‘‘एक अकेला इस शहर में-गोलघर पर पहला शॉट!’’
‘‘निर्मल अगस्त्य’’
लोकाचारी निभाना कितना जटिल होता जा रहा हैे! है न...? और हमेशा की तरह मेरी बात महफिल के मुँह में हवा मिठाई की तरह छू-मन्तर हो गई। करीबी मित्र ने नयी कार ली थी सो बधाई देने वालों की भीड़ में मैं भी शामिल हूँ। आदतन नहीं, बल्कि मेरे कुछ युवा पत्रकार मित्र मुझे घसीट लाये हैं ताकि दो-चार पैग व्हिस्की और कुछ उन्मुक्त पलों का मजा मैं भी ले सकूँ। उन्हें मालूम है कि मेरा घर कुछ समयातीत लेकिन पावन संस्कारों का पुलिन्दा है जिसकी गाँठ को पिताजी हर वक्त कसने में लगे रहते हैं।
सिहरा कर चली जाती है उस साल के उस महीने की याद। केन्द्र ने चार दिन पहले तीन सौ छप्पन हटा लिया था। लेकिन हवा में अब भी वही अल्लहड़पन था। सभी पार्टियाँ अपने-अपने तरीके से प्रतिक्रिया व्यक्त करने और सहानुभूतियाँ बटोरने में जुटी हुई थीं। स्टेशन रोड की भीड़, बीत गये हर दिन की तरह अर्धबेहोशी में फूटपाथ पर उगी घास छीलने और धूल उड़ाने में व्यस्त थी। किसी के चेहरे पर प्रजातन्त्र की बदहाली को कोई खास सबूत नहीं था। शंकर बिगहा बाले हादसे का लहू सूखा भी नहीं कि उस दिन जहानाबाद में सात लोगों को मौत की नींद सुला दिया गया। समाचार पढ़ कर लोगों की मुठ्ठियाँ नहीं भिंचती, आँखों में लहू नहीं तैरता, बल्कि अँगुलियाँ पृष्ठों को तेजी से पलट कर सर्राफा और जिन्स के भावों वाले पन्ने की ओर ले जाती हैं। क्या पता, प्याज फिर से अस्सी रूपये हो गया तो? सचमुच, प्याज उस देश के लिये एक बड़ा मुद्दा है जिसकी अखन्डता प्याज के परतों की तरह है। छीलते जाईये और रंग बदला-बदला सा देख भी जीते जाईये।
प्याज सरकार पलट सकती है। रातों-रात टी.वी. के हजारों सेट बिकवा सकती है और सबसे गौरतलब बात तो यह है कि उस साल मेरे गाँव में एक शादी तक टूट गई क्योंकि लड़के वालों ने दहेज में दो सौ मन प्याज माँग लिया था।
ऐसे डरे और सहमे हुये हैं, चक्रवर्ती सम्राट, अशोक मौर्य की घरती के लोग। बेटा- बेटी, बूढ़े माँ-बाप, जवान बहू... अनेक विवशतायें हैं। क्या जाने बाबा की हजार बाहें लोगों को अपनी ओर बुलाती भी है या नहीं ?
