Wednesday, March 16, 2016

"एक्स्ट्रा में से"

'कहानी'                                                                                         "निर्मल अगस्त्य"

एक सोमवार मैं तीन लीटर दूध लेकर शिवलिंग पर डालने जा रहा था। रास्ते में एक भूखा आदमी दिखा। मैंने पूरा दूध उसको पिला दिया ताकि उसके शरीर में ताक़त आ सके और वो उस दिन मेहनत कर अपनी रोज़ी रोटी सके। अगले दिन मैं फिर तीन लीटर दूध लेकर शिवलिंग पर डालने जा रहा था। फिर से वही आदमी दिखा और वो भूख से अधमरा सा लग रहा था। मैंने फ़िर से पूरा दूध उसको पिला दिया ताकि उसके शरीर में ताक़त आ सके और वो उस दिन मेहनत कर अपनी रोज़ी रोटी सके। ये घटना कई दिनों तक हुई। मुझे लगा की शायद लोगों ने उसे काम ही नहीं दिया होगा और इसी कारण उसे हर उस आदमी का इन्तज़ार रहता था जो उसे अपने अति में से, फ़ालतू में से या एक्स्ट्रा में से उसे कुछ दे सके। 

एक दिन हमेशा की तरह जब मैं दूध लेकर शिवलिंग पे डालने जा रहा था तो मुझे वहीँ पर अब दो आदमी दिखे। एक तो वही आदमी था जिसे मैंने तकरीबन बीस दिन तक दूध पिलाया था और अब उसकी हालत कुछ ठीक लग रही थी और दूसरा एक नया आदमी था जो पहले वाले से ज़्यादा कमज़ोर लग रहा था। अब मेरे पास एक चारा था कि मैं उस दूध को दो हिस्सों में बाँट कर उन दोनों को दे दूँ और मैंने वही किया। धीरे-धीरे उस जगह पर वैसे लोगों की संख्या बढ़ने लगी और मेरा तीन लीटर दूध उन लोगों के लिए काम पड़ने लगा। 

मैं इस बात पर बेहद चिन्तित था कि अगर बेरोज़गारी की यही अवस्था रही तो देश समाज की क्या हालत होगी। एक दिन मैंने सोचा कि मैं छुप कर उनके पीछेे जाऊँ और देखूँ कि वो पेट भर जाने के बाद काम की तलाश किस इलाक़े में करते हैं। हर एक के पीछेे जाना सम्भव नहीं था इसलिए मैंने ठाना कि हर दिन किसी एक आदमी के पीछेे जाऊँगा और साथ-साथ अब मैं तीन की जगह दस लीटर दूध उन सबों को बराबर-बराबर बाँटने लगा। 

वो तक़रीबन चालीस आदमी थे और मुझे भी इस बात को पता करने में चालीस दिन लगे कि काम की तलाश किस इलाक़े में करते हैं। और सच्चाई जान कर मेरा मन विकृत हो गया। उनमें से बत्तीस लोग ऐसे थे जो दूध पीने के बाद या तो अपने-अपने ठिकाने चले गए या फिर किसी और अति, फ़ालतू या एक्स्ट्रा वाले के इन्तज़ार में किसी और नुक्कड़ या रस्ते पर जा कर बैठ गए। उनमे से मात्र आठ लोग ऐसे थे जिन्होंने पेट भरने के बाद काम की तलाश ज़ारी रखी। तकरीबन पन्द्रह दिन और बीते तब उन आठ में से दो लोगों को छोटा मोटा काम मिल गया और उन दोनों ने उस स्थान पर आना बन्द कर दिया जहाँ मैं दूध बाँटा करता था। 

ऐसे करते करते  बीते और उनमे से चार और लोगों को काम मिल गया और उन चारों ने भी उस स्थान पर आना बन्द कर दिया जहाँ मैं दूध बाँटा करता था। ऐसे करते-करते आठ महीने बीत गए पर उस आठ में से दो लोगों को कोई काम नहीं मिला। इधर  इन आठ महीनों में बीस पच्चीस नए लोग भी आ गए जिनमे से कुछ ही दूध से पेट भरने के बाद उन आठों की तरह काम पर जाते दिखे जबकि बाकी उन बत्तीसों की तरह पेट भरने के बाद अपने-अपने ठिकाने पर जा के सोते देखे गए। 

