‘‘लपकचुन्नुओं के देश में’
‘‘ब्रान्ड वैल्यू की जय!’’
एक बार प्रोफ़ेसर शम्भूनाथ को उसके एक मित्र ने उपहार में एक कमीज़ दी।अव्वल... कमीज़ तो कमीज़ है...। कॉलर वाली... दो बाँहों वाली... और क़रीब आधे दर्जन बटनों वाली।
उसके जाने के बाद प्रोफ़ेसर शम्भूनाथ कमीज़ को उलट-पलट कर देखता रहा। वह कमीज़ में तमीज़ ढूँढ़ने लगा। चटक पीला रंग! फूल पत्ते सी प्रिन्टिंग, डेढ़ हाथ का कॉलर और सीपिओं के बटन। बिल्कुल गोआ समुद्रतट स्पेशल!
उसने कमीज़ को मरे हुये चूहे की तरह उठाया और पत्नी से जाकर बोला-
‘‘कैसा विचित्र आदमी है बताओ। चौतीस सौ रूपये में ये चद्दर ख़रीद लाया और वो भी उपहार में देने के लिये।’’
पत्नि बोली- ‘‘तो क्या हुआ...?’’
शम्भुनाथ बोला- ‘‘गज़ब करती हो यार, मैं कोई एक्टर थोड़े ना हूँ जो ऐसा झन्डू पन्चारिस्ट टाइप का कमीज़ पहनूँ ।’’
पत्नि बोली- ‘‘हाँ जानती हूँ कि तुम प्रोफ़ेसर हो लेकिन इससे क्या फ़र्क पड़ता है।’’
शम्भूनाथ चिढ़कर बोला- ‘‘बहुत फ़र्क पड़ता है। तुम एस्नो-पाऊडर वाली जात कभी नहीं समझ सकोगी ये सब।’’
पत्नि बुरा मान गई और उसी वक़्त मायके चली गई। इसलिये भी चली गई कि मायके बगल वाले मुहल्ले में है और शायद इसलिये भी चली गई कि बहुत दिनों से प्रोफ़ेसर शम्भूनाथ के तम्बू में सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है और शायद इसलिये भी कि प्रोफेसर औरतों के मामले में चूहा है सो इनव्हेस्टमेन्ट का मूल-सूद सब उसे ही मिलना है।
प्रोफ़ेसर की नाराज़गी का कारण एक सामाजिक गणित है और उसकी पत्नि की नाराज़गी का कारण एक मानसिक गणित।
दोनों सौर्टेड हैं और युनिवर्सिटी के सदके जी-खा रहे हैं। दोनों का सामन्जस्य सौर्टेड है। दोनों की पढ़ाई काम आ रही है।
पढ़ाई...!
मानसिक गणित...!
सामाजिक गणित...!
रस्साकशी...!
और नूराकुश्ती...!
ये सब बेहद ज़रूरी है। ये सब एक प्रकार के 'टूल्स' हैं और 'टिप्स' देने के लिये तुम्हारे पास बीबी है... माँ है... बहन है... बुआ है... चाची है...। 'टूल्स' और 'टिप्स' से तुम अपनी दक्षता, जो तुम बाल पोथी से लेकर एम. फ़िल की किताबों तक माँजते आये हो, को और चमक दे सकते हो। 'टूल्स' और 'टिप्स' तुम्हारा सबसे अच्छे दोस्त हैं। यह विश्वविद्यालयों, स्कूलों और संगठनों की नींव में भी है और आन्तरिक सज्जा में भी।
'टूल्स' और 'टिप्स' अमर रहें !
युनिवर्सिटीज़ अमर रहें !
प्रोफ़ेसर शम्भुनाथ एक रोज़ बड़ा बेचैन था। नूराकुश्ती का सप्ताह ख़त्म हो गया था और बीबी मायके से वापस आ चुकी थी। पत्नि ने चाय देते वक़्त पूछा- ‘‘अजी हुआ क्या...?
प्रोफ़ेसर पहले तो सकुचाया, फिर बोला - ‘‘अच्छा वो राहुल पांडेय.. कभी कोई पैसे-वैसे देने के लिये आये तो मत लेना, अच्छा नहीं लगता है।"
पत्नि बोली - ‘‘पैसे? काहे के पैसे? और ये राहुल पांडेय वही न, तुम्हारा दोस्त.... जिसने कुछ दिन पहले बिना किसी ओकेज़न के तुम्हें उपहार में वो तीन हजरिया कमीज़ दी थी, जिसे तुम पहनते ही नहीं हो।’’
प्रोफ़ेसर बोला.. ‘‘हाँ .. वही राहुल पांडेय..।’’
पत्नि भाँप गई!
‘‘तो तुमने उसे उधार दिया था...?’’