‘‘देखोगे सौ बार मरूँगा, देखोगे सौ बार जिऊँगा
हिंसा मुझको थर्रायेगी, मैं तो उसका खून पिऊँगा
प्रतिहिंसा ही स्थायित्व है मेरे कवि का
जन-जन में जो उर्जा भर दे मैं उद्गाता हूँ उस रवि का।’’
(नागार्जुन- हजार-हजार बाँहों वाली से।)
इतिहास के पन्नों में पाटलिपुत्र अजर है। पर हमने कभी सोचा भी नहीं था कि माँ गंगा की गोद में बसा यह शहर आज संस्कृति की चौखट पर धूल-धुसरित हो औंधा पड़ा रहेगा। गुलाबों की नगरी, उदयिन का सपना, अशोक का वैभव, किताबों की कैद में है और लोदीपुर के पास स्थित संग्रहालय में संग्रह-सुरक्षा के आक्सीजन पर जीवित तो है लेकिन कोमा में।
उस वक्त जब मेरी जवानी के दिन लगभग शुरू ही हुये थे, कुछ बड़े और खुले दिल के चौर्य-ज्ञानी युवा, महानगरों का ज्ञान थोड़ी-थोड़ी संस्कृति, फैशन और जीवनशैली दिल्ली, बम्बई, पुणे और बंगलोर जैसे शहरों से चुराने लगे थे और कर्ण की तरह पटना के युवाओं को दान करने में लगे थे। उनकी ही कृपा से शहर हिस्सों में बँटने लगा था। उधर कुछ वर्षों में पटना मार्केट, बोरिंग कैनाल रोड, मौर्या कॉम्पलेक्स और उससे सटे डाकबंगला रोड वाले इलाके, उच्च वर्ग से लेकर उच्च मध्यम वर्ग की सम्वेदनाओं को समेटने में लगे थे। स्टेशन के पास दुमंजिले पर लिट्टी और चन्द्रकला की दुकान, आर-ब्लॉक चौराहे के पास डाक-तार संगीत संस्था से सटी चाय की दुकान, निम्न मध्यवर्ग के लोगों की जमावट को पालते थे। मूल तौर पर दोनों क्रमशः पूंजीवाद और समाजवाद की वकालत करने वाले लोगों का समूह था। सिगरेट के धुँओं से निकले छल्लों के बीच अगर कहीं ‘मिस यूनीवर्स’ और ‘द मुअर्स लॉस्ट साइट’ का जिक्र होता है तो लगता था हम बोरिंग रोड या मौर्या कम्पलेक्स में हैं लेकिन जब केन्दू के पत्तों की गन्ध के बीच सुनाई पड़ता था-
‘‘अस्सी चुटकी नब्बे ताल
तब पूछो खैनी का हाल’’
और कहीं-कहीं ये भी सुनाई पड़ता था-
‘‘अस्सी चुटकी न दे ताल
रगड़ के खैनी मुँह में डाल’’
घुमा फिरा कर दो तरह के खाने वाले थे। एक, जो ताली मार कर रगड़ी हुई खैनी की धूल उड़ा देते थे और दूसरे जो बिना धूल उड़ाये केवल रगड़ के खाना पसन्द करते थे। अचम्भे की बात ये है कि आज सन दो हजार पन्द्रह ईसवी में भी यही दो प्रकार के खैनी खाने वाले लोग हैं। बदलाव के इस भयावह दौर में खैनी खाने का तरीका नहीं बदला। खैनी उन गिनी चुनी वस्तुओं में से है जो समाजवाद को जिन्दा रख सकता है।
बीच-बीच में हड़ताल और अतिक्रमण विरोधी कार्यवाईजन्य समस्याओं से बिगड़े फूटपाथी विक्रेताओं की देसी गालियाँ सुनाई पड़े तो यकीनन हम आर-ब्लॉक या दोमंजिले लिट्टी की दुकान में थे। मिला जुला के मध्यमवर्ग कहीं का नहीं है। इन्हें दो पैग का नशा चढ़ा नहीं कि अरून्धती रॉय और जुबिन मेहता याद आते हैं और एक महीने तनख्वाह नहीं मिली तो बाबा नागार्जुन और प्रेमचन्द याद आने लगते हैं। मेरा मित्र अभी पायदान पर लटका हुआ है। क्या पता लोन पर लिये इस कार को खरीदने के बाद उपर चढ़ने में और ज्यादा दमखम और साहस का परिचय दे जाये। पार्टी में गहमा-गहमी तो नहीं थी लेकिन गाने की आवाज ज्यादा होने से लग रहा था कि हम मेले में धीरे-धीरे बढ़े जा रहे हैैंं। तभी एक कोने से हुर्रे की आवाज से हम सभी चौंके। देखा चार लड़के जीवन को कन्धे पर उठा कर चिल्ला रहे थे। धीरे-धीरे पता चला कि जीवन जिस लड़की को फांसने में अपने सारे अनुभव खर्च कर चुका था, उसी लड़की ने उस दिन एक अखबार में उसके नाम खुला संदेश दिया था। ओह्! उस रोज ‘वैलेन्टाइन्स डे’ था। मैं जैसे नींद से जागा।
