"ये भिया, ई में नुक्ता लगेगा कि नहीं लगेगा"
दो मित्र थे। एक का नाम ढ़पोरी और दूसरे का नाम गपोड़ी। दोनों आमने सामने रहते थे। 2000 साल तक ढ़पोरी ऐसी चीज़ों पर विश्वास करता रहा जो बहुत clear shape में नहीं थे। और उसका मित्र गपोड़ी उसे इस बात के लिए लगातार 2000 साल तक गरियाता रहा और कहता रहा कि ये सब अन्धविश्वाश है। इसी बीच अन्धविश्वासों को मन भर कर जी लेने के बाद ढ़पोरी को नुक्ता लगा के ये ख्याल या कि क्यूँ न जरा नुक्ता लगा के ऐसी चीज़ों का अध्ययन कर लिया जाए जो clear shape में हैं और जिन पर आसानी से विश्वास किया जा सके। सो अगले 2000 साल वह विज्ञान और अन्य विषयों को पढता रहा।
दो मित्र थे। एक का नाम ढ़पोरी और दूसरे का नाम गपोड़ी। दोनों आमने सामने रहते थे। 2000 साल तक ढ़पोरी ऐसी चीज़ों पर विश्वास करता रहा जो बहुत clear shape में नहीं थे। और उसका मित्र गपोड़ी उसे इस बात के लिए लगातार 2000 साल तक गरियाता रहा और कहता रहा कि ये सब अन्धविश्वाश है। इसी बीच अन्धविश्वासों को मन भर कर जी लेने के बाद ढ़पोरी को नुक्ता लगा के ये ख्याल या कि क्यूँ न जरा नुक्ता लगा के ऐसी चीज़ों का अध्ययन कर लिया जाए जो clear shape में हैं और जिन पर आसानी से विश्वास किया जा सके। सो अगले 2000 साल वह विज्ञान और अन्य विषयों को पढता रहा।
इधर अपने नाम अनुरूप इन 2000 सालों में गपोड़ी, पूरी बस्ती में अपने मित्र ढ़पोरी के लगातार 2000 साल तक अंधविश्वासी बने रहने की बातें सुनाता और उसको गरियाता।
4000 साल बीत गए। ढ़पोरी ने कायदे से नुक्ता लगा के सब विषयों को अध्ययन किया और पाया कि वाह!..... यही तो भौतिकी (Physics) है। तब उसने वापस पहले वाले 2000 साल की बातों पर गहराई से मनन किया तो पाया कि वाह! वाह!...... यहाँ तो पराभौतिकी (Metaphysics) था, बस उसने अगले 2000 साल तक एक नई दृष्टि से उसका मनन किया। इधर गपोड़ी अपने गरियाने के काम में निष्ठा से लगा रहा।
तो जी बिना नुक्ता लगाए 6000 साल बीत गए और अगले 4000 साल तक ढ़पोरी भौतिकी और पराभौतिकी के सम्बन्ध को समझने में भिड़ा रहा और उधर गपोड़ी...........
तो अब situation यह है कि ढ़पोरी को तो पता है कि आस्था क्या है, अन्धविश्वाश क्या है और विज्ञान क्या है? उसको ये भी पता है कि जिन सवालों पर भौतिकी भी निरुत्तर है, वहां पराभौतिकी के पास आगे सोचने का मसाला अवश्य है, भले सीधे उत्तर दे या न दे।
तो ये रहा 10,000 वर्षों का हिसाब-किताब। ढ़पोरी का नाम आज भी ढ़पोरी है लेकिन, उसको पता है कि कब घप्प लिट्टी भौतिकी में घुसना है और कब टप्प सिंघाड़ा पराभौतिकी में घुस जाना है। उधर गपोड़ी पूरी निष्ठा से गप सुनाने और गरियाने में व्यस्त है। बस एक progress हुआ कि गपोड़ी आजकल हर शब्द में नुक्ता लगाने लगा है।
निर्मल अगस्त्य
10-09-2017
पटना
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