Sunday, March 22, 2015

‘‘एक अकेला इस शहर में-गोलघर पर पहला शॉट!’’


                         ‘‘एक अकेला इस शहर में-गोलघर पर पहला शॉट!’’

                                                                             ‘‘निर्मल अगस्त्य’’



लोकाचारी निभाना कितना जटिल होता जा रहा हैे! है न...? और हमेशा की तरह मेरी बात महफिल के मुँह में हवा मिठाई की तरह छू-मन्तर हो गई। करीबी मित्र ने नयी कार ली थी सो बधाई देने वालों की भीड़ में मैं भी शामिल हूँ। आदतन नहीं, बल्कि मेरे कुछ युवा पत्रकार मित्र मुझे घसीट लाये हैं ताकि दो-चार पैग व्हिस्की और कुछ उन्मुक्त पलों का मजा मैं भी ले सकूँ। उन्हें मालूम है कि मेरा घर कुछ समयातीत लेकिन पावन संस्कारों का पुलिन्दा है जिसकी गाँठ को पिताजी हर वक्त कसने में लगे रहते हैं।


सिहरा कर चली जाती है उस साल के उस महीने की याद। केन्द्र ने चार दिन पहले तीन सौ छप्पन हटा लिया था। लेकिन हवा में अब भी वही अल्लहड़पन था। सभी पार्टियाँ अपने-अपने तरीके से प्रतिक्रिया व्यक्त करने और सहानुभूतियाँ बटोरने में जुटी हुई थीं। स्टेशन रोड की भीड़, बीत गये हर दिन की तरह अर्धबेहोशी में फूटपाथ पर उगी घास छीलने और धूल उड़ाने में व्यस्त थी। किसी के चेहरे पर प्रजातन्त्र की बदहाली को कोई खास सबूत नहीं था। शंकर बिगहा बाले हादसे का लहू सूखा भी नहीं कि उस दिन जहानाबाद में सात लोगों को मौत की नींद सुला दिया गया। समाचार पढ़ कर लोगों की मुठ्ठियाँ नहीं भिंचती, आँखों में लहू नहीं तैरता, बल्कि अँगुलियाँ पृष्ठों को तेजी से पलट कर सर्राफा और जिन्स के भावों वाले पन्ने की ओर ले जाती हैं। क्या पता, प्याज फिर से अस्सी रूपये हो गया तो? सचमुच, प्याज उस देश के लिये एक बड़ा मुद्दा है जिसकी अखन्डता प्याज के परतों की तरह है। छीलते जाईये और रंग बदला-बदला सा देख भी जीते जाईये।            
प्याज सरकार पलट सकती है। रातों-रात टी.वी. के हजारों सेट बिकवा सकती है और सबसे गौरतलब बात तो यह है कि उस साल मेरे गाँव में एक शादी तक टूट गई क्योंकि लड़के वालों ने दहेज में दो सौ मन प्याज माँग लिया था।

ऐसे डरे और सहमे हुये हैं, चक्रवर्ती सम्राट, अशोक मौर्य की घरती के लोग। बेटा- बेटी, बूढ़े माँ-बाप, जवान बहू... अनेक विवशतायें हैं। क्या जाने बाबा की हजार बाहें लोगों को अपनी ओर बुलाती भी है या नहीं ?

       
  ‘‘देखोगे सौ बार मरूँगा, देखोगे सौ बार जिऊँगा
हिंसा मुझको थर्रायेगी, मैं तो उसका खून पिऊँगा
प्रतिहिंसा ही स्थायित्व है मेरे कवि का
जन-जन में जो उर्जा भर दे मैं उद्गाता हूँ उस रवि का।’’
(नागार्जुन- हजार-हजार बाँहों वाली से।)

इतिहास के पन्नों में पाटलिपुत्र अजर है। पर हमने कभी सोचा भी नहीं था कि माँ गंगा की गोद में बसा यह शहर आज संस्कृति की चौखट पर धूल-धुसरित हो औंधा पड़ा रहेगा। गुलाबों की नगरी, उदयिन  का सपना, अशोक का वैभव, किताबों की कैद में है और लोदीपुर के पास स्थित संग्रहालय में संग्रह-सुरक्षा के आक्सीजन पर जीवित तो है लेकिन कोमा में।

उस वक्त जब मेरी जवानी के दिन लगभग शुरू ही हुये थे, कुछ बड़े और खुले दिल के चौर्य-ज्ञानी युवा, महानगरों का ज्ञान थोड़ी-थोड़ी संस्कृति, फैशन और जीवनशैली दिल्ली, बम्बई, पुणे और बंगलोर जैसे शहरों से चुराने लगे थे और कर्ण की तरह पटना के युवाओं को दान करने में लगे थे। उनकी ही कृपा से शहर हिस्सों में बँटने लगा था। उधर कुछ वर्षों में पटना मार्केट, बोरिंग कैनाल रोड, मौर्या कॉम्पलेक्स और उससे सटे डाकबंगला रोड वाले इलाके, उच्च वर्ग से लेकर उच्च मध्यम वर्ग की सम्वेदनाओं को समेटने में लगे थे। स्टेशन के पास दुमंजिले पर लिट्टी और चन्द्रकला की दुकान, आर-ब्लॉक चौराहे के पास डाक-तार संगीत संस्था से सटी चाय की दुकान, निम्न मध्यवर्ग के लोगों की जमावट को पालते थे। मूल तौर पर दोनों क्रमशः पूंजीवाद और समाजवाद की वकालत करने वाले लोगों का समूह था। सिगरेट के धुँओं से निकले छल्लों के बीच अगर कहीं ‘मिस यूनीवर्स’ और ‘द मुअर्स लॉस्ट साइट’ का जिक्र होता है तो लगता था हम बोरिंग रोड या मौर्या कम्पलेक्स में हैं लेकिन जब केन्दू के पत्तों की गन्ध के बीच सुनाई पड़ता था-
‘‘अस्सी चुटकी नब्बे ताल
तब पूछो खैनी का हाल’’