जब मैंने हिसाब लगाया तो पता चला की उनमे औसतन मात्र बीस प्रतिशत अर्थात 8 लोग पेट भरने के बाद काम की तलाश में निकले और उस बीस प्रतिशत में से 75 प्रतिशत अर्थात 6 लोगों को देर सवेर काम मिल ही गया लेकिन उस बीस प्रतिशत में से 25  प्रतिशत अर्थात दो लोगों को काम नहीं मिला। अब हिसाब ये था की चालीस लोग में से आठ लोग काम मांगने गए और उनमे से मात्र दो को नहीं मिला तो बेरोज़गारों का वास्तविक प्रतिशत 5% निकला जबकि उनमें से 80 प्रतिशत लोगों ने पेट भर जाने के बाद अपने भविष्य के लिए उपक्रम करने की बजाये आराम करना ज़्यादा मुनासिब समझा। 

तो ये था मेरा प्रयोग जिसमे मैंने पाया कि आप अपना क़तरा-क़तरा भी बाँट देंगे तब भी माँगने वाले या जरूरतमन्दों की संख्या कम नहीं होगी क्यों वास्तविक ज़रूरतमन्द तो वो लोग हैं जो काम की तलाश करते हैं लेकिन किसी कारणवश काम नहीं मिलता और उनकी संख्या मुट्ठी भर है जबकि उनमे से अधिकांश अपने पूरी ज़िन्दगी इस संघर्ष में लगा रहे हैं कि दूध शिवलिंग पर चढ़ाये जाने की बदले जरूरतमन्दों में बाँट देना ज़्यादा सही है। उनमे से कुछ मुट्ठी भर अतिक्रियावाद को अपना लेते हैं और फिर छीन या लूट कर लेना अपना मानवीय अधिकार समझने लगते हैं। 

मैं मानता हूँ की खाद्य पदार्थ जैसे दूध, दही, फल-फूल, मिठाई, अन्न जैसी वस्तुओं को ईश्वर के नाम पर व्यर्थ कर देना सही नहीं है लेकिन इसे छद्म, झूठे या कर्महीन लोगों में बाँट देना उस से भी बड़ा अपराध है क्यूँकि इस से भविष्य में सामाजिक व्यवस्था के डगमगाने का डर रहता है। असली ज़रूरतमन्द की मदद करने में कोई बुराई नहीं है। ऐसे हज़ारों लोग हैं जिन्हें किसी ने मदद की तो उन लोगों ने उस मदद से आई शक्ति को अपने भविष्य के निर्माण में लगाया। हज़ारों ऐसे लोग हैं जो अपने मेहनत की बदौलत रंक से राजा बने। ऐसे हज़ारों लोग हैं जिन्होंने मदद को अपना हक़ न समझ कर भविष्य तराशने का एक औज़ार समझा। 
सबों से मेरी गुज़ारिश है कि वास्तविक और छद्म जरूरतमन्दों में अन्तर समझें। किसी के बदन पर कपड़े  न हो या वो कई दिनों से भूखा हो तो मदद तभी करें जब वह अपने  भविष्य  मैं  सकारात्मक रूचि रखता हो न की लोगों के अति, फ़ालतू या एक्स्ट्रा में। 

10:54, 16/03/2016
पटना।   


Sunday, March 6, 2016

"छनरछाँव_चल चमेली बाग़ में" का एक अंश"

