न्सान और जानवर में अनगिनत अन्तर है और उन सबों में से एक है खोंचर करने की योग्यता जो हर इन्सान में अनिवार्य रूप से मौजुद है। लेकिन इस योग्यता का प्रभावी होने के लिये आपके ग्रे-मैटर में इसके कीटाणुओं का न्युनतम संख्या में होना आवश्यक है। विज्ञान के हिसाब से थ्रेशहोल्ड अॅमाऊन्ट। अब जैसे .कोलाई और बी.कोलाई के कीटाणु हमारे शरीर में एक न्युनतम संख्या से ऊपर होने के बाद ही रोग के लक्षण प्रगट करने की क्षमता रखते हैं तो एक सफल खोंचरिस्ट बनने के लिये यह नितान्त आवश्यक है कि आपके ग्रे-मैटर में इसके कीटाणुओं की संख्या थ्रेशहोल्ड अमाउन्ट से बहुत अधिक हो। यह एक देशी शब्द है। इसकी उत्पत्ति  शायद खोंच या खरोंच से हुई हो सकती है। खोंच लगना, खोंच लग गया, कुर्सी खोंचहा हो गया है... इत्यादी। ये सब अपने बिहार के बहुत से जिलों के लोगों के कहते सुना होगा। ऐसी कोई भी नुकीली या कंटीली वस्तु जो आपके शरीर, कपडे़ या किसी भी वस्तु में खरोंच डाल सके, खोंच देने वाली खोंचहा कहलाती है। यहाँ पर यह संज्ञा है। लेकिन जब हम कहते हैं खोंच लग गया तब यहाँ यह विशेषण है जैसे दर्द हो गया में दर्द विशेषण है और घाव लग गया में घाव संज्ञा है। अब बात रही खोंचर करने की, तो जब यह खोंचहा वस्तु जो एक देशी टूल है, को किसी चीज को खरोंचने के लिये उपयोग में लाया जाता है तो उसे खोंचर करना माना जा सकता है। हालाँकि यह शब्द खोंच’, ‘कोंच शब्द के काफी नजदीक है लेकिन दोनों में बहुत अन्तर है। कोंच देने का मतलब होता है अन्दर तक ठूँस देना। अब तीस सीट वाली बस में नब्बे लोग आप बिठा तो नहीं सकते। तब कोंच देना नाम की इस तकनीक का सफलतम प्रयोग जनसंख्या के उच्च घनत्व वाले इलाकों में हमेशा ही किया जाता है।
जबकि खोंच हमेशा ऊपरी सतह पर लगाया जाता है। आपने अपने जीवन में भी इसे किसी  किसी रूप में महसूस किया होगा। कभी काँटों की वजह से, कभी किसी पुरानी कुर्सी में बेहया की तरह पूँछ की तरफ से निकल आये किसी कील की वजह से तो कभी बाँस या लकड़ी में कहीं पर आवारा की तरह निकल आये मोटे रेशे की वजह से। इस खोंच का हाफ ब्रदर है काँप यह काँपने वाला काँप नहीं है। जब भी किसी लकड़ी अथवा बाँस की बनी वस्तुओं, जैसे सूप, डगरा की कमानी से कोई टुकड़ा चमडे़ को खरोंचता हुआ अंदर घुस जाये और घुसा रह जाये तो उसे कांप लगना कहते हैं। कुछ लोग, खास कर शहर में रहने वाले लोग जो घरेलू भाषा का प्रयोग नहीं करते हैं, सवाल उठा सकते हैं कि इसे गड़ना या धसना क्यूँ नहीं कह सकते। वो इसलिये नहीं कह सकते कि गड़ने या धंसने की प्रक्रिया में वस्तु माँस में घुस जाती है जबकि काँप लगने की प्रक्रिया में वस्तु चमडे़ में फंस के रह जाती है। दूसरी मुख्य बात यह है कि काँप लगने में वस्तु चमडे़ के समानान्तर होती है जबकि गड़ने या धँसने में वस्तु माँस के लम्बवत भी हो सकती है, तिरछे हो सकती है और समानान्तर भी।