और कहीं-कहीं ये भी सुनाई पड़ता था-
    ‘‘अस्सी चुटकी न दे ताल
रगड़ के खैनी मुँह में डाल’’

घुमा फिरा कर दो तरह के खाने वाले थे। एक, जो ताली मार कर रगड़ी हुई खैनी की धूल उड़ा देते थे और दूसरे जो बिना धूल उड़ाये केवल रगड़ के खाना पसन्द करते थे। अचम्भे की बात ये है कि आज सन दो हजार पन्द्रह ईसवी में भी यही दो प्रकार के खैनी खाने वाले लोग हैं। बदलाव के इस भयावह दौर में खैनी खाने का तरीका नहीं बदला। खैनी उन गिनी चुनी वस्तुओं में से है जो समाजवाद को जिन्दा रख सकता है।

बीच-बीच में हड़ताल और अतिक्रमण विरोधी कार्यवाईजन्य समस्याओं से बिगड़े फूटपाथी विक्रेताओं की देसी गालियाँ सुनाई पड़े तो यकीनन हम आर-ब्लॉक या दोमंजिले लिट्टी की दुकान में थे। मिला जुला के मध्यमवर्ग  कहीं का नहीं है। इन्हें दो पैग का नशा चढ़ा नहीं कि अरून्धती रॉय और जुबिन मेहता याद आते हैं और एक महीने तनख्वाह नहीं मिली तो बाबा नागार्जुन और प्रेमचन्द याद आने लगते हैं। मेरा मित्र अभी पायदान पर लटका हुआ है। क्या पता लोन पर लिये इस कार को खरीदने के बाद उपर चढ़ने में और ज्यादा दमखम और साहस का परिचय दे जाये। पार्टी में गहमा-गहमी तो नहीं थी लेकिन गाने की आवाज ज्यादा होने से लग रहा था कि हम मेले में धीरे-धीरे बढ़े जा रहे हैैंं। तभी एक कोने से हुर्रे की आवाज से हम सभी चौंके। देखा चार लड़के जीवन को कन्धे पर उठा कर चिल्ला रहे थे। धीरे-धीरे पता चला कि जीवन जिस लड़की को फांसने में अपने सारे अनुभव खर्च कर चुका था, उसी लड़की ने उस दिन एक अखबार में उसके नाम खुला संदेश दिया था। ओह्! उस रोज ‘वैलेन्टाइन्स डे’ था। मैं जैसे नींद से जागा।
     

कभी फुर्सत मिली तो जीवन से वैलेन्टाइन का मतलब पुछूँगा। वह भी तीन साल तक दिल्ली के सातों घाट का पानी पी कर लौटा है। हम सभी दोस्त इस पार्टी में अपने होने की सही वजह तलाश रहे थे।
बहरहाल उस दिन जिस दरम्यान मेरी जवानी के दिन लगभग शुरू ही हुये थ, रैपिड एक्शन फोर्स वालों की पटना के मुख्य मार्गों पर पुरजोर हुकूमत रही। लेकिन मजे की बात देखने को यह मिली की पूंजीवाद के प्रतिनिधित्व करते सारे इलाके खामोश रहे। दुकाने बन्द थीं, जगह-जगह नियॉन बल्ब और ग्लो साइन्स के रेजे फूटपाथ पर ही बिसरा दिये गये पदचिन्हों को चूम रहे थे। लेकिन स्टेशन रोड वाली लिट्टी-चन्द्रकला और आर. ब्लॉक वाली चाय की दुकान पर शाम होते ही यथावत गहमागहमी हो चली। केन्दू के पत्तों की गन्ध और खैनी के उड़ते चूरन से हवा में उठती सुरसुराहट के बीच, मैं और जीवन भी छुपते-छुपाते वहा पहुँचे और चाय सिगरेट का मजा लेने लगे। जीवन टेलीफिल्म को लेकर ज्यादा ही चिन्तित दिखा। कहानी, पटकथा, डॉयलाग, संगीत-निर्देशन और मुख्यपात्र की सारी जिम्मेदारी मेरे कंधे पर डालने के उपरान्त भी। पटकथा के अनुसार पहली ही सीन में मुझे गोलघर के बाहरी चबूतरे पर खड़े होकर ‘टाईटेनिक’ फेम ‘लियोनार्डो डी कैप्रियो’ की तरह बाँहों को फैलाकर आसमान समेटना था।

जीवन कई सालों से बिहार से बाहर रह रहा था और उसको समझाना बड़ा मुश्किल था कि पटना में रह कर आदमी कुछ नहीं समेट सकता, खासतौर पर उस मन्डल-कमन्डल के बीच चल रहे रस्साकशी के भयावह दौर में और खास कर कला के क्षेत्र में। दो चार नामों को अपवाद में लिया जाये तो पता लगता था कि अधिकांश लोग संगीत के नाम पर अच्छी खासी लूट मचा रहे हैं। सपने एकरंगे होते हैं- ‘मोनोक्रोम’। लेकिन उस दौर में जब मेरी जवानी के दिन लगभग शुरू ही हुये थे, महसूस हुआ कि सपने बेसूरे भी होते हैं, अगर आपकी ख्वाहिश संगीत के क्षेत्र में सुसंस्कृत बने रहते हुये कुछ कर दिखाने की है, वह भी इस शहर की बदल दी गई सभ्यता को आद्योपांत स्वीकार करते हुये। मेरी इस बात को कस कर थाम लिया जीवन ने और इसका पोस्टमार्टम कर टेलिफिल्म का नाम भी ढ़ूँढ़ लिया उसने -‘‘एक बेसूरा सा सपना।’’ 
नोट्रेडेम कम्युनिकेशन सेन्टर से सारी तकनीकी सुविधायें ली जानी थी और देखना यह था कि जीवन सिंह इस कमसिन शुरूआत के बाद आगामी कुछ वर्षों में क्या बनता है। ‘जीवन स्टीवेन स्पीलबर्ग’ या ‘जीवन कैमरून सिंह ’।
 
