Sunday, September 10, 2017

"ये भिया, ई में नुक्ता लगेगा कि नहीं लगेगा"

"ये भिया, ई में नुक्ता लगेगा कि नहीं लगेगा"

दो मित्र थे। एक का नाम ढ़पोरी और दूसरे का नाम गपोड़ी। दोनों आमने सामने रहते थे। 2000 साल तक ढ़पोरी ऐसी चीज़ों पर विश्वास करता रहा जो बहुत clear shape में नहीं थे। और उसका मित्र गपोड़ी उसे इस बात के लिए लगातार 2000 साल तक गरियाता रहा और कहता रहा कि ये सब अन्धविश्वाश है। इसी बीच अन्धविश्वासों को मन भर कर जी लेने के बाद ढ़पोरी को नुक्ता लगा के ये ख्याल या कि क्यूँ न जरा नुक्ता लगा के ऐसी चीज़ों का अध्ययन कर लिया जाए जो clear shape में हैं और जिन पर आसानी से विश्वास किया जा सके। सो अगले 2000 साल वह विज्ञान और अन्य विषयों को पढता रहा। 
इधर अपने नाम अनुरूप इन 2000 सालों में गपोड़ी, पूरी बस्ती में अपने मित्र ढ़पोरी के लगातार 2000 साल तक अंधविश्वासी बने रहने की बातें सुनाता और उसको गरियाता। 
4000 साल बीत गए। ढ़पोरी ने कायदे से नुक्ता लगा के सब विषयों को अध्ययन किया और पाया कि वाह!..... यही तो भौतिकी (Physics) है। तब उसने वापस पहले वाले 2000 साल की बातों पर गहराई से मनन किया तो पाया कि वाह! वाह!...... यहाँ तो पराभौतिकी (Metaphysics) था, बस उसने अगले 2000 साल तक एक नई दृष्टि से उसका मनन किया। इधर गपोड़ी अपने गरियाने के काम में निष्ठा से लगा रहा। 
तो जी बिना नुक्ता लगाए 6000 साल बीत गए और अगले 4000 साल तक ढ़पोरी भौतिकी और पराभौतिकी के सम्बन्ध को समझने में भिड़ा रहा और उधर गपोड़ी...........
तो अब situation यह है कि  ढ़पोरी को तो पता है कि आस्था क्या है, अन्धविश्वाश क्या है और विज्ञान क्या है? उसको ये भी पता है कि जिन सवालों पर भौतिकी भी निरुत्तर है, वहां पराभौतिकी के पास आगे सोचने का मसाला अवश्य है, भले सीधे उत्तर दे या न दे। 
तो ये रहा 10,000 वर्षों का हिसाब-किताब। ढ़पोरी का नाम आज भी ढ़पोरी है लेकिन, उसको पता है कि कब घप्प लिट्टी भौतिकी में घुसना है और कब टप्प सिंघाड़ा पराभौतिकी में घुस जाना है। उधर गपोड़ी पूरी निष्ठा से गप सुनाने और गरियाने में व्यस्त है। बस एक progress हुआ कि गपोड़ी आजकल हर शब्द में नुक्ता लगाने लगा है। 
निर्मल अगस्त्य 
10-09-2017 
पटना                      

पोस्टमार्टम - पोस्टमार्टम खेलों न यार, बड्डी मज़ा आता है !

पोस्टमार्टम - पोस्टमार्टम खेलों न यार, बड्डी मज़ा आता है ! 

मेरे परिवार में लगभग 40 ऐसे व्यक्ति हैं जिनकी पढ़ाई लिखाई छोटे शहरों के साधारण विद्यालयों और महाविद्यालयों में हुई। उनमें से बहुतों ने तो पटना यूनिवर्सिटी का गेट तक नहीं देखा, दिल्ली, बनारस तो बहुत दूर की बात है। दो ऐसे भाई हैं मेरे, जो पटना यूनिवर्सिटी से I. Sc. करने के बाद अपने छोटे से शहर में वापस लौट गए जबकि उनके marks टॉप 5 में थे। तब आप सोचिये कि कितने करोड़ बच्चें हैं, जो साधारण स्कूलों और महाविद्यालयों में पढ़ते हैं। मेरे उन 40 रिश्तेदारों में लगभग 90 प्रतिशत लोग आज किसी न किसी संस्था में टॉप position पर हैं। तो मेरे जैसे बाक़िओं के रिश्तेदार-परिचित भी कुछ न कुछ अच्छा कर ही रहे होंगे। 
मैंने स्वंय B. D. Evening College से इंटर और T,P,S. college से graduation किया।  मैं भी मिला जुला के ठीक ही कर रहा हूँ। बहुत बड़ा सेलिब्रिटी तो नहीं हूँ लेकिन दो-तीन domain में अच्छी शाख है, नाम भी है। 
इसका अर्थ ये हुआ की इन साधारण विद्यालयों और महाविद्यालयों में पढ़े बच्चे अपने हिसाब से इतना कर रहे हैं कि उनपे ग्रन्थ भले न लिखा जाए लेकिन संतोष और गर्व किया जा सकता है। 
लेकिन इनकी चर्चा कभी नहीं होती। और होगी भी नहीं क्यूंकि ये किसी बड़े नामी educational institutions के प्रोडक्ट नहीं हैं। पटना हाई स्कूल में मेरे C सेक्शन के अधिकाँश मित्र आज well placed हैं और अच्छा कर रहे हैं। लेकिन इनकी चर्चा भी नहीं होती। 
कोई ये बता सकता है कि कितने IAS, IPS, DOCTORS, SCIENTISTS, ENGINEERS, ARTIST, SPORTSMAN इत्यादि B. D. Evening College जैसे छोटे और साधारण महाविद्यालय के pass out हैं। कोई नहीं बताएगा। बताना भी नहीं चाहेगा। और देश में ऐसे कितने छोटे और साधारण शिक्षण संस्थाएं हैं आप स्वंय पता कीजिये। 
जब सम्पूर्ण राष्ट्र JNU जैसे मुठ्ठी भर संस्थानों के intelligence से चल रहा हो तो ये सब बातें पता करने की न तो आवश्यकता है, न गरज। 
यही है ब्राह्मणवाद जिसका ब्राह्मण होने या न होने से कोई लेना देना देना नहीं है। यही है ब्राह्मणवाद जब किसी जीवनदायिनी स्रोत को किसी विशेष संस्था या व्यक्ति से जोड़ दिया जाता है। इससे बड़ा ब्राह्मणवाद और कुछ नहीं हो सकता कि सारा talent, intelligence, और देश का भविष्य केवल JNU जैसे संस्थानों से ही पढ़ के आता है। 
कमाल की बात है कि लोग ब्राह्मणवाद से घृणा करते हैं, व्यवहारिक रूप से  ब्राह्मणवाद में सबसे अधिक वही संलिप्त पाए जाते हैं।  
निर्मल अगस्त्य 
10-09-1017
पटना। 
(नोट- 1017 इसलिए लिखा मैंने कि हम तो बड़ी संस्थानों में पढ़े नहीं, इसलिए 1000 साल पीछे तो रहेंगे ही ना।)