Wednesday, November 7, 2018

फेसबूकिया क्रन्तिकारी

कामकाजी आदमी ---- संविधान को मानते हो ?
फेसबूकिया क्रन्तिकारी ---- क्या बात करते हो यार..... एकदम मानते हैं। 
कामकाजी आदमी ---- अच्छा, जब केंद्र या राज्य सरकार कोई काम संविधान द्वारा प्रदत्त शक्तिओं के प्रयोग से करे तो वो उचित है या अनुचित?
फेसबूकिया क्रन्तिकारी ----  बड़ा विचित्र आदमी हो यार ! मने कुच्छो बोल देना है। अरे! संविधान ही इस देश का एकमात्र ग्रन्थ है जिसे हर भारतीय नागरिक को मानना ही मानना है। 
कामकाजी आदमी ---- पक्का .... तुमको लगता है कि सबसे मनवाया जा सकता है। 
फेसबूकिया क्रन्तिकारी ----  काहे नहीं ?
कामकाजी आदमी ---- अच्छा छोड़ो, उस बात पर बाद में आएंगे नहीं तो मामला सांप्रदायिक हो जाएगा।  तुमको ख़ूब अच्छे से पता है कि किनके लिए कौन सा ग्रन्थ सर्वोपरि है। इसलिए आते हैं उसी बात पर। 
फेसबूकिया क्रन्तिकारी ----  अरे यार! कह त दिए कि संविधानिक तरीके से किया गया कोई भी काम ग़लत नहीं हो सकता। 
कामकाजी आदमी ---- एकदम्मे rancho हो तुम भी, बड़े काम का बन्दर, मारे तो धरमेंदर नाचे तो जीतेन्दर type. मने की सब बतवा तुम्हीं को बोलना है। 
फेसबूकिया क्रन्तिकारी ----  साफ़-साफ़ बको न यार, इतना टाइम नहीं है हमरे पास। जाना है facebook पर क्रान्ति लाने, सरकार को बिना जाने बुझे हर बात में गरियाने ताकि मेरे अंदर का जागरूक नागरिक कहीं waste न हो जाए। 
कामकाजी आदमी ---- हाँ, हाँ एकदम जाओ। 6 से 8 घंटा रोज़ facebook पर क्रांति का बिगुल बजाना कोई हंसी ठट्टा थोड़े न है लेकिन जाने के पहले नीचे एक लिंक है उसको पढ़ लेना जब श्रद्धा हो। कोई शहर या राज्य तुमरा 80 cc का मोपेड नहीं है कि जब चाहे उसका नाम 'रामप्यारी',' रामदुलारी' या danger boy, 'काल का भक्त' टाइप्स बदलते रहो, समझ्यो की नहीं। इसके लिए पूरी तरह संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है बाबू। फिलहाल भारतवर्ष में कोई भी सत्ता किसी शहर या राज्य का नाम मोपेड या अपने पालतू कुत्ते की तरह नहीं बदल सकता और अगर किसी शहर का नाम बदला है तो वह संविधान के दायरे में ही बदला है। 
फेसबूकिया क्रन्तिकारी ----  लेकिन उसका जरुरत क्या था, भले संविधान के दायरे में ही बदला हो। 
कामकाजी आदमी ---- एक काम कल्लो बेटा, जनता के द्वारा चुनी गयी सरकार क्या चाहती है ये भी तुम facebook पे ही बैठ के तय करो, ठीक है। तुमरे जैसे लोगों को गैंग ऑफ़ वासेपुर part 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7.......बनाना चाहिए, बहुत्ते rise करोगे। 

https://www.gktoday.in/gk/process-of-creation-of-new-states-and-changes-in-names-of-states-in-india/

Sunday, September 10, 2017

"ये भिया, ई में नुक्ता लगेगा कि नहीं लगेगा"

"ये भिया, ई में नुक्ता लगेगा कि नहीं लगेगा"