मुझे उम्मीद नहीं थी कि मैं कम से कम निर्मल अगस्त्य बने रहने में कामयाब रहुँगा भी या वही नीरजवा या निर्मलवा बन कर किसी प्राइवेट कम्पनी मे यस बॉस-यस बॉस का मन्त्रोचारण करते हुये आपाधापी के देवता की पूजा आराधना करनी होगी। तब तक मन्डली में दो मित्र और आ गये और एक नयी बहस छिड़ गयी थी।
‘‘यार तुम जे.एन.यू. क्यूँ नहीं जाते।’’
मेरे एक बुजुर्ग मित्र की अलुआ के भाव वाला मशवरा पहले को बहुत नही जँचा।
‘‘धूर..., काहे लऽ...? का बुझते हो, ई बिहार का संस्कृति कौनो विश्वविद्यालय से कम है का?’’

यह प्रतिक्रिया उनके साथ आये कंचे जैसी आँखों वाले एक सज्जन की थी जो पिछले पाँच सालों से क्षेत्रिय राजनीति के रथ पर चढ़ने के लिये बेहाल थे। मसला में रोमांच पिरोने के लिये मैंने उनसे पूछा- ‘‘कहिये मुनि लाल जी, अबकि टिकट मिलने की कुछ उम्मीद।सरकार बदल गई है।’’ 
उसने एक चुस्की मारते हुये कहा- ‘‘अरेऽऽ... अगस्त्या बाबू..., का बतायें, ई अपना बिहार जो है न, एकदम धुरफन्दियों का चरागाह है, समझे। किसी से कहियेगा नहीं। रूलिंग पाटी के दो चार दबंग नेतवन के पास गये तो कहिस कि अरेऽऽ, तुमरा बाप तो यादव है न..., स्साले भागते हो की नहीं, और विपक्षी पार्टी में गये त मेन दलाल कहिस कि हमरे पारटी में आना था तो भूमिहारिन से बियाह काहे ले कर लिया रे अभागाऽऽऽ...।’’
 
मुझे  ताज्जुब  हुआ कि मुनि मनोहर राय अपने बारे में कहते और अपनी ही बखिया उधेड़ते समय भी इतना बेबाक कैसे था। लगता है बिहार प्रदेश की राजनीतिक दाव-पेंच ने उसे कड़वाहट पीना अच्छी तरह सिखा दिया था।
 
बहरहाल, होली के कुछ ही दिन बाकी थे। मेरे मुहल्ले से पश्चिम में बाबा चौहरमल टोले में रात के नौ बजते-बजते होरी का आलाप शुरू हो जाता है। कभी भी धीमे लय वाला गाना नहीं होगा और ताल सिर्फ कहरवा या दादरा। ज्यादातर कहरवा। यह शुरू हुई हारमोनियम और ढ़ोलक की जुगलबन्दी।
"धाऽऽ तिनकधिनऽऽ... धगे तिनक धिनऽऽ..."

और इसके पीछे-पीछे शुरू हुआ चौहरमल टोले के सबसे खनकदार आवाज वाले शम्भू पासवान और उसके सहयोगी।
"अबकी फागुन में हो बबुनीऽऽ
अबकि फागुन मेंऽऽ.............................(कोरस)
गौना के डोलिया ले ऐबुऽऽ
अबकि फागुन मेंऽऽ"..........................(कोरस)
बगल में मुस्लिम बाहुल्य इलाका है लेकिन आज तक किसी को कोई एतराज नहीं हुआ। अच्छा लगता है यह देखकर कि ईद की सेवई और होली के मालपुये में एक जैसा स्वाद है। फिर जातीय और धार्मिक हिन्सा की जिम्मेदारी किसके कन्धों पर सौंपी जाय। मुझे नहीं लगता कि कोई सामान्य आदमी बिना वजह एक दुसरे को कष्ट पहुँचाना चाहता है, परोक्ष रूप से भी नहीं।
 
बुद्ध महावीर और अशोक महान के इस प्रदेश को किसी की नजर लग गई है शायद। मौत और संहार के लिये जाति या धर्म विशेष कोई योग्यता नहीं है और ना ही शोभनीय है उन आँकड़ों का पुर्नआकलन। सभी नरसंहार में प्रायः ऐसे लोग मरते हैं जिनके पास तन ढंकने के लिये ना तो ढंग का कपड़ा होता है ना ही दो जून खाने के लिये रोटी या फिर ऐसे लोग जो एक चींटी तक नहीं मार सकते। स्पष्ट है कि यह उसी दाँव-पेंच का एक घातक पैंतरा है जिससे मुनि मनोहर राय और उसके जैसे कई युवा घायल हो रहेे थे।
 
फिर भी उस दरम्यान जब मेरी जवानी के दिन लगभग शुरू ही हुये थे और मैं बिना गाल और गला काटे दाढ़ी बनाने की महारत के क्वालीफाईंग राऊँड में हर दूसरे दिन एक मैच हार रहा था, बिहार प्रदेश आज की तरह उतना बनावटी नहीं था। कच्चा था, हरा था, जैसे दार्जिलिंग पहाडि़यों से टूँगी गई चाय की पत्तियाँ। विदाउट प्रोसेस्ड्, विदाउट फिल्टर्ड, एंड विदाउट पैक्ड्। यहाँ की चालीस प्रतिशत आबादी गरीब है और पैंतालीस फीसदी से ज्यादा अनपढ़, बावजूद इसके--
‘‘असम के लोगों का भोलापन था यहाँ
पंजाब के आर्यों की ताकत भी थी यहाँ,
खुले गाँव, सड़क, महाराष्ट्र के तमाशे से थे
नाल-ढोलक की थाप में बंगाल के ताशे भी थे’’