पांडेय ने कुछ नहीं कहा। उसने चाय का प्याला उठाया और सुड़कने लगा।
‘‘कितने रूपये दिये थे...?’’
पत्नि उत्सुक होकर पूछा।
प्रोफ़ेसर ने परे देखते हुए कहा - ‘‘यही कोई चार हज़ार।’’
पत्नि बोली- ‘‘शर्ट लेने के पहले या बाद में...?’’
प्रोफ़ेसर झल्ला कर बोला-
‘‘अरे यार, लेने के पहले, और लेने के पहले का क्या मतलब, हम गये थे क्या कमीज़ माँगने, बात करती हो।’’
प्याला उसने थोड़ा पटक कर रखा और उठते हुये बोला - ‘‘अरे उसने दी थी शर्ट, मैंने थोड़े ही लिया था।’’
पत्नि बोली - ‘‘नाराज मत हो, एक ही बात है। पैसा ले गया लेकिन कम से कम एक शर्ट तो दे गया। वो भी ब्रान्डेड। शर्ट की कीमत और ब्रान्ड वैल्यू को फ़ील करोगे तभी तो बैलेन्स बाद में एडजस्ट करने का जुगाड़ लगाओगे।’’
प्रोफ़ेसर तुनक कर बोला - ‘‘बहुत इकॅन्मिक्स झाड़ने लगी हो आजकल।’’
पत्नी मुस्कुरा कर बोली - ‘‘नहीं....अकाऊन्टेन्सी! और एक बार कमीज़ का ब्रान्ड तो देख लो। 'लेवाईस' का शर्ट है, स्पेशल मियामी एडीशन! पहन के निकलोगे तो चार आदमी इमप्रेस होंगे। ओ.एल.एक्स वाले एक प्रचार में एक आदमी इसी तरह की कमीज़ पहने हुये है। कपड़े-जूते में खर्च तो बहुत करते हो लेकिन एक भी ढ़ंग का ब्रान्ड नहीं पहनते हो। भागलपुरिया सिल्क के कुर्ता में कितना पैसा बरबाद हो गया तुम्हारा लेकिन जब पहन के निकलते हो तो लोग एक प्राईमरी स्कूल के मास्टर की तरह देखते हैं तुम्हें। ज़माना बदल गया है। ज़माने के साथ चलो।"
ब्रान्ड वैल्यू की बात प्रोफ़ेसर के भेजे में खट से सेट हो गई और उस शाम वह वही कमीज़ पहन कर निकल गया। फूलदार! छींटदार! सीपीयों वाले बटन और डेढ़ हाथ के कॉलर वाली कमीज़।
उमेश पान भन्डार तक पहुँचते-पहुँचते उसकी तबियत में सर्राफ़ा बाज़ार सा उछाल आ गया। कदाचित सभी उसे देख रहे थे, ऐसा उसे लगा। उसने कन्धों को हल्के से उचकाया और अपनी पीठ और सीधी कर ली। अब तक कपड़े सिलवा कर पहनता आया था लेकिन आज एक ब्रान्डेड रेडिमेड कमीज़ पहन कर निकला था। पाँच सौ का कपड़ा और पच्चीस सौ की ब्रान्डिंग। पान दुकान तक पहुँचते-पहुँचते उसकी तबियत में तीन हज़ार का कॉनफ़िडेन्स जुड़ गया सो अलग। पहनने के तीन मिनट के भीतर कमीज़ उसे अच्छी लगने लग गई। कितना सरल है यह सब। इसे प्रायोगिक ज्ञान कह सकते हो क्योंकि, प्रोफ़ेसर शम्भूनाथ कभी भी इकॅन्मिक्स विषय को बिना ग्रेस मार्क्स के पास नहीं कर पाया था।
उमेश पान भन्डार पर दो लपकचुन्नू पहले से मौजुद थे। लपकचुन्नू मने...? मने तुम्हारी बात शुरू हुई नहीं कि तुम्हें चुन्नू-मुन्नू सरीखा बालक समझ कर तुम्हारी बात बीच में ही लपक लेंगे। भले ही उन्हें एम.एम.एस. का फ़ुल फ़ॉर्म नहीं मालूम हो लेकिन, वो तुम्हें मेसेज की बारीक़ियाँ समझाना शुरू कर देंगे। पतली-पतली गलियों से तुम्हें घसीटते, ऐसी-ऐसी घटनाओं के बाज़ार घुमा लायेंगे कि तुम भी उनके जी.के. के कायल हो जाओगे। कौन सा पहला एम.एम.एस. था जो फलाने मशहुर गायक ने चिलाने अभिनेत्री को रात में दो बजे भेजा था और जिसकी वजह से सात लोग अपनी जान से हाथ धो बैठे थे?