कभी फुर्सत मिली तो जीवन से वैलेन्टाइन का मतलब पुछूँगा। वह भी तीन साल तक दिल्ली के सातों घाट का पानी पी कर लौटा है। हम सभी दोस्त इस पार्टी में अपने होने की सही वजह तलाश रहे थे।
बहरहाल उस दिन जिस दरम्यान मेरी जवानी के दिन लगभग शुरू ही हुये थ, रैपिड एक्शन फोर्स वालों की पटना के मुख्य मार्गों पर पुरजोर हुकूमत रही। लेकिन मजे की बात देखने को यह मिली की पूंजीवाद के प्रतिनिधित्व करते सारे इलाके खामोश रहे। दुकाने बन्द थीं, जगह-जगह नियॉन बल्ब और ग्लो साइन्स के रेजे फूटपाथ पर ही बिसरा दिये गये पदचिन्हों को चूम रहे थे। लेकिन स्टेशन रोड वाली लिट्टी-चन्द्रकला और आर. ब्लॉक वाली चाय की दुकान पर शाम होते ही यथावत गहमागहमी हो चली। केन्दू के पत्तों की गन्ध और खैनी के उड़ते चूरन से हवा में उठती सुरसुराहट के बीच, मैं और जीवन भी छुपते-छुपाते वहा पहुँचे और चाय सिगरेट का मजा लेने लगे। जीवन टेलीफिल्म को लेकर ज्यादा ही चिन्तित दिखा। कहानी, पटकथा, डॉयलाग, संगीत-निर्देशन और मुख्यपात्र की सारी जिम्मेदारी मेरे कंधे पर डालने के उपरान्त भी। पटकथा के अनुसार पहली ही सीन में मुझे गोलघर के बाहरी चबूतरे पर खड़े होकर ‘टाईटेनिक’ फेम ‘लियोनार्डो डी कैप्रियो’ की तरह बाँहों को फैलाकर आसमान समेटना था।
जीवन कई सालों से बिहार से बाहर रह रहा था और उसको समझाना बड़ा मुश्किल था कि पटना में रह कर आदमी कुछ नहीं समेट सकता, खासतौर पर उस मन्डल-कमन्डल के बीच चल रहे रस्साकशी के भयावह दौर में और खास कर कला के क्षेत्र में। दो चार नामों को अपवाद में लिया जाये तो पता लगता था कि अधिकांश लोग संगीत के नाम पर अच्छी खासी लूट मचा रहे हैं। सपने एकरंगे होते हैं- ‘मोनोक्रोम’। लेकिन उस दौर में जब मेरी जवानी के दिन लगभग शुरू ही हुये थे, महसूस हुआ कि सपने बेसूरे भी होते हैं, अगर आपकी ख्वाहिश संगीत के क्षेत्र में सुसंस्कृत बने रहते हुये कुछ कर दिखाने की है, वह भी इस शहर की बदल दी गई सभ्यता को आद्योपांत स्वीकार करते हुये। मेरी इस बात को कस कर थाम लिया जीवन ने और इसका पोस्टमार्टम कर टेलिफिल्म का नाम भी ढ़ूँढ़ लिया उसने -‘‘एक बेसूरा सा सपना।’’
नोट्रेडेम कम्युनिकेशन सेन्टर से सारी तकनीकी सुविधायें ली जानी थी और देखना यह था कि जीवन सिंह इस कमसिन शुरूआत के बाद आगामी कुछ वर्षों में क्या बनता है। ‘जीवन स्टीवेन स्पीलबर्ग’ या ‘जीवन कैमरून सिंह ’।
मुझे उम्मीद नहीं थी कि मैं कम से कम निर्मल अगस्त्य बने रहने में कामयाब रहुँगा भी या वही नीरजवा या निर्मलवा बन कर किसी प्राइवेट कम्पनी मे यस बॉस-यस बॉस का मन्त्रोचारण करते हुये आपाधापी के देवता की पूजा आराधना करनी होगी। तब तक मन्डली में दो मित्र और आ गये और एक नयी बहस छिड़ गयी थी।
‘‘यार तुम जे.एन.यू. क्यूँ नहीं जाते।’’
मेरे एक बुजुर्ग मित्र की अलुआ के भाव वाला मशवरा पहले को बहुत नही जँचा।
‘‘धूर..., काहे लऽ...? का बुझते हो, ई बिहार का संस्कृति कौनो विश्वविद्यालय से कम है का?’’