इस इन्टरनेट ने सब कुछ घाल मेल कर के रख दिया और उसपर फेसबुक पर विचरते ज्ञानियों की असीम अनुकम्पा। अब बिहार, बिहार न रहा। ठेठ और मॉडर्न का हाई-ब्रीड हो गया है।   

एक बार केरल गया था, राष्ट्रीय कैरम टूर्नामेंट में बिहार के जूनियर टीम का कप्तान बन कर। वहाँ त्रिवेन्द्रम की एक लड़की से दोस्ती हुई। वह भी हिन्दी की वजह से। वह हिन्दी बहुत अच्छा बोल लेती थी। उसके प्रति मेरा यह आश्चर्य धीरे-धीरे दोस्ती में बदल गया। प्रतियोगिता के तीसरे दिन  बिहार की टीम सारी प्रतिर्स्पद्धाओं से बाहर हो चुकी थी। हमलोग फुर्सत ही फुर्सत में थे। वह मुझे और चौबे को अपने घर ले गई और कॉफी के साथ केले और कटहल का चिप्स खाने को दिया। उस कॉफी में एक अजीब सा स्वाद था और मनभावन सी खुश्बू भी। लगता था चॉकलेट को सिगरेट के धुएँ में पकाया गया हो। हमलोगों  के पूछने पर उसने बताया कि वह कच्ची कॉफी थी। बगीचे से तोड़ा, धूप में सुखाया और दुध, पानी, चीनी के मिश्रण में डाल कर चूल्हे पर चढ़ा दिया।
   
बस यही था बिहार प्रदेश। कच्चे कॉफी की तरह। उस पार्टी के अगली सुबह टेलिफिल्म के भाग दो की पटकथा के लिये बख्शी आने वाला था। ऐसी भी छत पर बैठे एक घंटे हो गये थे लेकिन सामने वाली खिड़की में हर रोज दिखने वाला चेहरा दिखा नहीं। शायद वे लोग कहीं बाहर गये हों। तभी मुहल्ले के ही एक अतिपरिचित वरिष्ठ पत्रकार दूध का कैन ले कर बगान की तरफ जा रहे थे। बिना रेलिंग के छत की क्या प्राईवेसी उसपर जब मकान भी नीचा हो। सोचा जल्दी से छुप जाऊँ वरना वे पूछ बैठेंगे-
‘‘क्या निर्मल जी कैसे हैं... कैसी चल रही है साहित्य और संगीत की जुगलबंदी...? मेरे मिंटु के लिये कोई ज्ञानवर्धक लेख हो तो....’’।
सभी जानते थे की सुत-चरित-परिमार्जन नाम के एक जिन्न ने उन्हें ओ.सी.डी. की तरह जकड़ रखा है और उनका ग्वाला, ‘पूत कपूत तो क्या धन संचय;  पूत सपूत तो क्या धन संचय’ जैसा धर्मसंकटीय विषय देकर रोज ही उन्हें व्याख्यान के चक्कर में डाल कर उनके कैन में पानी मिला देता था। अब वे बस चार खम्भों की दूरी पर थे।
           
मैंने जल्दी से छत पर फैले सारे सामान, जैसे गिटार, चटाई, डायरी, कलम, प्लेक्ट्रम, कप, प्लेट वगैरह समेटे लिये और चुपचाप नीचे चला आया। ‘‘निजं शरणम् गच्छामि’’...।

‘‘निर्मल अगस्त्य’’
26 जनवरी 2015
पटना




Saturday, March 21, 2015

‘‘भगवान फुर्सत में और पन्डित व्यस्त!’’

‘‘भगवान फुर्सत में और पन्डित व्यस्त!’’