किस पार्टी के मन्त्री के एक एम.एम.एस. की वजह से एक राज्य की पूरी सरकार तेल लेने चली गई थी?
किस एम.एम.एस. ने सन्सद से लेकर बालीवुड में अपनी धूम मचाई थी और एम.एम.एस क्या..., तुम कुछ भी बोल कर देखो। पान दुकान पर, ई.एम.यू., डी.एम.यू. से लेकर राजधानी एक्सप्रेस की बोगियों में, सभागारों के अन्दर भी, बाहर भी, मन्दिर की सीढ़ीयों पर और यहाँ तक की क़ब्रिस्तानों और श्मशानों में मुर्दे को विदा करने आई भीड़ में भी। तुम्हें पता चल जायेगा कि तुम लपकचुन्नुओं से घिरे हुये हो।
बहरहाल! प्रोफ़ेसर के उधार का सूद एक ब्रान्डेड शर्ट के कारण मूलधन का दुगुना हो चुका था। उस ब्रान्डेड शर्ट के चलते आये कॉनफिडेन्स में लबालब स्कूटर से बिना उतरे उसने कहा-‘‘अरे उमेेश...दो सिगरेट देना...।’’
उमेेश की बोलती सटक गई! दोनों लपकचुन्नू उसके मुँह पर आते-जाते भावों को देख जुगाली करना छोड़ प्रोफेसर को विहंगम भाव से देखने लगे। प्रोफेसर ने फिर से कन्धों को उचकाया और कहा-
‘‘क्या हुआ जी? फिर पॉलिथिन मार के बैठे हो क्या...।’’
प्रोफेसर का यह सम्वाद जैसे उमेेश के लिये स्ट्रेस बस्टर जैसा था। उसकी बत्ती जली और वह ठठा कर हँस पड़ा। सिर्फ हँसा ही नहीं बल्कि ताली मार-मार कर उस हँसी के प्रॉडक्ट पर बार-कोडिंग भी करने लगा। वस्तुतः, वह कम्फर्ट जोन में वापस आ गया था।
हँसी और तालियों के साज के संगत के बीच वह अलापा- ‘‘अरे परफेसर साहब... आप हैं... हम समझे कि त कोई गुटका कम्पनी वाला जे है से की अपना मैनेजर के भेज दिहीस है। आई तोरी के... आप तो चिन्हाईये नहीं रहे हैं। ऐसन टिन्च होके त आप कहियो निकलते नहीं हैं।’’
हो-हो-हो-, ताली और हँसी... हँसी और ताली। पान वाले की खुशी, तकल्लुफ का बाँध तोड़ कर उसके ओठों के किनारों से उपला कर, हरहराती-दनदनाती गंगा की तरह उसके ठुड्डी की आर बह चली। यह वही उमेेश गोप है, असली नाम उमेेश चन्द्र यादव। जो उसे हमेशा मास्टर साहब कर कर सम्बोधित करता रहा है। जान-बूझ कर। नीचा दिखाने या चिढ़ाने के उद्देश्य से नहीं, बस अपनापन में। आज क्या हो गया...? अपनापन का आत्मविश्वास किस चमक के आगे धुँधला पड़ गया?
कमीज़...! फूलदार...! छीटदार...! सीपिओं के बटन और डेढ़ हाथ के कॉलर वाली एक ब्रान्डेड कमीज...! अपनापन से दुकान की साख खराब होती है और ब्रान्डिंग की चकाचौंध से अपनापन का बर्हिमुखीपन कमजोर होता है। दुकान बचानी है तो प्रोडक्ट को ब्रान्ड में लपेट कर रखो। यह वही उमेेश गोप है... वो वही रीडर शम्भूनाथ है, वही पान भन्डार, वही सिगरेट की तलब और वही पुराना सम्वाद-
‘दो सिगरेट देना...।’
लेकिन आज शम्भूनाथ नाम का प्रोडक्ट, 'री-इन्कारनेट हो गया', जैसे किसी ने नेपथ्य से कहा हो- ‘पुनर्जिवितो भवः!’ सब कुछ वहीं रह गया। बस एक मास्टर साब टाईप का अदना सा, बेचारा सा रीडर, एक ब्रान्डेड कमीज़ के कारण प्रोफ़ेसर साहब बन गया। दोनों लपकचुन्नू पशोपेश में बस जुगाली करते रह गये। ब्रान्डेड कमीज़ ने अपनी वैल्यू ऐडेड सर्विस का नज़ारा भी दिखा दिया...। जय हो ब्रान्डिंग! जय हो वैल्यू ऐडेड सर्विस...!
‘‘निर्मल अगस्त्य’’
12 मार्च 2014
पटना
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