तो खोंच लगने का मतलब आप समझ गये। ऊपरी क्षति, कम नुकसान, घाव भरने में कम वक्त लेकिन बेचैनी और छटपटाहट काँप लगने और गड़ने-धँसने से ज्यादा। काँप लगने और गड़ने-धँसने के बाद अगर किसी महीन चिमटे या सुई की नोक से उस वस्तु को निकाल दिया जाये तो दर्द एकदम छू-मन्तर हो जाता है लेकिन खोंच लगने के बाद आपको तबतक दर्द सहना है जब तक घाव भर  जये। अब आप में से कुछ पाठक मुझसे सवाल कर सकते हैं कि अगर छूरा या गोली धंस जाये तब यह विश्लेषण तो आप की दिल्ली सरकार की तरह धराशायी हो जायेगा। तो बन्धू, आप सवाल नहीं कर रहे हैं बल्कि खोंचर कर रहे हैं। बात को समझ के भी काटने की कोशिश करने की प्रक्रिया भी, खोंचर करना कहलाती है। आप के घर में शादी-विवाह, छठ्ठी-छिल्ला इत्यादि का उत्सव तो होता ही रहा होगा। आप इन मौके पर ऐसे प्राणियों को बहुत आसानी से ढूँढ़ सकते हैं जो खोंचर करने में एक्सपर्ट हों।
हमारे यहाँ विवाह समारोह में रिश्तेदार तीन-चार दिन पहले से आने लगते हैं। इक्कीसवीं सदी में यही एक आराम मिला है हम सभी को कि अब लोगों के पास उतना समय नहीं है अन्यथा बीसवीं सदी के अन्तिम दशक तक रिश्तेदार एक महीना पहले ही  जाते थे। तो इतने लोगों का खाना बनाने के लिये किसके घर में बर्तन रहेगा भला। तो जाहिर सी बात है लोग हलवाई रखते हैं। ये घरभोज या घरभैया भोज वाले हलवाई कहलाते हैं। हालाँकि घरभोज को गृहप्रवेश का भोज भी कहा जाता है तो आईये घरभैया भोज से काम चलाते हैं। अभी इनका रेट पाँच सौ रूपये प्रति आदमी से लेकर नौ सौ रूपये तक है। प्रति आदमी का मतलब खाने वालों की संख्या से नहीं बल्कि हलवाई और उसके कारीगरों की संख्या से है। अब पाँच दिन या एक सप्ताह कोई भी  तो छप्पनभोग खा सकता है,  खिला सकता है तो भात, दाल, भुजिया, दो तरह की घरेलू स्टाईल की सब्जी, चोखा-चटनी, पापड़-तिलौड़ी खिलाने के लिये कैटरर को बुक करना तो बेवकुफी है। तब ऐसे घरवैया भोज वाले हलवाईयों को काम पर रखा जाता है। अब इतने रिश्तेदारों में वो खोंचरिस्ट कहीं  कहीं इस मौके का इन्तजार कर रहा होता है जो अगर जवान हो तो यू-ट्यूब पर संजीव कपूर, तरला दलाल और निशा मधुलिका सरीखे नामचीन विशेषज्ञों का वीडियों देख कर वर्चुअल हलवाई बन चुका होता है और अगर बूढ़ा या अधेड़ हो तो अपने उम्र से बीस गुना भोजों में खा चुका होता है। अब उनकों भी पता है कि उनकों आलू-गोभी का दम, बिरयानी और राजभोग बनाने के लिये नहीं रखा गया है, फिर भी बैठ जायेंगे स्टूल लगा के गैस सिलिन्डर के पास और लगेंगे खोंचर करने।