कान्हा को प्यार हुआ... उन्नीसवीं बार। कान्हा के पास कोई ब्रान्डिंग नहीं है इसलिये उसका प्यार कभी नोटिस नहीं हो पाता। जब ग्यारह साल की उम्र में उसे अपनी तीस साल की मामी से प्यार हुआ तो भी यह, वात्सल्य के बहाने नोटिस नहीं हुआ था। आज जब उसे अपने से आधी उमर की लड़की से प्यार हुआ है तो भी, स्नेह के बहाने यह प्यार नोटिस नहीं हो पा रहा।
वास्तव में कसूर कान्हा का भी है। उसे प्यार होता है तो, बस हो जाता है। और ऐसा भी नहीं कि वह सीमाओं से डरता है वह कहता है-
‘‘प्यास का मारा जल-जल बोले, आग का मारा जला-जला,
चुप रह कर कु-अर्थ से बचिये, गूंगे का गुड़ भला-भला!’’
उस दिन कान्हा को उसका एक मित्र मिल गया।
मित्र बोला- ‘‘चलता है?’’
कान्हा ने कहा- ‘‘चल!’’
मित्र बोला- ‘‘पूछेगा नहीं, कहाँ?’’
कान्हा ने कहा- ‘‘लो पूछ लिया, कहाँ?’’
मित्र बोला- ‘‘कालीबाड़ी।’’
कान्हा बोला- ‘‘बड़ी मस्त जगह है।’’
मित्र ने डाँटते हुये कहा- ‘‘कान्हा...!’’
कान्हा बोला- ‘‘अरे यार, वहाँ के संदेश खुब भालो...।’’
मित्र बोला- ‘‘पैसे-वैसे नहीं है मेरे पास।’’
कान्हा बोला- ‘‘कोई बात नहीं यार, वहीं पर किसी से उधार ले लेंगे।’’
मित्र बोला- ‘‘कमाल कमबख़्ती है तेरी। प्रसाद भी उधार की चढ़ायेगा।’’
कान्हा बोला- ‘‘कमीनगी तो तू कर रहा है। मैं संदेश की बात कर रहा हूँ और तू प्रसाद की बात कर रहा है। मैं सजी-धजी बंगालिन औरतों की बात कर रहा हूँ तू काली की पूजा की बात कर रहा है।’’
मित्र गुस्सा हो कर अकेले ही चल दिया। उसे चिढ़ाता मनाता, कान्हा उसके पीछे-पीछे। इसलिये दोनों की दोस्ती वर्षो से संरक्षित है। एक ने माया में ही राम ढूँढ़ लिया इसलिये चिढ़ाता रहता है, दूसरा राम में माया ढूँढ़ रहा है इसलिये चिढ़ता रहता है।
राम और माया का यह खेल पुराना है भाई। कोई एक खम्भा थाम लो तो अच्छा है। बाद में ये न कहना कि-
‘‘माया मिली न राम...’’
मित्र बंगाली है और उसे कालीबाड़ी के पन्डित का अॅप्यान्टमेन्ट लेना है। घर में काली पूजा करवानी है। कान्हा थोड़ी देर के लिये बंगाली बन कर संदेश और सुन्दरता का आनन्द लेना चाहता है। बहरहाल दोनों की मंजिल एक ही है- कालीबाड़ी!
मन्दिर तक पहुँचते-पहुँचते मित्र ठन्डा हो गया और दोनों साथ-साथ मन्दिर प्रांगण में घुसे। कान्हा लापरवाही से इधर-उधर देखता मन्दिर की सीढि़याँ चढ़ने लगा। न कोई प्रणाम-पाती न चेहरे पर कोई विनम्रता। आधी सीढि़याँ चढ़ने के बाद उसने पीछे मुड़ कर देखा।
मित्र तो उल्टा चला जा रहा था।
कान्हा चिल्लाया-‘‘मित्र उधर कहाँ...?’’
मित्र धीमी आवाज में बोला- ‘‘तुम उधर कहाँ...?’’
कान्हा बोला- ‘‘अमां, काली पूजा करवानी है न?’’
मित्रा बोला- ‘‘अबे नीचे आ गदूद। आफिस इधर है। पहले पन्डित चाहिये होता है न!’’
कान्हा ठठा कर हँसने लगा। दो युवतियाँ जो पूजा सामाग्री ले कर उपर चढ़ रहीं थी हड़बड़ा गयीं और रेलिंग से सट कर चढ़ने लगीं। कान्हा हँसता रहा और सीढ़ियाँ उतरता रहा। फिर मित्र के पास पहुँच कर बोला-
‘‘कमाल है यार, ये पंडितों के लिये ऑफिस कब से होने लगा?’’
मित्र चिढ़ कर बोला- ‘‘तेरी इसी चौधरीगिरी से चिढ़ है मुझे। अरे पन्डित तो मंदिर के भीतर ही होगा लेकिन उसकी बुकिंग ट्रस्ट ऑफिस के थ्रू ही होगी।’’
कान्हा बोला- ‘‘छुप-छुपा के भी नहीं।’’
मित्र बोला- ‘‘नहीं, और अब अन्दर अपना भाड़ जैसा मुँह मत खोल देना... जोतो माथा, तोतो व्यथा!’’