यह प्रतिक्रिया उनके साथ आये कंचे जैसी आँखों वाले एक सज्जन की थी जो पिछले पाँच सालों से क्षेत्रिय राजनीति के रथ पर चढ़ने के लिये बेहाल थे। मसला में रोमांच पिरोने के लिये मैंने उनसे पूछा- ‘‘कहिये मुनि लाल जी, अबकि टिकट मिलने की कुछ उम्मीद।सरकार बदल गई है।’’
उसने एक चुस्की मारते हुये कहा- ‘‘अरेऽऽ... अगस्त्या बाबू..., का बतायें, ई अपना बिहार जो है न, एकदम धुरफन्दियों का चरागाह है, समझे। किसी से कहियेगा नहीं। रूलिंग पाटी के दो चार दबंग नेतवन के पास गये तो कहिस कि अरेऽऽ, तुमरा बाप तो यादव है न..., स्साले भागते हो की नहीं, और विपक्षी पार्टी में गये त मेन दलाल कहिस कि हमरे पारटी में आना था तो भूमिहारिन से बियाह काहे ले कर लिया रे अभागाऽऽऽ...।’’
मुझे ताज्जुब हुआ कि मुनि मनोहर राय अपने बारे में कहते और अपनी ही बखिया उधेड़ते समय भी इतना बेबाक कैसे था। लगता है बिहार प्रदेश की राजनीतिक दाव-पेंच ने उसे कड़वाहट पीना अच्छी तरह सिखा दिया था।
बहरहाल, होली के कुछ ही दिन बाकी थे। मेरे मुहल्ले से पश्चिम में बाबा चौहरमल टोले में रात के नौ बजते-बजते होरी का आलाप शुरू हो जाता है। कभी भी धीमे लय वाला गाना नहीं होगा और ताल सिर्फ कहरवा या दादरा। ज्यादातर कहरवा। यह शुरू हुई हारमोनियम और ढ़ोलक की जुगलबन्दी।
"धाऽऽ तिनकधिनऽऽ... धगे तिनक धिनऽऽ..."
और इसके पीछे-पीछे शुरू हुआ चौहरमल टोले के सबसे खनकदार आवाज वाले शम्भू पासवान और उसके सहयोगी।
"अबकी फागुन में हो बबुनीऽऽ
अबकि फागुन मेंऽऽ.............................(कोरस)
गौना के डोलिया ले ऐबुऽऽ
अबकि फागुन मेंऽऽ"..........................(कोरस)
बगल में मुस्लिम बाहुल्य इलाका है लेकिन आज तक किसी को कोई एतराज नहीं हुआ। अच्छा लगता है यह देखकर कि ईद की सेवई और होली के मालपुये में एक जैसा स्वाद है। फिर जातीय और धार्मिक हिन्सा की जिम्मेदारी किसके कन्धों पर सौंपी जाय। मुझे नहीं लगता कि कोई सामान्य आदमी बिना वजह एक दुसरे को कष्ट पहुँचाना चाहता है, परोक्ष रूप से भी नहीं।
बुद्ध महावीर और अशोक महान के इस प्रदेश को किसी की नजर लग गई है शायद। मौत और संहार के लिये जाति या धर्म विशेष कोई योग्यता नहीं है और ना ही शोभनीय है उन आँकड़ों का पुर्नआकलन। सभी नरसंहार में प्रायः ऐसे लोग मरते हैं जिनके पास तन ढंकने के लिये ना तो ढंग का कपड़ा होता है ना ही दो जून खाने के लिये रोटी या फिर ऐसे लोग जो एक चींटी तक नहीं मार सकते। स्पष्ट है कि यह उसी दाँव-पेंच का एक घातक पैंतरा है जिससे मुनि मनोहर राय और उसके जैसे कई युवा घायल हो रहेे थे।