दो मित्र थे। एक का नाम ढ़पोरी और दूसरे का नाम गपोड़ी। दोनों आमने सामने रहते थे। 2000 साल तक ढ़पोरी ऐसी चीज़ों पर विश्वास करता रहा जो बहुत clear shape में नहीं थे। और उसका मित्र गपोड़ी उसे इस बात के लिए लगातार 2000 साल तक गरियाता रहा और कहता रहा कि ये सब अन्धविश्वाश है। इसी बीच अन्धविश्वासों को मन भर कर जी लेने के बाद ढ़पोरी को नुक्ता लगा के ये ख्याल या कि क्यूँ न जरा नुक्ता लगा के ऐसी चीज़ों का अध्ययन कर लिया जाए जो clear shape में हैं और जिन पर आसानी से विश्वास किया जा सके। सो अगले 2000 साल वह विज्ञान और अन्य विषयों को पढता रहा। 
इधर अपने नाम अनुरूप इन 2000 सालों में गपोड़ी, पूरी बस्ती में अपने मित्र ढ़पोरी के लगातार 2000 साल तक अंधविश्वासी बने रहने की बातें सुनाता और उसको गरियाता। 
4000 साल बीत गए। ढ़पोरी ने कायदे से नुक्ता लगा के सब विषयों को अध्ययन किया और पाया कि वाह!..... यही तो भौतिकी (Physics) है। तब उसने वापस पहले वाले 2000 साल की बातों पर गहराई से मनन किया तो पाया कि वाह! वाह!...... यहाँ तो पराभौतिकी (Metaphysics) था, बस उसने अगले 2000 साल तक एक नई दृष्टि से उसका मनन किया। इधर गपोड़ी अपने गरियाने के काम में निष्ठा से लगा रहा। 
तो जी बिना नुक्ता लगाए 6000 साल बीत गए और अगले 4000 साल तक ढ़पोरी भौतिकी और पराभौतिकी के सम्बन्ध को समझने में भिड़ा रहा और उधर गपोड़ी...........
तो अब situation यह है कि  ढ़पोरी को तो पता है कि आस्था क्या है, अन्धविश्वाश क्या है और विज्ञान क्या है? उसको ये भी पता है कि जिन सवालों पर भौतिकी भी निरुत्तर है, वहां पराभौतिकी के पास आगे सोचने का मसाला अवश्य है, भले सीधे उत्तर दे या न दे। 
तो ये रहा 10,000 वर्षों का हिसाब-किताब। ढ़पोरी का नाम आज भी ढ़पोरी है लेकिन, उसको पता है कि कब घप्प लिट्टी भौतिकी में घुसना है और कब टप्प सिंघाड़ा पराभौतिकी में घुस जाना है। उधर गपोड़ी पूरी निष्ठा से गप सुनाने और गरियाने में व्यस्त है। बस एक progress हुआ कि गपोड़ी आजकल हर शब्द में नुक्ता लगाने लगा है। 
निर्मल अगस्त्य 
10-09-2017 
पटना                      

पोस्टमार्टम - पोस्टमार्टम खेलों न यार, बड्डी मज़ा आता है !

पोस्टमार्टम - पोस्टमार्टम खेलों न यार, बड्डी मज़ा आता है ! 