दोनों कार्यालय के अन्दर घुसे तो तीन लोग अन्दर बैठे थे। दो सिगरेट पी रहे थे और तीसरा सुलगाने की तैयारी में था। मित्र ने परचा निकाला और बोला कि उसने पुजारी की बुकिंग के लिये नम्बर लगाया था। जो सिगरेट सुलगाने की तैयारी में था, बड़े स्टाईल से उँगलियों में सिगरेट घुमाता हुआ बोला- ‘‘तो...?’’
उसका ‘तो...’’ तो उस थाना इन्चार्ज से भी ज्यादा रोबदार था जिससे किसी ने कहा हो कि हुजूर हमने कल एक एफ.आई.आर. करवाया है और उसने कहा हो- ‘तो...?’’
तो एहसान किया क्या। ये ‘एहसान किया क्या’ अलग से बोलने की जरूरत नहीं है। कड़क कर ‘तो’ बोलो तो ये अपने आप जुड़ जाता है। न्युमोनिया और साइकोलॉजी के ‘पी’ की तरह। मित्र किचिंत लजाता-शर्माता, कर्ज लिये हुये अभागे की तरह मुस्कुराता बोला- ‘‘जी, बुकिंग शनिवार की मिली है और शनिवार को पिताजी मना कर रहे हैं।’’
टेबल के उस पार बैठा दुसरा सिगरेटिया बोला- ‘‘क्यूँ, शोनिवार में क्या तोकलीफ है?’’
मित्र बोला- ‘‘शनिवार को पिताजी भी फ्री नहीं है और मेरा भी बैंक का कुछ काम है।’’
तीसरा सिगरेटिया तपाक से बोला- ‘‘ताले कोब चाहते हो।’’
मित्र बोला- ‘‘रविवार को।’’
पहले सिगरेटिये ने ऐसा मुँह बनाया मानो एक भिखारी ने उसकी बेटी से विवाह का प्रस्ताव रख दिया हो।
वह तमतमा कर बोला- ‘‘शोनिवार को पोंडित फ्री नेई आछे भाई।’’
कान्हा के सब्र का बांध टूटने ही वाला था कि मित्र बोला-
‘‘कोई और पन्डित हो...?’’
तीसरा सिगरेटिये ने एक रजिस्टर उठाया और पहले सिगरेटिये को देते हुये कहा-
‘‘एक टू ठीक से चेक कोरे देख तो। देखो कोई फ्री है क्या?’’
पहले सिगरेटिये ने रजिस्टर हाथ में लिया और हाथ में उठाये-उठाये कहने लगा- ‘‘सुबह में बोनर्जी आरो घोष... दुपोर, प्रोदीप सोरकार.. दू पुजो। विकाले प्रोखोर मोंडल के यहाँ छोट्ठी और रात में मुखोर्जी कोरपोरेटर का आरती। ना रे... मुझे सब मुजबानी याद है... रोविवार तो एक भी पोन्डित फ्री नोही है।’’
तीसरा सिगरेटिया अकड़ कर बोला- ‘‘होबे ना भाई, शोनिवार को कोरना है तो कोरा लो नहीं तो कुरी दिन रूक जाओ।’’
मित्र बोला- ‘‘बीस दिन...?’’
दूसरा सिगरेटिया बोला- ‘‘यहाँ का नियम है कि एक ही आदमी बीस दिन के भीतोर दो नोम्बर नहीं लगाने  सोकता।’’
कान्हा बोला- ‘‘अमां मित्र...। शनिवार को तुम फ्री नहीं हो... रविवार को पन्डित फ्री नहीं है... जरा मन्दिर के भीतर चल के काली से तो पूछ ले कि वो फ्री है की नहीं...।’’
ऐसी मस्तानी आवाज में उसने अलापा कि तीनों सिगरेटिये भौंचक्क होकर उसे देखने लगे।
मित्र को तो मानो ‘माइस्थेनिया ग्रेविस’ का अटैक होने को आया।
तभी नरमुन्डों की माला पहने काली अन्दर घुसी और बोली- ‘‘आमी तो फ्री गो...! किन्तु आमाके जिगस कोरा उचित। कान्हा शोत्ती बोलछे...। आमि सोब दिन फ्री...!’’
तो ये आलम है। फूल वाला व्यस्त है। प्रसाद वाला व्यस्त है। रोली, टीका, चन्दन, केसर वाला व्यस्त है। भक्त व्यस्त हैं, पन्डित व्यस्त है। लोग अपना शिड्डयुल देख रहे हैं। भगवान के दरबार में जाने से पहले कोई बच्चों की परीक्षा खत्म होने का इन्तजार कर रहा है तो कोई एल.टी.सी. के ग्रान्ट होने का। कोई रोपनी खत्म होने का इन्तजार कर रहा है तो कोइ फसल कटने इन्तजार कर रहा है। दुःख क्या है? जब सब कुछ इन्सान की क्षमता से बाहर हो जाये। उस वक्त वो इन्सान भगवान के दरबार में जाने की सोचता है या तब, जब वो फुर्सत में हो। हम एक अदद परिवार और एक अदद नौकरी के बीच बड़ी मुश्किल से समय निकाल पा रहे हैं और ये उम्मीद कर रहे हैं कि जो समूचा सन्सार चला रहा है वो ‘एट योर डिस्पोजल’ टाईप से हमारे लिए फुर्सत ही फुर्सत में है।