अच्छा केसर कहाँ से खरीदते हो भाई। आजकल केसर के नाम पर एसेंस में डुबाया हुआ, धोती रंगने वाला चम्पई रंग से रंगा हुआ दूब्बी बिकता है बजार में, समझ कि नहीं। अच्छा छीलने के बाद प्याज धोये की नहीं। देखो, छौंकने समय तुमलोग मेथी पहले डालते हो और जीरा बाद में इसलिये तुमलोग का बनाया खाना घर जैसा नहीं लगता। सुनो, मसाला पिसवाओगे  हमको बुला लेना, हम बतायेंगे कि केतना-केतना पडे़गा। अच्छा, चायपत्ती उधर ठोंगा में काहे रखे हो जी। चायपत्ती हमेशा स्टील के डिब्बा में रखा जाता है। वगैरह-वगैरह। कुछ देर में हलवाई को विश्वास होने लगता है कि वह चोखा बनाने लायक भी नहीं है। ऐसी हजारों बातें होती हैं शादी-विवाह और किसी उत्सव वाले घर में। ऊपर तो मैनें बस कुछ सैम्पल लिखा है क्युँकि हर किसी को ऐसे खॉंचों से गुजरना पड़ता है और आप सब भी ऐसी खोंचर करने वाली बातों से पूर्णतया परिचित होंगे।
अपना रोजगार कीजिये तो नौकरी करने वाले दोस्त, रिश्तेदार आपको खोंचर करेंगे। नौकरी कर लीजियेगा तो अपना रोजगार करने वाले दोस्त, रिश्तेदार आपको खोंचर करेंगे। अगर आपका भूगोल अच्छा है तो इतिहास वाला मास्टर खोंचर करेगा। अगर आपका सारा विषय अच्छा  तो आर्ट एन्ड क्राफ्ट, पी.टी. और स्पोटर्स टीचर आपको खोंचर करेगा।
आप रोग से बच सकते हैं। दुश्मन से बच सकते हैं। यहाँ तक कि पाकिस्तान से भी बचे रह सकते हैं लेकिन खोंचरिस्ट से नहीं बच सकते क्योंकि ये आपके बेहद करीब के लोग होते हैं जिन्हें पलटवार कर सबक सिखाने का जोखिम आप नहीं ले सकते। अगर आप बेटी का ब्याह आई..एस. अधिकारी से ठीक कर दीजिये तो बैंक में काम करने वाले रिश्तेदार खोंचर करेंगे। बेटे का ब्याह किसी दूसरे जिले में ठीक कर दीजिये तो जिन्होंने अपने बच्चों का ब्याह अपने ही जिले में कर दिया है वो आपको खोंचर करेंगे। अगर आप स्कूटर खरीद लाईयेगा तो बाईक चलाने वाले खोंचर करेंगे और अगर आपने जिम जाना शुरू कर दिया तो योगा क्लास वाले खोंचर करेंगे।
मोटा-मोटी यह विशेष योग्यता विकासशील देशों के लोगों में पाई जाती है। इसका जात, धर्म, लिंग, वर्ग  और उम्र से कोई लेना देना नहीं है। अपने भारतवर्ष को ही ले लीजिये आप। खोंचर करना एक सर्वव्यापी आचरण है। भारत का नागरिक खोंचर किये बिना रह ही नहीं सकता। पचपन प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है और सालों भर खेती आप कर नहीं सकते। जब खेत में पहले से ही फसल लगी हो तो कन्ट्रोल एन दबा के आप नया खेत तो बना नहीं सकते। अब, जब फसल कटेगी तब जा के खेत खाली होगा। तो इस बीच आप तो खाली हैं। क्या कीजियेगा इस खाली समय का जिसमें पैसा भी खर्च नहीं हो, आनन्द भी आये और खाली समय भी सटा-सट कट जाये। तो खोंचर कीजिये और क्या। अब रहे बाकि पैंतालिस प्रतिशत लोग। अब इसमें से जो सरकारी कर्मचारी हैं उनके पास खोंचर करने का स्कोप सबसे ज्यादा है। कहा जाता है कि सरकारी नौकरी मिलना जितना कठिन है, उससे भी कठिन है किसी को उससे निकलवा देना। तो चपरासी से लेकर प्रधान सचिव तक इस पारम्परिक और कभी  लुप्त होने वाली कला के रियाज में लगे रहते हैं। चपरासी बिलम्बित लय में खोंचर करेगा, बीच का कर्मचारी मध्य लय में ओर आला अधिकारी द्रुत लय में। फिर बचे प्राईवेट सेक्टरों में काम करने वाले। तो यहाँ पर वे बडे़ बदकिस्मत हैं क्युँकि उनके पास खोंचर करने का ज्यादा स्कोप है नहीं। वहाँ खोंचर सिर्फ मैनेजमेंट कर सकता है। तो ऐसे लोग सामान्यतः शादी-ब्याह, छठ्ठी-छिल्ला में इस कला का प्रदर्शन कर काम चलाते हैं। अब बचे अपना रोजगार करने वाले लोग। तो ये वास्तव में खोंचर की दुनिया के असली जादूगर हैं। अगर आप खोंचर करना नहीं जानते तो कभी अपना रोजगार-व्यापार नहीं बढ़ा सकते।