फिर भी उस दरम्यान जब मेरी जवानी के दिन लगभग शुरू ही हुये थे और मैं बिना गाल और गला काटे दाढ़ी बनाने की महारत के क्वालीफाईंग राऊँड में हर दूसरे दिन एक मैच हार रहा था, बिहार प्रदेश आज की तरह उतना बनावटी नहीं था। कच्चा था, हरा था, जैसे दार्जिलिंग पहाडि़यों से टूँगी गई चाय की पत्तियाँ। विदाउट प्रोसेस्ड्, विदाउट फिल्टर्ड, एंड विदाउट पैक्ड्। यहाँ की चालीस प्रतिशत आबादी गरीब है और पैंतालीस फीसदी से ज्यादा अनपढ़, बावजूद इसके--
‘‘असम के लोगों का भोलापन था यहाँ
पंजाब के आर्यों की ताकत भी थी यहाँ,
खुले गाँव, सड़क, महाराष्ट्र के तमाशे से थे
नाल-ढोलक की थाप में बंगाल के ताशे भी थे’’
इस इन्टरनेट ने सब कुछ घाल मेल कर के रख दिया और उसपर फेसबुक पर विचरते ज्ञानियों की असीम अनुकम्पा। अब बिहार, बिहार न रहा। ठेठ और मॉडर्न का हाई-ब्रीड हो गया है।
एक बार केरल गया था, राष्ट्रीय कैरम टूर्नामेंट में बिहार के जूनियर टीम का कप्तान बन कर। वहाँ त्रिवेन्द्रम की एक लड़की से दोस्ती हुई। वह भी हिन्दी की वजह से। वह हिन्दी बहुत अच्छा बोल लेती थी। उसके प्रति मेरा यह आश्चर्य धीरे-धीरे दोस्ती में बदल गया। प्रतियोगिता के तीसरे दिन बिहार की टीम सारी प्रतिर्स्पद्धाओं से बाहर हो चुकी थी। हमलोग फुर्सत ही फुर्सत में थे। वह मुझे और चौबे को अपने घर ले गई और कॉफी के साथ केले और कटहल का चिप्स खाने को दिया। उस कॉफी में एक अजीब सा स्वाद था और मनभावन सी खुश्बू भी। लगता था चॉकलेट को सिगरेट के धुएँ में पकाया गया हो। हमलोगों के पूछने पर उसने बताया कि वह कच्ची कॉफी थी। बगीचे से तोड़ा, धूप में सुखाया और दुध, पानी, चीनी के मिश्रण में डाल कर चूल्हे पर चढ़ा दिया।
बस यही था बिहार प्रदेश। कच्चे कॉफी की तरह। उस पार्टी के अगली सुबह टेलिफिल्म के भाग दो की पटकथा के लिये बख्शी आने वाला था। ऐसी भी छत पर बैठे एक घंटे हो गये थे लेकिन सामने वाली खिड़की में हर रोज दिखने वाला चेहरा दिखा नहीं। शायद वे लोग कहीं बाहर गये हों। तभी मुहल्ले के ही एक अतिपरिचित वरिष्ठ पत्रकार दूध का कैन ले कर बगान की तरफ जा रहे थे। बिना रेलिंग के छत की क्या प्राईवेसी उसपर जब मकान भी नीचा हो। सोचा जल्दी से छुप जाऊँ वरना वे पूछ बैठेंगे-
‘‘क्या निर्मल जी कैसे हैं... कैसी चल रही है साहित्य और संगीत की जुगलबंदी...? मेरे मिंटु के लिये कोई ज्ञानवर्धक लेख हो तो....’’।
सभी जानते थे की सुत-चरित-परिमार्जन नाम के एक जिन्न ने उन्हें ओ.सी.डी. की तरह जकड़ रखा है और उनका ग्वाला, ‘पूत कपूत तो क्या धन संचय; पूत सपूत तो क्या धन संचय’ जैसा धर्मसंकटीय विषय देकर रोज ही उन्हें व्याख्यान के चक्कर में डाल कर उनके कैन में पानी मिला देता था। अब वे बस चार खम्भों की दूरी पर थे।
मैंने जल्दी से छत पर फैले सारे सामान, जैसे गिटार, चटाई, डायरी, कलम, प्लेक्ट्रम, कप, प्लेट वगैरह समेटे लिये और चुपचाप नीचे चला आया। ‘‘निजं शरणम् गच्छामि’’...।
‘‘निर्मल अगस्त्य’’
26 जनवरी 2015
पटना

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