Friday, February 20, 2015

‘‘चना मामा से बादाम मामा!’’

                       ‘‘चना मामा से बादाम मामा!’’


क थे चना मामा और एक थे बादाम मामा। गुणी दोनों थे लेकिन पूछ बादाम मामा की ज्यादा होती थी। चना मामा लाख कोशिश करते की वे भी चर्चित हों, लोग उनका भी पोस्ट लाईक करें, शेयर करें लेकिन उनकी यह तमन्ना उस अमरूद के पेड़ की तरह साबित हो रही थी जो अपनी शाखों पर स्ट्राबेरी उगने का ख्वाब देखने लगा हो। खैर, चना मामा जब कुछ पकाते तो धोने, छीलने से लेकर गैस का नॉब ऑफ करने तक व्यन्जन के साथ लगे रहते, रमे रहते, जीते रहते और जब व्यन्जन बन के तैयार हो जाता तब बादाम मामा एकदम से कैमियो की तरह सीन में आते। बने हुये व्यन्जन को एक मुताबिक बाऊॅल में डालते और फिर उस पर गार्निशिंग करते। कभी कसे हुये पनीर से, कभी कसे हुये मोजरेला चीज से, कभी धनिया पत्ते से, कभी अनार के दानों से तो कभी ओरिगानो से। अब डायनिंग टेबल पर तीन मिनट चर्चा होती चना मामा के पाक शास्त्र पर और तीस मिनट चर्चा होती बादाम मामा का गार्निशिंग शास्त्र पर। मामला धोने-छीलने, भूँजने से शुरू तो होता लेकिन खटाक से लेन चेन्ज कर प्रेजेन्टेशन के हाईवे पर दौड़ने लगता।

चना मामा एक दिन बड़े लाचार से, एकदम भीगे हुये सर्टिफिकेट की तरह एक पहुँचे हुए गुरू के पास पहुँचे। एकदम पहुँचे हुये! शिव के डमरू का मनका पॉकेट में लेकर घुमने वाले गुरू के टाईप। बताई अपनी समस्या। गुरू बोले - ‘‘बेटा एक कहानी सुन। कई वर्ष पहले यूनान में एक थियेटर हुआ करता था। एकदम झक्कास! लोग दूर-दूर से उस थियेटर में नाटक देखने जाया करते थे। उस थियेटर के मालिक के दो बेटे थे। बड़ा वाला बेटा उस थियेटर का संगीत निर्देशक था और पूरे संगीत मन्डली का नियन्त्रण उसके हाथ में था। कम्पोजर भी था, अरेन्जर भी और कन्डक्टर भी।
छोटा वाला बेटा एकदम शार्टकट एप्रोच वाला था। वह कहता था कि पीछे कैसेट चला दो भाई, काहे इतना मेहनत करते हो। पब्लिक को दिखाना ही है न। नाटक खत्म होने के बाद पब्लिक के सामने जाकर गरदने न झुकाना है। ऊ त तुमलोग कैसेट चला लेने के बाद भी झुका सकते हो।

बड़ा भाई एकदम से उसी सेलेरॉन प्रोसेसर वाले पी.सी. की तरह हैंग कर गया जिस पर हाई रिजाल्युशन थ्री डी ग्राफिक्स वाला ‘मैक्स पेन’ की तरह का कोई गेम चला दिया गया हो। एक महीने तक वह इसी हालत में सोचता रहा कि क्या होगा छोटे का। कैसे जियेगा यह। पुरूष पहचाना जाता है लूर से और स्त्री पहचानी जाती है लक्षण से, और यही लूर सीख रहा है अभी से। कैसेट चला दो। संगीत को मटियामेट करने पर तो तुल गया सो अलग, कामचोर बन जायेगा सो अलग। एकदम रियलटी शो वाले सिंगर की तरह बात करता है जो पीछे बजते ट्रैक  पर लिप-सिंग करते हैं और अन्त में कोडा पर गच्चाक से गर्दन झुका देते हैं।