‘‘निर्मल अगस्त्य’’
22 मार्च 2014
पटना


Thursday, March 12, 2015

‘‘ब्रान्ड वैल्यू की जय!’’

‘‘लपकचुन्नुओं के देश में’

                                                        ‘‘ब्रान्ड वैल्यू की जय!’’

क बार प्रोफ़ेसर शम्भूनाथ को उसके एक मित्र ने उपहार में एक कमीज़ दी।
अव्वल... कमीज़ तो कमीज़ है...। कॉलर वाली... दो बाँहों वाली... और क़रीब आधे दर्जन बटनों वाली।
उसके जाने के बाद प्रोफ़ेसर शम्भूनाथ कमीज़ को उलट-पलट कर देखता रहा। वह कमी में तमी ढूँढ़ने लगा। चटक पीला रंग! फूल पत्ते सी प्रिन्टिंग, डेढ़ हाथ का कॉलर और सीपिओं के बटन। बिल्कुल गोआ समुद्रतट स्पेशल!
उसने कमी को मरे हुये चूहे की तरह उठाया और पत्नी से जाकर बोला-
‘‘कैसा विचित्र आदमी है बताओ। चौतीस सौ रूपये में ये चद्दर ख़रीद लाया और वो भी उपहार में देने के लिये।’’
पत्नि बोली- ‘‘तो क्या हुआ...?’’
शम्भुनाथ बोला- ‘‘गज़ब करती हो यार, मैं कोई एक्टर थोड़े ना हूँ जो ऐसा झन्डू पन्चारिस्ट टाइप का कमीज़ पहनूँ ।’’
पत्नि बोली- ‘‘हाँ जानती हूँ कि तुम प्रोफ़ेसर हो लेकिन इससे क्या फ़र्क पड़ता है।’’
शम्भूनाथ चिढ़कर बोला- ‘‘बहुत फ़र्क पड़ता है। तुम एस्नो-पाऊडर वाली जात कभी नहीं समझ सकोगी ये सब।’’
पत्नि बुरा मान गई और उसी वक़्त मायके चली गई। इसलिये भी चली गई कि मायके बगल वाले मुहल्ले में है और शायद इसलिये भी चली गई कि बहुत दिनों से प्रोफ़ेसर शम्भूनाथ के तम्बू में सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है और शायद इसलिये भी कि प्रोफेसर औरतों के मामले में चूहा है सो इनव्हेस्टमेन्ट का मूल-सूद सब उसे ही मिलना है।
प्रोफ़ेसर की नाराज़गी का कारण एक सामाजिक गणित है और उसकी पत्नि की नाराज़गी का कारण एक मानसिक गणित।
दोनों सौर्टेड हैं और युनिवर्सिटी के सदके जी-खा रहे हैं। दोनों का सामन्जस्य सौर्टेड है। दोनों की पढ़ाई काम आ रही है।
पढ़ाई...!
मानसिक गणित...!
सामाजिक गणित...!
रस्साकशी...!
और नूराकुश्ती...!
ये सब बेहद ज़रूरी है। ये सब एक प्रकार के 'टूल्स' हैं और 'टिप्स' देने के लिये तुम्हारे पास बीबी है... माँ है... बहन है... बुआ है... चाची है...। 'टूल्स' और 'टिप्स' से तुम अपनी दक्षता, जो तुम बाल पोथी से लेकर एम. फ़िल की किताबों तक माँजते आये हो, को और चमक दे सकते हो। 'टूल्स' और 'टिप्स' तुम्हारा सबसे अच्छे दोस्त हैं। यह विश्वविद्यालयों, स्कूलों और संगठनों की नींव में भी है और आन्तरिक सज्जा में भी।
'टूल्स' और 'टिप्स' अमर रहें !
युनिवर्सिटीज़ अमर रहें !
प्रोफ़ेसर शम्भुनाथ एक रोज़ बड़ा बेचैन था। नूराकुश्ती का सप्ताह ख़त्म हो गया था और बीबी मायके से वापस आ चुकी थी। पत्नि ने चाय देते वक़्त पूछा- ‘‘अजी हुआ क्या...?
प्रोफ़ेसर पहले तो सकुचाया, फिर बोला - ‘‘अच्छा वो राहुल पांडेय.. कभी कोई पैसे-वैसे देने के लिये आये तो मत लेना, अच्छा नहीं लगता है।"
पत्नि बोली - ‘‘पैसे? काहे के पैसे? और ये राहुल पांडेय वही न, तुम्हारा दोस्त.... जिसने कुछ दिन पहले बिना किसी ओकेज़न के तुम्हें उपहार में वो तीन हजरिया कमीज़ दी थी, जिसे तुम पहनते ही नहीं हो।’’
प्रोफ़ेसर बोला.. ‘‘हाँ .. वही राहुल पांडेय..।’’
पत्नि भाँप गई!
‘‘तो तुमने उसे उधार दिया था...?’’
पांडेय ने कुछ नहीं कहा। उसने चाय का प्याला उठाया और सुड़कने लगा।
‘‘कितने रूपये दिये थे...?’’
पत्नि उत्सुक होकर पूछा।
प्रोफ़ेसर ने परे देखते हुए कहा - ‘‘यही कोई चार हज़ार।’’
पत्नि बोली- ‘‘शर्ट लेने के पहले या बाद में...?’’
प्रोफ़ेसर झल्ला कर बोला-
‘‘अरे यार, लेने के पहले, और लेने के पहले का क्या मतलब, हम गये थे क्या कमीज़ माँगने, बात करती हो।’’
प्याला उसने थोड़ा पटक कर रखा और उठते हुये बोला - ‘‘अरे उसने दी थी शर्ट, मैंने थोड़े ही लिया था।’’
पत्नि बोली - ‘‘नाराज मत हो, एक ही बात है। पैसा ले गया लेकिन कम से कम एक शर्ट तो दे गया।  वो भी ब्रान्डेड। शर्ट की कीमत और ब्रान्ड वैल्यू को फ़ील करोगे तभी तो बैलेन्स बाद में एडजस्ट करने का जुगाड़ लगाओगे।’’
प्रोफ़ेसर तुनक कर बोला - ‘‘बहुत इकॅन्मिक्स झाड़ने लगी हो आजकल।’’
पत्नी मुस्कुरा कर बोली - ‘‘नहीं....अकाऊन्टेन्सी! और एक बार कमीज़ का ब्रान्ड तो देख लो। 'लेवाईस' का शर्ट है, स्पेशल मियामी एडीशन! पहन के निकलोगे तो चार आदमी इमप्रेस होंगे। ओ.एल.एक्स वाले एक प्रचार में एक आदमी इसी तरह की कमीज़ पहने हुये है। कपड़े-जूते में खर्च तो बहुत करते हो लेकिन एक भी ढ़ंग का ब्रान्ड नहीं पहनते हो। भागलपुरिया सिल्क के कुर्ता में कितना पैसा बरबाद हो गया तुम्हारा लेकिन जब पहन के निकलते हो तो लोग एक प्राईमरी स्कूल के मास्टर की तरह देखते हैं तुम्हें। ज़माना बदल गया है। ज़माने के साथ चलो।"