मेरे परिवार में लगभग 40 ऐसे व्यक्ति हैं जिनकी पढ़ाई लिखाई छोटे शहरों के साधारण विद्यालयों और महाविद्यालयों में हुई। उनमें से बहुतों ने तो पटना यूनिवर्सिटी का गेट तक नहीं देखा, दिल्ली, बनारस तो बहुत दूर की बात है। दो ऐसे भाई हैं मेरे, जो पटना यूनिवर्सिटी से I. Sc. करने के बाद अपने छोटे से शहर में वापस लौट गए जबकि उनके marks टॉप 5 में थे। तब आप सोचिये कि कितने करोड़ बच्चें हैं, जो साधारण स्कूलों और महाविद्यालयों में पढ़ते हैं। मेरे उन 40 रिश्तेदारों में लगभग 90 प्रतिशत लोग आज किसी न किसी संस्था में टॉप position पर हैं। तो मेरे जैसे बाक़िओं के रिश्तेदार-परिचित भी कुछ न कुछ अच्छा कर ही रहे होंगे। 
मैंने स्वंय B. D. Evening College से इंटर और T,P,S. college से graduation किया।  मैं भी मिला जुला के ठीक ही कर रहा हूँ। बहुत बड़ा सेलिब्रिटी तो नहीं हूँ लेकिन दो-तीन domain में अच्छी शाख है, नाम भी है। 
इसका अर्थ ये हुआ की इन साधारण विद्यालयों और महाविद्यालयों में पढ़े बच्चे अपने हिसाब से इतना कर रहे हैं कि उनपे ग्रन्थ भले न लिखा जाए लेकिन संतोष और गर्व किया जा सकता है। 
लेकिन इनकी चर्चा कभी नहीं होती। और होगी भी नहीं क्यूंकि ये किसी बड़े नामी educational institutions के प्रोडक्ट नहीं हैं। पटना हाई स्कूल में मेरे C सेक्शन के अधिकाँश मित्र आज well placed हैं और अच्छा कर रहे हैं। लेकिन इनकी चर्चा भी नहीं होती। 
कोई ये बता सकता है कि कितने IAS, IPS, DOCTORS, SCIENTISTS, ENGINEERS, ARTIST, SPORTSMAN इत्यादि B. D. Evening College जैसे छोटे और साधारण महाविद्यालय के pass out हैं। कोई नहीं बताएगा। बताना भी नहीं चाहेगा। और देश में ऐसे कितने छोटे और साधारण शिक्षण संस्थाएं हैं आप स्वंय पता कीजिये। 
जब सम्पूर्ण राष्ट्र JNU जैसे मुठ्ठी भर संस्थानों के intelligence से चल रहा हो तो ये सब बातें पता करने की न तो आवश्यकता है, न गरज। 
यही है ब्राह्मणवाद जिसका ब्राह्मण होने या न होने से कोई लेना देना देना नहीं है। यही है ब्राह्मणवाद जब किसी जीवनदायिनी स्रोत को किसी विशेष संस्था या व्यक्ति से जोड़ दिया जाता है। इससे बड़ा ब्राह्मणवाद और कुछ नहीं हो सकता कि सारा talent, intelligence, और देश का भविष्य केवल JNU जैसे संस्थानों से ही पढ़ के आता है। 
कमाल की बात है कि लोग ब्राह्मणवाद से घृणा करते हैं, व्यवहारिक रूप से  ब्राह्मणवाद में सबसे अधिक वही संलिप्त पाए जाते हैं।  
निर्मल अगस्त्य 
10-09-1017
पटना। 
(नोट- 1017 इसलिए लिखा मैंने कि हम तो बड़ी संस्थानों में पढ़े नहीं, इसलिए 1000 साल पीछे तो रहेंगे ही ना।)     


Monday, April 25, 2016

"जियो मेरे लाल, पीले, हरे गुडविल एम्बेसेडर।



क़रीब 18 साल पहले की बात है। मेरा एक मुहल्ला मित्र था - संजीव। कराटे में ब्लैक बेल्ट होने के साथ-साथ उसकी अभिरुचि सांस्कृतिक गतिविधिओं में भी थी। मारे हमसे उसको एतना लगाव था की हर पाँच दिन पर चला आता था हमको किसी न किसी संगीत के मुहल्ला लेवल कॉम्पिटिशन में जज बनाने। हम भी लपक लेते छरदनिया मार के।  एक बार आ के बोला कि बन्धु, डाक तार स्पोर्ट्स क्लब में एक पेन्टिंग कॉम्पिटिशन में चलना है। हम उस वक़्त पेन्टिंग नहीं करते थे और जो करते थे वो हर शनिच्चर को झाड़ू के साथ फेंका जाता था सो पेन्टिंग में मेरा कॉन्फिडेंस उस सोड्डा की तरह था जिसे सर्फ़ एक्सेल के सामने बिठा दिया गया हो। पहली बार उसको ना किये।  क़सम से, भीतर एतना दुःख हो रहा था कि बता नहीं सकते लेकिन उस छनमतहा उमर में भी हमको इतनी समझ थी कि पेन्टिंग कॉम्पिटिशन में जज बन के नहीं जाना उचित है।  तब हमको ध्यान आया की पीछे शिवनारायण चौक पर प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट नीरद जी रहते हैं जिनसे मेरा परिचय काफी पुराना था। A man in need is friend indeed के सिद्धान्त पर अमल करते हुए हम पैरवी लेकर नीरद जी के घर चले गए। तय तमन्ना हो हो गया की कब कितने बजे जाना है, कितना देर ठहरना है, आदी, इत्यादी। हम भी उस दिन गए तब पहले बार आज के एक और प्रख्यात और superbly talented कार्टूनिस्ट से पहली बार मुलाक़ात हुई जिन्हे आप सब आज पवन के नाम से जानते हैं। तक़रीबन हमरे कद काठी और उम्र के थे पवन जी उस वक़्त। आज उनकी प्रसिद्धी और मूँछें, दोनों घनी हो गयीं लेकिन हम ज़रा ओझरा गए और प्रसिद्धि और मूँछें तो मिली लेकिन थोड़ी sophisticated वाली।  ख़ैर, मुद्दे पर आते हैं। उस वक़्त हम भी नवे-नवे और पवन जी भी नवे-नवे सो वार्तालाप के आलाप से झाला तक हम दोनों गाते-बजाते रहे। 