अब इसमें एक सबसे ऊपर क्रीमी लेयर टाईप का एक लेयर है जिनकी संख्या एक प्रतिशत भी नहीं है लेकिन भारतवर्ष की मीडिया और सोशल मीडिया इन्हीं खोंचरिस्टों की वजह से इतनी अमीर हो रही है कि आज हर मौकापरस्त इसमें शामिल होना चाहता है। इस क्रीमी लेयर खोंचरिस्ट्स की लिस्ट में सेलेब्रिटीज भी हैं, राजनेता भी हैं, अभिनेता भी हैं, सोशलिस्ट भी हैं, मार्क्सिस्ट भी हैं, कम्यूनिस्ट भी हैं, स्वयंभू सन्त भी हैं, टोपी-दाढ़ी वाले बडे़ कद के मौलाना-मौलवी भी है, चंदन-टीका वाले बडे़-बडे़ पण्डित, महन्त और बाबा भी हैं। इनका किया हुआ एक खोंचर दो-तरफा कार्य करता है। किसी लॉबी को बहुत फायदा पहुँचता है और किसी लॉबी को बहुत नुकसान।
यहाँ तक कि खोंचर करने की इस कला को व्यवसाय में भी सफलतापूर्वक समाहित कर लिया गया है। अब सिंघम बाबू को अपनी कोई फिल्म पिटती दिखाई देयी तो एक लॉबी उसी टाइम में इस फिल्म के बारे में, प्रिन्ट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में इतना खोंचर करेगी कि लोग उस फिल्म के प्रति उत्सुक हो जायेंगे। बहुत लोगों को तो ये भी नहीं पता कि इधर कुछ नेता जो नये सरकार की कार्यवाहियों और उनके सम्बन्धित मन्त्रियों का खोंचर करने में लगे रहते हैं, वो दरअसल प्रायोजित खोंचरिस्ट हैं। 
इसे मैनेजमेन्ट गुरूओं की भाषा में निगेटिव पब्लिसिटी कहते हैं। आप एक आदमी को सौ रूपया दीजिये और कहिये कि वो पूरे मुहल्ले में प्रचार कर दे कि कल सुबह आप अपनेे घर से बाहर डान्स करने वाले हैं। मैं भरत मुनि का नाम दे के आपको चैलेन्ज करता हूँ, कोई नहीं आयेगा। लेकिन अगर आप उस आदमी को सौ रूपये देने का बाद ये कहें कि वह मुहल्ले में प्रचार कर दे कि अगली सुबह आप अपने घर के बाहर कपड़ा-फाड़ डान्स करेंगे तो कसम भरत मुनि कि, आधा मुहल्ले आपके घर के  बाहर  के जमा हो जायेगा।
तो ऐसा नहीं है कि खोंचर सिर्फ तकलीफ देने के लिये किया जाता है। कई बार इससे बहुत फायदा भी होता है। अरविन्द केजरीवाल एण्ड पार्टी ने कांग्रेस का इतना खोंचर किया कि भाजपा पूर्ण बहुमत में  गई। केजरीवाल को भी पता है कि भारत का नागरिक भ्रष्टाचार पर भाषण सुनते समय एकदम से क्रान्तिवीर का नाना-पाटेकर हो जाता है लेकिन सभा स्थल से बाहर निकलते ही शूल फिल्म के सयाजी शिन्दे बनने में उसे एक मिनट भी देर नहीं लगती है और वह तो पी.