एक विशुद्ध देशी शब्द है- "छनरछाँव!"
हालाँकि इसकी उत्पत्ति जिस मूल शब्द से हुई है उसको यहाँ लिखना कोई साहित्यिक बहादुरी नहीं है।
"छनरछाँव" का शाब्दिक अर्थ बड़ा विस्तृत है और ऐसे समझना और समझाना ज़रा मुश्किल है। लेकिन एक-आध उदाहरणों से समझने की कोशिश की जा सकती है। जैसे, मेरे कुछ मित्र हैं, बोले तो फ़ास्ट फ़्रेंड्स। उनका नाम कुछ भी रख लीजिये क्या फ़र्क पड़ता है। क्यूँकि मेरे इस फेसबुकिया प्रलाप को पढ़ने के उपरान्त उन सबको यही लगेगा कि ख़ास उनके लिए लिखा गया है। कल सुबह से व्हाट्सएप-व्हाट्सएप का खेल शुरू हो जाएगा। हमरे लिए ही लिखे हो न यार टाइप्स। आपके भी कुछ ऐसे मित्र ज़रूर होंगे,सबके होते हैं। अब किसी शाम मेरे उन मित्रों को दारु पीने की इच्छा होगी तो वो सीधे-सीधे नहीं कहेंगे। 
एक कहेगा- "जानते हो यार, दारु बड़ी ख़राब चीज़ है। बर्बादी है बर्बादी। पैसे की भी और सेहत की भी।" 
दूसरा कहेगा - "सही कहते हो, चार दिन सचिवालय स्पोर्ट्स क्लब में बैडमिंटन खेल के जितना चर्बी गलता हैं उतना एक दिन के दारूबाजी में जमा हो जाता है।" 
तीसरा कहेगा - "बात खाली दारु का नहीं है, बात स्साला चखना का भी है जो भुंजा से शुरू तो होता है लेकिन कम्बख्त्मारी के चिकेन लॉलीपॉप, चिकेन कड़ाही और स्टफ्ड नान पर जा के खत्म होता है। 
कैलोरीमीटर भी ऊब के कहता है बस्स .... इस से ज़्यादा काँटा नहीं है हमरे मीटर में। अब कैलोरी अपने नापो।   
अब जो नए लोग होंगे, अगलगीर, बगलगीर,राहगीर, वो इन बातों को सुन के कहेंगे देखो केतना हेल्थ कोंशियस है। केतना विद्वान है मारे सब के सब। केतना पते का बात कह रहा है कि दारु बड़ी ख़राब चीज़ है। बर्बादी है बर्बादी!
लेकिन हम तो उनके घनघोर मित्रों में से हैं। उनके नस-नस से वाकिफ़ हैं। वो प्रवचन नहीं दे रहे हैं नई पब्लिकों, वो छनरछाँव कर रहे हैं। अभी तो उनके nutritional science के असीम ज्ञान के चुआन कि पहली धार है जो तुम सुन के और गच्च हो के आगे बढ़ जा रहे हो। पूरा ज्ञान पाने के लिए बैठना पड़ता है, ठहरना पड़ता है और तुमजो है से कि घप्प लिट्टी टप्प सिंघाड़ा वाला कैप्सूल कोर्स के फेरा मे पड़े हुए हो। 
अभी तो वो सब अलाप ले रहे हैं ,रेघा रहे हैं। माहौल बना रहे हैं। वो पूरी मंडली को क्रॉस चेक कर रहे हैं। तफ़्तीश कर के देख रहे हैं कि कितने दोस्तों का सुरूर, दारु की चर्चा से पुनर्मूषिको भवः की तरह जगता है। वो जानते हैं कि सारे दोस्त चूहा बनने के लिए व्यग्र हैं लेकिन कहानी तो बिल्ली से शुरू करने है, फ़िर कुत्ते पर ले जाना है।  बाद में भेड़िया आएगा, फ़िर चीता आएगा और जब अंत में मामला बाघ-शेर तक पहुँच जाएगा तब हम क्रीम बिस्किट का झोला निकलते हुए पूछेंगे -- अरे! चाहते क्या हो,ये बताओ न यार। पीना है तो चलो नहीं तो सभा करो विसर्जित। अब, जब सब छनरछाँव करिये रहे हैं तो हम काहे पीछे रहें। हम काहे डायरेक्टली बोलें की तुम लोग पियो न पियो,  हमको तो पीना है। तब हममे से पाँचवा एकदम्म से शुरुआत के पांच ओवर में चौबीस रन प्रति ओवर की रेट से ठोकाये हुए बॉलर की तरह बोलेगा- आपलोग देख लीजिये, आई एम ओक्के विथ एनी प्लान। वैसे दारु बड़ी ख़राब चीज़ है। बर्बादी है बर्बादी। पैसे की भी और सेहत की भी।"    
इसी को कहते हैं छनरछाँव करना। 
(मेरे आगामी व्यंग्य लेख "चल चमेली बाग़ में" उर्फ़ छनरछाँव का एक अंश। 
(Claimer: इस घटना का कुछ जीवित लोगों से पुरकस सम्बन्ध है और इसमें कुछ भी 
co-incidence नहीं है एवं यह प्रस्तुति केवल मनोरंजन के लिए नहीं है! )