जब हम उस कॉम्पिटिशन के प्रतियोगिओं के पेन्टिंग्स को मुग्ध हो कर देखने लगे तब लगा की जज बनने का आमन्त्रण स्वीकार न करना एक wise decision था। पेन्टिंग कॉम्पिटिशन का जज उसे ही बनना चाहिए जिसे पेन्टिंग की समझ हो। एक हम हैं जो बड़े कुन्ठित माहौल में पले बढ़े तब भी इतनी समझ आ गयी मगर ------ 


जी हाँ, मगर सलीम खान ये नहीं समझे की स्पोर्ट्स के छेत्र में इतनी बड़ी-बड़ी हस्तियों के कुशलपूर्वक जीवित होते हुए उनके लाल, पीले, हरे का Indian Olympic Association का गुडविल एम्बेसेडर बनाना एक भद्दा प्रक्रम है मानों अमिताभ बच्चन को popularity और fund raising icon होने के कारण ISRO का chairman बनाया जा रहा हो। अमाँ,  इहे सब लूर लक्षण के चलते हम entertainment fraternity के लोग  नचनिया बजनिया कहाते हैं। उस पर जब बड़े-बड़े खेल के महारथी आपत्ति कर रहे हैं तो सलीम जी Tweet पे Tweet जोते हुए हैं कि India को तो world के नक़्शे पर Bollywood ले आया वर्ना India तो नक़्शे पर था ही नहीं। 


सलीम अंकल, ऐसा है कि आप Political Geography पर ज़्यादे मेहनत कर दिए हैं।  थोड़ा बाक़ी चीज़ भी पढ़ा कीजिये तो आपको पता चल जाएगा कि यूरोप और अमेरिका के समझदार लोग India को किन कारणों से जानते हैं। इ रोड पर घूमने वाला कोई हिप्पी इनको कह दिया होगा कि आप Bollywood country का है सो एकदम्मे trance में चल गए हैं। यही confusion एक बार कपूर खानदान को हो गया था की Russia में इंडिया की पहचान तो मेरा जूता है जापानी से है। बहुत हुआ प्रभु, अब Narcissism से बाहर निकलिए। जेतना देर में आपका लाल, पीला, हरा ड्रेस बदलेगा, ओतना देर में त रेस खतमो हो जाएगा। आपके बेटा को ई सब politician मामू बना रहा है। दिल का बुरा है या नहीं ये आप ही जानते होंगे लेकिन अभी उसपे केस भी चल रहा है प्रभु।  ऐसा न हो की ग़लत जगह पर छमकने के चक्कर में Badwill नाम का नया word dictionary में आ जाए। आपही सोचो कि अगर विराट कोहली या सचिन तेंदुलकर को सेन्सर बोर्ड का चेयरमैन बन दिया जाए तो आपको कैसा लगेगा। आप शर्तिया अगिया वेताल हो जाईयेगा।  वैसेही आज हम हो गए हैं। 



"निर्मल अगस्त्य।"
    
10:49 AM, 26-04-2016 
पटना, बिहार। 


Sunday, April 24, 2016

"आम (Mango) का इलेक्ट्रॉनिक कॉन्फ़िगरेशन!"

एक बार zoology के practical exam में spot test चल रहा था। external ने formalin में रखे एक फल को दिखा एक student से पूछा -

"ये क्या है ?"
"सर, सपाटू है। "
"सपाटू मतलब ?"
"सर वही जिसको दुनिया चीकू कहती है।"


सर ने उसे उस प्रश्न में zero दिया और कहा-
"यही पढ़ाई किये हो। आम तुमको चीकू दिखाई पड़ रहा है।" 
लड़का एकदम से क्रान्तिवीर वाली mode में आ गया। लगा बेंच कुर्सी पर उछलने कूदने। 
चिल्ला चिल्ला कर कहने लगा। 

