Wednesday, October 21, 2015

"अफ़सोस मत करो माँ!"

"अफ़सोस मत करो माँ!"

गिलहरियाँ अक्सर मरती हैं
पैरों के नीचे
पहियों के नीचे
टापों के नीचे कभी,
शेरों, चीतों और बाघों को
मिलती रहती है इसकी सूचना
उनकी प्रतिक्रिया
होती है इतनी भर
जैसे ऊँघते  हुये
बदल लेता हो करवट कोई
यदा-कदा अर्धनींद में,
शेर देखता है अपने पंजे
नः ... कहीं नहीं...
ख़ून की एक बूँद भी
बाघ सूँघता है
अपनी ही साँस
भैंसों और हिरणों के
लोथड़ों की बास,
कहीं नहीं गिलहरियों की गंध
साँस में या बास में,
पैरों पहियों और
टापों के नीचे
किसी बड़ी और जटिल
परियोजना पर चल रहा है काम
-सामाजिक और मानसिक!
चारों और धूल के बादली परिन्दे
जिनकी नुकीली चोंच में
गिलहरियों के रोयें
पता नहीं है भी या नहीं
लेकिन बाघ और शेर
प्रसन्न हैं- नितान्त!
इस बात को लेकर
कि जिसके मरने से
दाँतों के छेद भी न भरें
उनकी मृत्यु की विडम्बना के
व्यर्थ विवेचना से
पृथक रह सकते हैं वो
क्यूँकि, नींद.......
आँखों को और अधिक
पिलायी जा सकती है अभी,
ऐसा ही कुछ सोचते हैं
गिलहरियों की मौत पर
ऊँघने वाले शेर और बाघ ।


जा कर सो जाओ माँ !
दरअसल, सत्य तो यह है
कि मेरे अन्दर
एक नन्हीं कमज़ोर गिलहरी थी
जिसे मार कर, मिल बाँट कर
खा गये शेर और बाघ।
तुम्हारे रक्त से
बने इस शरीर के भीतर
पुनर्जन्म हो रहा है
उसी गिलहरी का,
एक प्रगल्भ
और परेश पुरूष में
इसलिये,
मेरे गिलहरी रूपी शरीर के
नष्ट होने का
जश्न मनाओ
और अफ़सोस मत करो माँ,
सम्भव हो तो मदद करो,
उन जीवाणुओं की
ताकि पहले वो चट कर जायें
मेरे गिलहरी जैसे शरीर के बचे-खुचे
रोंये और हड्डियों को।


लेकिन, क्या जानते हैं वे?
हड्डियों तक का
चूरन बना कर
मिट्टी में परोस देने वाले
जीवाणुओं को भी
स्वाद का चस्का लगा हुआ है,
उन्होंने अब तक 
किसी को छोड़ा है क्या
जो तुम अपने
आक़़ा हो होने पर इतरा रहे हो।
सुक्ष्म और ढ़ीठ अत्यन्त
तुम से कहीं ज़्यादा बेग़ैरत,
उन्होंने अब तक
किसी से गठबन्धन किया
तो राज़ बनाने के लिये नहीं
लील जाने के लिये किया,
तुम भी उसी अन्धकार में
दबोच लिये जाओगे
समाचार-पत्र और टीवी रेडियो में
एक्सक्लुसिव कवरेज़ के साथ।

निर्मल अगस्त्य
22-10-2015
पटना, बिहार।

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