एम. बनने से रहे। अब इससे हुआ यह कि केजरीवाल के सामने एक नया विकल्प प्रस्फुटित हो गया। अब वह भारतिय राजनीति के परम्यूटेशन-कॉम्बीनेशन में एक ऐसे फैक्टर हैं जो अपने खोंचर करने की अद्भुत कला से सरकार पलट सकते हैं। जब कुछ लोग कहते हैं कि केजरीवाल दरअसल भाजपा के तरफ से के..डी. अर्थात् खोंचरिस्ट औन स्पेशल ड्यूटी हैं तो मुझे आश्चर्य नहीं होता। इससे शानदार और किफायती टूल और क्या हो सकता है कि आप बस बोल के, खोंचर कर के पचास-साठ साल तक राज करने वाली पार्टी का इतना बुरा हाल कर सकते हैं। अरे भाई, अरविन्द केजरीवाल कोई पहले खोंचरिस्ट थोडे़  हैं। इसके पहले भी कई खोंचरिस्ट आये, फिर भी सरकार तो राज कर ही रही थी। वास्तव में यह उनका सेल्फ डेवेलप्ड टैलेन्ट है जिसे उन्होंने बडे़ प्यार से, बड़ी मेहनत से तराशा है।
तो यह सब लवेद उनके बारे में हुआ जिनके ग्रे-मैटर में खोंचर के कीटाणुओं की संख्या एक खास न्युनतम मात्रा से अधिक होती है। लेकिन जिनके ग्रे-मैटर में इसके कीटाणुओं की संख्या एक खास न्युनतम मात्रा से कम होती है उनका क्या? माना कि ऐस लोगों में लक्षण प्रकट नहीं होते तो ये सिद्यांत तो गलत हो जायेगा कि हर आदमी में खांेचर करने की अनिवार्य योग्यता होती है और योग्यता बिना परिणाम दिखाये सिद्ध नहीं की जा सकती है। आपने अपने घरों में, खेतों में, खलिहान में, गोदामों में, रेलवे स्टेशन की पटरियों पर, किराने की दुकानों में, होटलों में, ढ़ाबों में दो तरह के चूहे देखे होंगे। एक छोटा वाला जो खाता कम है सामान ज्यादा काटता है। और एक बड़ा वाला जो खाली खाने के फेर में रहता है और काटम-कुट्टम तभी करता है जब अनाज के डब्बे में घुसने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा हो। ये बड़ा वाला चूहा वही चूहा है जिसको ‘‘खाने में गलत क्या है, हम भी खाते थे’’ बोल कर बिहार के वर्तमान मुख्यमन्त्री हाल-फिलहाल विवादों के घेरे में  गये थे। हम अभी छोटे वाले चूहे के काटम-कुट्टम वाली खतरनाक आदत की समीक्षा करेंगे। 
दरअसल चूहे के आगे वाले दाँतों को ईश्वर ने बढ़ते रहने का श्राप दिया है जिसे इनसीजर कहते हैं। चुहों के ये दाँत उसी तरह बढ़ते हैं जैसे हमारे नाखून तो चूहे उन दाँतों की लम्बाई को  बढ़ने देने के लिये उन्हें घिसते रहते हैं। एक तरह से फाईलिंग करते हैं जैसे लड़कियाँ अपने नाखुनों को निश्चित आकार में और लम्बाई में बनाये रखने के लिये फाईलिंग करती है। अब इन्सान के पास तो तरह-तरह का औजार है लेकिन चूहा बेचारा क्या करे। वह सामान कुतरता रहता है ताकि दाँत की घिसाई हो सके। अगर ऐसा नहीं करेगा तो कुछ महीनों में उसके आगे वाले दाँत इतने लम्बे हो जायेंगे कि उसे दो पैर पर चलना पडे़गा और अगर चूहा दो पैर पर चलने लगेगा तो विकास की सीढ़ी पर वेटिंग लिस्ट में खडे़ बन्दर तो शर्म से मर ही जायेंगे और साथ ही साथ डार्विन और लैमार्क के सिद्धान्तों की बखिया उधड़ जायेगी। अब चूहा ठहरा श्री गणेश की सवारी। तो ऐसा होना उसे भी अच्छा नहीं लगेगा। इसलिये वह सामानों को कुतर-कुतर कर दाँत घिसता रहता है।