हम क्या जाने आम और अनार। हम जैसे लोगों के नसीब में तुम्हारे पूर्वजों की वजह से आम-अनार जैसा फल कभी आया ही नहीं। तुम्हारे पूर्वजों ने आम और अनार अपने लिए रखा और हम जैसे लोगों को बनफुटका और जंगली बेर जैसे फल खाने पड़े। बरसात के मौसम में जब आम का घटिया variety जैसे फजली आ जाता तब तुम्हारे पूर्वज कभी दया के नाम पर तो कभी दान के नाम पर भिजवा देते और वो भी जब घर में सब खा के अघा चुके होते।  हम क्या जाने आम और अनार जैसा फल। 

external उसके विद्रोही तेवर को देख एकदम से P.H.D. होल्डर वाली confidence से लबरेज़ ब्रेकिंग न्यूज़ वाली ग़रज़ से सीधे मूक बधिर समाचार वाले अक्षर हो गए। उधर बच्चे ने उठाया एक फोर्मलिन वाला ज़ार और धड़ाक से पटक दिया। आवाज़ सुन कर प्रिंसिपल साब scene में आये। 

"क्या हो रहा है ?" 
"अरे! ये आम को चीकू कह रहा है। उसी पर हमने नंबर काट लिया तो अब नाना पाटेकर बन गया है।"

तब तक पता नहीं किसने अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ावर्ग आयोग में फ़ोन घुमा दिया और कहा की किसी मनुवादी को रंगे हाथों पकड़ना है तो जल्दी से फलां कॉलेज के फलां रूम में पहुँचिये। उधर formalin के ज़ार टूटते रहे और इसी बीच तीनों आयोगों के अध्यक्ष अपने लाव-लश्कर के साथ वहां पहुँच गए। 

भारी घमासान मचा।  External इस बात पे अड़ा रहा कि आम को आम कहलाने के लिए उन सामाजिक कुरीतिओं से क्या मतलब। Oxygen का electronic configuration हर धर्म, हर जात, हर वर्ग के लोगों के लिए एक ही होगी। ऐसा थोड़े न है कि कोई मनुवादी है तो उसके लिए Chromium, P-ब्लॉक Element हो जायेगा। ऐसा थोड़े है की Eienstien ने E = Delta MC Square यहुदिओं के लिए लिखा या Heisenberg's Uncertainty Principle केवल Christian के syllabus में लागू होता है। यही बच्चा जब डॉक्टर बनेगा तो क्या इसके लिए डॉक्टरी के नियमों में ढील दे दे जायेगी या इसे भी उसी सेट standard of treatment को follow करना पड़ेगा। लेकिन सब हो हल्लम में ऐसे उलझे कि Chromium बेचारा कब का घबड़ा कर S-block में जाकर Hydrogen और Lithium के बीच में छुप गया।    

तब तक कमबख़्त, कुख्यात से कुख्यात वेश्याओं को लजा देने वाली Media भी वहाँ पहुँच गई और शुरू हो गया online editing के साथ लाइव telecast जिसमे दिखाया जाने लगा कीं कैसे एक मनुवादी External एक बच्चे से उस फल का नाम आम कहलवाना चाह रहा है जिसे उस बच्चे के पूर्वज इस मनुवादी External के पूर्वजों की वजह से कभी खा नहीं पाये। तीनों आयोगों के अध्यक्ष ने इस सौदे पर उस External को court में न घसीटने की आश्वासन दिया कि पहले तो बच्चे को पूरे मार्क्स दिए जाएँ क्यूँकी एक रिज़र्व केटेगरी का बच्चा आम को फल कह दे वही काफी है और दूसरा कि कैमरे के सामने वह उस बच्चे से माफ़ी मांगे। आदमी को Homo-sapiens कहने की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ General Category के छात्रों की है। एक Reserve category का बच्चा उसे प्राणी वर्ग के अन्दर जो मन चाहे कहे, चलेगा। 


External अड़ गया और यही Honesty उसके पिछवाड़े पड़ गया। आज आठ साल बीत गए आयोग में जा जा के स्पष्टीकरण देते देते। उधर वो बच्चा उसके दो साल बाद Medical में Compete कर गया और आज तक first year में ही पढ़ता हुआ Hippocrates के छाती पर मूँग के साथ-साथ हर वो चीज़ दल रहा है जो  मनुवादियों के पूर्वजों ने उन्हें खाने नहीं दिया था। 