एक महीने और सघन चिन्तन के बाद वह इस चिन्ता को लेकर अपने पिताजी के पास पहुँचा। इसकी हालत तो सेलेरोन प्रोसेसर वाले पी.सी. की तरह हुई थी, तब उसके पिताजी की हालत क्या हुई होगी जो अबेकस के जमाने के थे। आनन-फानन में निर्णय लिया गया कि अगले शो में वह भी कोई साज लेकर संगीतज्ञों की मन्डली में बैठेगा और साथ-साथ उसकी ट्रेनिंग भी चलेगी। अब ट्रेनिंग के समय उसका ध्यान मुख्य संगीत से ज्यादा स्पेशल इफ्फेक्ट वाले संगीत में रहता। सो, सी मेजर, ए माइनर और साधारण कॉर्ड प्रोग्रेशन वाले पन्ने में उसने लिख दिया - ‘‘चना।’’
और स्पेशल इफ्फेक्ट का माहौल बनाने वाले डिमिनिश, ऑगमेन्टेड, सेवन्थ, नाईन्थ, एलेवन्थ और थर्टीन्थ वाले पन्ने में उसने लिखा - ‘‘बादाम’’।
नाटक के दौरान प्रेक्टिकल ट्रेनिंग के समय उसने देखा की माहोल में गर्मी, सस्पेन्स, थ्रिल, हॉरर, एक्शन लाने के लिये यही डिमिनिश, ऑगमेन्टेड, सेवेन्थ, नाईन्थ, एलेवन्थ और थर्टीन्थ काम आते है। सो उसने जिद ठान ली की वो ‘स्टील द शो’ वाला कलाकार बनेगा और वो वही पर बजायेगा जहाँ-जहाँ ये कार्डस लगे हैं। बाप-भाई ने सोचा, चलो यही सही।
एक-आध साल के बाद छोटे का दिमाग एकदम सातवें आसमान में चला गया और उसे लगने लगा कि उसके बिना तो नाटक का संगीत एकदम घोला हुआ सत्तू है। गार्निशिंग तो उसके म्युजिक से आती है। और जनता का कमाल देखिये की वह जल्दी ही प्रसिद्ध होता गया और वैसा-वैसा दस थियेटर का मालिक बन गया जबकि बड़का भाई आज तक अपने पिताजी के थियेटर में सी मेजर, ए माइनर में ओझराया हुआ है।’’

इतना बोल के गुरूजी चुप हो गये। चना मामा एकदम उत्साहित हो के बोले - प्रभु, मुझे समझ में आ गया कि कैसे होगा मेरा ऊद्धार। ‘दीघ्रसुत्री विनश्यतमः।’ लम्बा-लम्बा काम नहीं करने का प्रभू। आत्मसन्तुष्टि के फेर में नहीं रहने का। जब कोई तेहरी बना लेवे तब उसमें दू चम्मच घी चुआ देने का।
जब कोई पूरा घर सजा देवे तब बस्स, फुस्स फुस्स एअर फ्रेशनर मार देने का। जब बीबी तीन घन्टे में तैयार हो के बाहर निकले त बस तीन सेकेन्ड में आँचल उलटा के पहना देने का। मान गये प्रभु, क्या कहानी था। समझ गये बदम्मा के सक्सेस का राज। हम फेसबुक पर दू-दू पन्ना लिख देते हैं चार गो लाईक मिलता है और उसी पर कोई लहरिया, चुट्टी काटने वाला कमेन्ट कर देता है त उसको चौदह गो लाईक मिलता है।
गज्जब प्रभू गज्जब! गज्जब है ये दुनिया प्रभू। पूरा मकान बनाने वाला राजमिस्त्री और मजूरा हेरा जाता है और मकान का नेमप्लेट डिजाइन करने वाला हीरो बन जाता है। और त और प्रभु, अब तो ‘कन्ट्रोल सी’ एण्ड ‘कन्ट्रोल वी’ वाली दुनिया में ‘कन्ट्रोल एन’ का फेर बड़ा थकाऊ होते जा रहा है। अब हम भी गानिर्शिंग के फेर में रहेंगे, पकाने के नहीं। कल से, कल से क्या आजे से चार लाईन के बिच्छुबूटी वाले कमेन्ट के फेर में रहेंगे, चौदह सौ लाईन के लेख के फेर में नहीं। ‘हॉरमोनी इन प्रैक्टिस’ नाम का महाग्रन्थ गया तेल लेने, हमको डिमिनिश चाहिये, ऑगमेन्टेड चाहिये, सेवन्थ, इलेवन्थ, थर्टीन्थ चाहिये। हमको भी बादाम मामा बनना है प्रभु। आर्शीवाद दीजीये।


‘‘निर्मल अगस्त्य’’
20 फरवरी 2014
पटना

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