ब्रान्ड वैल्यू की बात प्रोफ़ेसर के भेजे में खट से सेट हो गई और उस शाम वह वही कमीज़ पहन कर निकल गया। फूलदार! छींटदार! सीपीयों वाले बटन और डेढ़ हाथ के कॉलर वाली कमीज़।
उमेश पान भन्डार तक पहुँचते-पहुँचते उसकी तबियत में सर्राफ़ा बाज़ार सा उछाल आ गया। कदाचित सभी उसे देख रहे थे,  ऐसा उसे लगा। उसने कन्धों को हल्के से उचकाया और अपनी पीठ और सीधी कर ली। अब तक कपड़े सिलवा कर पहनता आया था लेकिन आज एक ब्रान्डेड रेडिमेड कमीज़ पहन कर निकला था। पाँच सौ का कपड़ा और पच्चीस सौ की ब्रान्डिंग। पान दुकान तक पहुँचते-पहुँचते उसकी तबियत में तीन हज़ार का कॉनफ़िडेन्स जुड़ गया सो अलग। पहनने के तीन मिनट के भीतर कमीज़ उसे अच्छी लगने लग गई। कितना सरल है यह सब। इसे प्रायोगिक ज्ञान कह सकते हो क्योंकि, प्रोफ़ेसर शम्भूनाथ कभी भी इकॅन्मिक्स  विषय को बिना ग्रेस मार्क्स के पास नहीं कर पाया था।
उमेश पान भन्डार पर दो लपकचुन्नू पहले से मौजुद थे। लपकचुन्नू मने...? मने तुम्हारी बात शुरू हुई नहीं कि तुम्हें चुन्नू-मुन्नू सरीखा  बालक समझ कर तुम्हारी बात बीच में ही लपक लेंगे। भले ही उन्हें एम.एम.एस. का फ़ुल फ़ॉर्म नहीं मालूम हो लेकिन, वो तुम्हें मेसेज की बारीक़ियाँ समझाना शुरू कर देंगे। पतली-पतली गलियों से तुम्हें घसीटते, ऐसी-ऐसी घटनाओं के बाज़ार घुमा लायेंगे कि तुम भी उनके जी.के. के कायल हो जाओगे। कौन सा पहला एम.एम.एस. था जो फलाने मशहुर गायक ने चिलाने अभिनेत्री को रात में दो बजे भेजा था और जिसकी वजह से सात लोग अपनी जान से हाथ धो बैठे थे?
किस पार्टी के मन्त्री के एक एम.एम.एस. की वजह से एक राज्य की पूरी सरकार तेल लेने चली गई थी?
किस एम.एम.एस. ने सन्सद से लेकर बालीवुड में अपनी धूम मचाई थी और एम.एम.एस क्या..., तुम कुछ भी बोल कर देखो। पान दुकान पर, ई.एम.यू., डी.एम.यू. से लेकर राजधानी एक्सप्रेस की बोगियों में, सभागारों के अन्दर भी, बाहर भी, मन्दिर की सीढ़ीयों पर और यहाँ तक की क़ब्रिस्तानों और श्मशानों में मुर्दे को विदा करने आई भीड़ में भी। तुम्हें पता चल जायेगा कि तुम लपकचुन्नुओं से घिरे हुये हो।
बहरहाल! प्रोफ़ेसर के उधार का सूद एक ब्रान्डेड शर्ट के कारण मूलधन का दुगुना हो चुका था। उस ब्रान्डेड शर्ट के चलते आये कॉनफिडेन्स में लबालब स्कूटर से बिना उतरे उसने कहा-‘‘अरे उमेेश...दो सिगरेट देना...।’’
उमेेश की बोलती सटक गई! दोनों लपकचुन्नू उसके मुँह पर आते-जाते भावों को देख जुगाली करना छोड़ प्रोफेसर को विहंगम भाव से देखने लगे। प्रोफेसर ने फिर से कन्धों को उचकाया और कहा-
‘‘क्या हुआ जी? फिर पॉलिथिन मार के बैठे हो क्या...।’’
प्रोफेसर का यह सम्वाद जैसे उमेेश के लिये स्ट्रेस बस्टर जैसा था। उसकी बत्ती जली और वह ठठा कर हँस पड़ा। सिर्फ हँसा ही नहीं बल्कि ताली मार-मार कर उस हँसी के प्रॉडक्ट पर बार-कोडिंग भी करने लगा। वस्तुतः, वह कम्फर्ट जोन में वापस आ गया था।
हँसी और तालियों के साज के संगत के बीच वह अलापा- ‘‘अरे परफेसर साहब... आप हैं... हम समझे कि त कोई गुटका कम्पनी वाला जे है से की अपना मैनेजर के भेज दिहीस है। आई तोरी के... आप तो चिन्हाईये नहीं रहे हैं। ऐसन टिन्च होके त आप कहियो निकलते नहीं हैं।’’
हो-हो-हो-, ताली और हँसी... हँसी और ताली। पान वाले की खुशी, तकल्लुफ का बाँध तोड़ कर उसके ओठों के किनारों से उपला कर, हरहराती-दनदनाती गंगा की तरह उसके ठुड्डी की आर बह चली।  यह वही उमेेश गोप है, असली नाम उमेेश चन्द्र यादव। जो उसे हमेशा मास्टर साहब कर कर सम्बोधित करता रहा है। जान-बूझ कर। नीचा दिखाने या चिढ़ाने के उद्देश्य से नहीं, बस अपनापन में। आज क्या हो गया...? अपनापन का आत्मविश्वास किस चमक के आगे धुँधला पड़ गया?
कमीज़...! फूलदार...! छीटदार...! सीपिओं के बटन और डेढ़ हाथ के कॉलर वाली एक ब्रान्डेड कमीज...! अपनापन से दुकान की साख खराब होती है और ब्रान्डिंग की चकाचौंध से अपनापन का बर्हिमुखीपन कमजोर होता है। दुकान बचानी है तो प्रोडक्ट को ब्रान्ड में लपेट कर रखो। यह वही उमेेश गोप है... वो वही रीडर शम्भूनाथ है, वही पान भन्डार, वही सिगरेट की तलब और वही पुराना सम्वाद-
‘दो सिगरेट देना...।’
लेकिन आज शम्भूनाथ नाम का प्रोडक्ट, 'री-इन्कारनेट हो गया', जैसे किसी ने नेपथ्य से कहा हो- ‘पुनर्जिवितो भवः!’ सब कुछ वहीं रह गया। बस एक मास्टर साब टाईप का अदना सा, बेचारा सा रीडर, एक ब्रान्डेड कमीज़ के कारण प्रोफ़ेसर साहब बन गया। दोनों लपकचुन्नू पशोपेश में बस जुगाली करते रह गये। ब्रान्डेड कमीज़ ने अपनी वैल्यू ऐडेड सर्विस का नज़ारा भी दिखा दिया...। जय हो ब्रान्डिंग! जय हो वैल्यू ऐडेड सर्विस...!
‘‘निर्मल अगस्त्य’’
12 मार्च 2014
पटना