कहानियाँ, कहानियाँ होती हैं। बेसी दिमाग़ लगाने का नै। उसके लिए हम जैसे ग़ाली को प्रसाद, लत्तम जुत्तम को inspiration और मौत को पुरस्कार समझने वाले फेसबुकिया लेखक हैं जिन्हें साहित्य की मुख्य धारा में आने का कोई हक़ नहीं है। 

(नोट: मैं ऐसी किसी भी कुरीति का समर्थक नहीं हूँ जो मनुष्यता के लिए अभिशाप है। और मैं इस बात का भी समर्थक नहीं हूँ कि पायदान में निचली सीढ़ी पर बैठे लोगों के लिए जगह बनाने के लिए पायदान में अपनी योग्यता के कारण ऊपर खड़े लोगों की टाँगे काट दी जाये। नीचे वालों को ऊपर लाना हमारी ज़िम्मेदारी है लेकिन अपनी योग्यता के कारण ऊपर रहने वाले लोगों भी  दरकिनार न हों ये भी हमारी ही ज़िम्मेदारी है।  ये मनुवादी-मनुवादी का चोंचला कर कुछ लोग अपना नुकसान एक नए सिरे से कर रहे हैं।  मेरा मनुस्मृर्ति से कोई लेना देना नहीं है। न ही मैं मनु से कभी मिला हूँ और न ही अपने सामान्य जीवन में मुझे इन हज़ारों वर्ष पुरानी धारणाओं की आवश्यकता है। मुहिम गावों में चलाइए, वहां अभी भी असमानता है। शहर में आज हमलोग सालों साथ गुजरने के बाद भी किसी की जात पूछने नहीं जाते। मेरे बचपन में जब मैं purnea में था तो मेरा सबसे प्यारा दोस्त किस जाती का था वो मुझे मैट्रिक में आ के accidentally पता चला। हर सवर्ण बुरा या अत्याचारी नहीं होता और कभी शोषित रहा व्यक्ति स्थिति बदलने पर शोषकों की तरह व्यवहार न करे, इसकी गारन्टी कोई नहीं दे सकता। )  


निर्मल अगस्त्य। 
08:05 PM, 24-04-2016
पटना, बिहार।       
  



-- 

Monday, April 4, 2016

नया धर्म मतलब निन्यानबे का फेरा !


अपने धर्म में अगर कोई विकृति, भ्रान्ति और आडम्बर हो तो उसे दूर करने का प्रयास सदैव सराहनीय है और अपने धर्म के पाखण्ड और विकृति से पीछा छुड़ाने के लिए नया धर्म बना लेना कुछ वैसा ही है जैसे अपने शराबी और मार-पीट, गाली-गलौज करने वाले बाप को सुधारने का प्रयास करने की बजाये एक दूसरा बाप ढूँढ लेना। बुद्ध ने यही किया, मिला क्या ? समय के साथ उस नए धर्म में भी दुराचार और भ्रष्टाचार फ़ैल गया। laughing buddha से लेकर sleeping, smiling, dancing  buddha बाज़ार में बिकने लगे जबकि बुद्धा ख़ुद मूर्ति पूजा के विरोधी थे। हज़रत मोहम्मद ने नया धर्म बनाया।  क्या मिला ? लोग समझ नहीं पाये की उनके बनाए क़ायदे एक ख़ास भौगोलिक और सामजिक स्थिति को देख कर बनाए गए थे जबकि मुस्लिम रेगिस्तान में चलने वाल क़ायदा switzerland और अंटार्टिका में भी चलाना चाहते हैं।  छोटा pant, लम्बी दाढ़ी, आँखों में सुरमे का औचित्य सारे भू-भाग पर नहीं है।  यही चर्चों और पादरीओं के समाज में होने लगा। भाई नया धर्म कोई Vaccine नहीं है।  हर धर्म को मानने वाले वही हाड़-मांस के homo-sapiens हैं जिनके कार्यकलापों से धर्म की परिभाषा बदल जाती है। आप एक धर्म बताईये जो बाद में बना और किसी भी तरह की विकृति से मुक्त रहा। ये विकृति तो आनी है क्यूँकि पहले धर्म इंसान को चलाता है बाद में इंसान धर्म को चलाने लगता है। 