अब जो मैं कहना चाह रहा हूँ उसका आधार मेरा अनुभव है और मानव शरीर विज्ञान के जानकार इससे बिल्कुल सहमत नहीं होगें। अब ना होगें, तो  हों। हैदराबादी बिरयानी मैं हैदराबाद ढूँढिये, नहीं मिलेगा। कश्मीरी पुलाव में कश्मीर ढूँढि़ये नहीं मिलेगा। उसी तरह इन्सान के दिमाग में हमेशा बढ़ते रहने वाले दाँत भी होते हैं, शरीर विज्ञान के विशेषज्ञ ढूँढेगे, कभी नहीं मिलेगा। और इन्सान के दिमाग के यही दाँत खोंचर करने के काम आते हैं। चुँकि ये बढ़ते रहते हैं इसलिये इन्हें चूहे की तरह घिसते रहना परम आवश्यक है। दिमाग के इन दाँतों से बातों, सिद्धान्तों, फलसफों, तर्को, विचारों, भावनाओं और उपदेशों को कुतरा जाता है। यही प्रक्रिया खोंचर करना कहलाती है। अब जो दूसरे की बातों और सिद्धान्तों को खोंचर करते रहते हैं उनके दिमाग के भीतर उगे खोंचर करने वाले ये दाँत बाहर की तरफ बढ़ते हैं और ऐसे लोगों में खोंचर करने वाले कीटाणुओं की संख्या थ्रेशहोल्ड अमाउन्ट से ज्यादा होती है। लेकिन जिस किसी भी इन्सान में इन कीटाणुओं की संख्या थ्रेशहोल्ड अॅमाउन्ट से कम होती है उनके दिमागों में ये दाँत भीतर की तरफ मुडे़ होते हैं और वे भीतर की तरफ ही बढ़ते हैं। ऐसे लोग दुसरों का खोंचर नहीं कर पाते और एकान्त में अपने को ही खोंचर करते रहते हैं। दार्शनिक, चिन्तक, कवि, लेखक माइग्रेन और रक्तचाप के मरीज इसी श्रेणी में आते हैं।
यहाँ तक कि इन्सान की पहली कलात्मक अभिव्यक्ति खोंचर के रूप में शुरू हुई थी जब उसने गुफाओं के दीवारों पर खरोंच मार-मार कर तरह-तरह का चित्र बनाना शुरू किया था। अन्दर दबी मानसिक ऊर्जा को जब निकास नहीं मिलता तब यह ऊर्जा मनुष्य को उद्वेलित करती है। तब मनुष्य इसे सृजन और रचनात्मक अभिव्यक्तियों में खर्च करता है ताकि यह ऊर्जा बाहर निकल सके। गायन, वादन, लेखन, चित्रकारी, मुर्तिकारी, कढ़ाई, बुनाई, शिल्पकारी और भी  जाने कितने कलात्मक कार्य हैं जिसके द्वारा आप अपनी मानसिक उर्जा को सृजन के क्रम में बाहर निकालते हैं। इन सारे कार्यों में एक खास बात यह है कि जितनी मानसिक उर्जा खर्च होती है उससे दुगुनी फिर से बन भी जाती है जबकि खोंचर एक ऐसा कार्य है जिसमें मानसिक उर्जा का केवल निकास होता है।
सन्सार में कोई ऐसा काम नहीं है जिसमें खोंचर नहीं किया गया हो। यह एक वैश्विक प्रक्रिया है। खुद अमेरिका के पास परमाणु बम है लेकिन अगर भारत जैसे देश इसे अपने पास रखना चाहेंगे तो वो खोंचर करेगा। चीन भी खोंचर करेगा, जापान भी करेगा। जर्मनी, इटली, फ्रांस, सब खोंचर करेंगे। ऐलोपैथ का डॉक्टर हेम्योपैथी और आयुर्वेद को खोंचर करेगा। मूल तौर पर मैं यहाँ इस लेख में कर क्या रहा हूँ ? जी हाँ, बिल्कुल सही समझे आपलोग। मैं खोंचर कर रहा हूँ, और क्या। तो, सौ बात की एक बात- ‘‘खोंचर कीजिये, सुख से रहिये!’’
‘‘निर्मल अगस्त्य’’
8 जनवरी 2015
पटना