सभी धर्म जीवनशैली, भौगोलिक स्थिति, सामजिक स्थिति और feasibility of sustenance को ध्यान में रख कर बनाया गया है जो पृथ्वी के हर भाग पर पूरी तरह लागू नहीं हो सकता। हर धर्म में कुछ ऐसी बातें हैं जो कालजयी हैं और पृथ्वी के हर हिस्से में समान रूप से लागू हो सकती हैं। धर्म बदलना या नया धर्म बन लेना कोई समाधान हो ही नहीं सकता।  ये निन्यानबे का फेर है भैया जो लाख बुद्ध, लाख महावीर और लाख हज़रत मोहम्मद उपाए कर लेते पूरे 100 नहीं होता। क़ायनात का कोई धर्म नहीं होता। सच का कोई धर्म नहीं होता। मैं बिलकुल भी विधर्मी नहीं हूँ और अपने धर्म को एक अच्छी आदत के तरह अपने जीवन में रखता हूँ और जो ग़लत, अमानवीय या पाखन्ड लगे उस हिस्से को बिना हिचके त्याग भी देता हूँ। 


एक धर्म मर गया तो हज़ारों नए धर्म अस्तित्व में आ जायेंगे लेकिन मनुष्यता मर गयी तो न तो कोई धर्म होगा न बात बात पे धर्म बनाने वाले लोग होंगे। 

निर्मल अगस्त्य। 
12:31 A.M.
05-04-2016
पटना, बिहार।       

Wednesday, March 16, 2016

"एक्स्ट्रा में से"

'कहानी'                                                                                         "निर्मल अगस्त्य"

एक सोमवार मैं तीन लीटर दूध लेकर शिवलिंग पर डालने जा रहा था। रास्ते में एक भूखा आदमी दिखा। मैंने पूरा दूध उसको पिला दिया ताकि उसके शरीर में ताक़त आ सके और वो उस दिन मेहनत कर अपनी रोज़ी रोटी सके। अगले दिन मैं फिर तीन लीटर दूध लेकर शिवलिंग पर डालने जा रहा था। फिर से वही आदमी दिखा और वो भूख से अधमरा सा लग रहा था। मैंने फ़िर से पूरा दूध उसको पिला दिया ताकि उसके शरीर में ताक़त आ सके और वो उस दिन मेहनत कर अपनी रोज़ी रोटी सके। ये घटना कई दिनों तक हुई। मुझे लगा की शायद लोगों ने उसे काम ही नहीं दिया होगा और इसी कारण उसे हर उस आदमी का इन्तज़ार रहता था जो उसे अपने अति में से, फ़ालतू में से या एक्स्ट्रा में से उसे कुछ दे सके। 

एक दिन हमेशा की तरह जब मैं दूध लेकर शिवलिंग पे डालने जा रहा था तो मुझे वहीँ पर अब दो आदमी दिखे। एक तो वही आदमी था जिसे मैंने तकरीबन बीस दिन तक दूध पिलाया था और अब उसकी हालत कुछ ठीक लग रही थी और दूसरा एक नया आदमी था जो पहले वाले से ज़्यादा कमज़ोर लग रहा था। अब मेरे पास एक चारा था कि मैं उस दूध को दो हिस्सों में बाँट कर उन दोनों को दे दूँ और मैंने वही किया। धीरे-धीरे उस जगह पर वैसे लोगों की संख्या बढ़ने लगी और मेरा तीन लीटर दूध उन लोगों के लिए काम पड़ने लगा। 

मैं इस बात पर बेहद चिन्तित था कि अगर बेरोज़गारी की यही अवस्था रही तो देश समाज की क्या हालत होगी। एक दिन मैंने सोचा कि मैं छुप कर उनके पीछेे जाऊँ और देखूँ कि वो पेट भर जाने के बाद काम की तलाश किस इलाक़े में करते हैं। हर एक के पीछेे जाना सम्भव नहीं था इसलिए मैंने ठाना कि हर दिन किसी एक आदमी के पीछेे जाऊँगा और साथ-साथ अब मैं तीन की जगह दस लीटर दूध उन सबों को बराबर-बराबर बाँटने लगा। 

वो तक़रीबन चालीस आदमी थे और मुझे भी इस बात को पता करने में चालीस दिन लगे कि काम की तलाश किस इलाक़े में करते हैं। और सच्चाई जान कर मेरा मन विकृत हो गया। उनमें से बत्तीस लोग ऐसे थे जो दूध पीने के बाद या तो अपने-अपने ठिकाने चले गए या फिर किसी और अति, फ़ालतू या एक्स्ट्रा वाले के इन्तज़ार में किसी और नुक्कड़ या रस्ते पर जा कर बैठ गए। उनमे से मात्र आठ लोग ऐसे थे जिन्होंने पेट भरने के बाद काम की तलाश ज़ारी रखी। तकरीबन पन्द्रह दिन और बीते तब उन आठ में से दो लोगों को छोटा मोटा काम मिल गया और उन दोनों ने उस स्थान पर आना बन्द कर दिया जहाँ मैं दूध बाँटा करता था। 

ऐसे करते करते  बीते और उनमे से चार और लोगों को काम मिल गया और उन चारों ने भी उस स्थान पर आना बन्द कर दिया जहाँ मैं दूध बाँटा करता था। ऐसे करते-करते आठ महीने बीत गए पर उस आठ में से दो लोगों को कोई काम नहीं मिला। इधर  इन आठ महीनों में बीस पच्चीस नए लोग भी आ गए जिनमे से कुछ ही दूध से पेट भरने के बाद उन आठों की तरह काम पर जाते दिखे जबकि बाकी उन बत्तीसों की तरह पेट भरने के बाद अपने-अपने ठिकाने पर जा के सोते देखे गए। 

जब मैंने हिसाब लगाया तो पता चला की उनमे औसतन मात्र बीस प्रतिशत अर्थात 8 लोग पेट भरने के बाद काम की तलाश में निकले और उस बीस प्रतिशत में से 75 प्रतिशत अर्थात 6 लोगों को देर सवेर काम मिल ही गया लेकिन उस बीस प्रतिशत में से 25  प्रतिशत अर्थात दो लोगों को काम नहीं मिला। अब हिसाब ये था की चालीस लोग में से आठ लोग काम मांगने गए और उनमे से मात्र दो को नहीं मिला तो बेरोज़गारों का वास्तविक प्रतिशत 5% निकला जबकि उनमें से 80 प्रतिशत लोगों ने पेट भर जाने के बाद अपने भविष्य के लिए उपक्रम करने की बजाये आराम करना ज़्यादा मुनासिब समझा। 

तो ये था मेरा प्रयोग जिसमे मैंने पाया कि आप अपना क़तरा-क़तरा भी बाँट देंगे तब भी माँगने वाले या जरूरतमन्दों की संख्या कम नहीं होगी क्यों वास्तविक ज़रूरतमन्द तो वो लोग हैं जो काम की तलाश करते हैं लेकिन किसी कारणवश काम नहीं मिलता और उनकी संख्या मुट्ठी भर है जबकि उनमे से अधिकांश अपने पूरी ज़िन्दगी इस संघर्ष में लगा रहे हैं कि दूध शिवलिंग पर चढ़ाये जाने की बदले जरूरतमन्दों में बाँट देना ज़्यादा सही है। उनमे से कुछ मुट्ठी भर अतिक्रियावाद को अपना लेते हैं और फिर छीन या लूट कर लेना अपना मानवीय अधिकार समझने लगते हैं। 

मैं मानता हूँ की खाद्य पदार्थ जैसे दूध, दही, फल-फूल, मिठाई, अन्न जैसी वस्तुओं को ईश्वर के नाम पर व्यर्थ कर देना सही नहीं है लेकिन इसे छद्म, झूठे या कर्महीन लोगों में बाँट देना उस से भी बड़ा अपराध है क्यूँकि इस से भविष्य में सामाजिक व्यवस्था के डगमगाने का डर रहता है। असली ज़रूरतमन्द की मदद करने में कोई बुराई नहीं है। ऐसे हज़ारों लोग हैं जिन्हें किसी ने मदद की तो उन लोगों ने उस मदद से आई शक्ति को अपने भविष्य के निर्माण में लगाया। हज़ारों ऐसे लोग हैं जो अपने मेहनत की बदौलत रंक से राजा बने। ऐसे हज़ारों लोग हैं जिन्होंने मदद को अपना हक़ न समझ कर भविष्य तराशने का एक औज़ार समझा। 
सबों से मेरी गुज़ारिश है कि वास्तविक और छद्म जरूरतमन्दों में अन्तर समझें। किसी के बदन पर कपड़े  न हो या वो कई दिनों से भूखा हो तो मदद तभी करें जब वह अपने  भविष्य  मैं  सकारात्मक रूचि रखता हो न की लोगों के अति, फ़ालतू या एक्स्ट्रा में। 

10:54, 16/03/2016
पटना।