Sunday, February 15, 2015

‘‘बकरी चढ़ी पहाड़ पर!’’

                                      ‘‘बकरी चढ़ी पहाड़ पर!’’

तीन हजार साल पहले की बात है। सेन्टोनियोटिना नाम का एक राज्य था जो चारों ओर से पहाड़ों से घिरा हुआ था। कुल मिलाकर इसका आकार एक कटोरे की तरह का था। उस राज्य के मुखिया का नाम था सेन्टोनियोकोटस। चुंकि राज्य पूरी तरह पहाड़ों से घिरा था इसलिये सुरक्षित भी था। लोग सुखी थे और मांस, दूध इत्यादि उनका प्रमुख भोजन था। पालतू पशु के नाम पर कुछ दूध देने वाले जानवर थे और उनकी सुरक्षा के लिये भेड़ियेे थे। इन जानवरों को इनकी उपयोगिता खत्म होने के बाद भोजन के रूप में इस्तेमाल किया जाता था लेकिन जब तक वे उपयोगी रहते तब तक उन्हें बच्चों जैसा प्यार-दुलार और सुरक्षा दी जाती थी।

एक दिन राज्य सेन्टो के मुखिया सैन्टो को एक विचार आया कि क्युँ न पहाड़ के उस पार जाकर दूसरी दुनिया का अवलोकन किया जाय। अब चिन्ता हुई की पहाड़ पर चढे़गा कौन। जिस राज्य में जानवरों को बच्चे जैसा समझा जाता हो उस राज्य में इन्सान की अहमियत आप खुद सोच सकते हैं। फिर निर्णय लिया गया कि पहाड़ पर भेड़ियों को भेजा जाये और ये निर्णय सर्वसम्मति से मान लिया गया। अगले दिन भेड़ियों को नहला-धुला कर, फूल-माला पहना कर पहाड़ों की ओर रवाना किर दिया गया। शाम ढ़लने तक बड़ी उत्सुक्ता बनी रही, ठीक वैसे ही जैसे सन उन्नीस सौ उन्हत्तर में स्काईलैब के गिरने के दिन लोगों में उत्सुक्ता बनी हुई थी। शाम में भेड़िये वापस लौट आये। मुखिया सैन्टो ने सारे भेड़ियों को जमा किया और लगा सवाल पूछने। लेकिन पाँच-छः सवालों के बाद ही उसे ध्यान आया कि भेड़िये तो इन्सानों की बोली जानते ही नहीं तो ये बतायेंगे क्या खाक। भेड़िये बेचारे हाव-भाव, पूँछ-कान, आँख-मुँह नचा-नचा कर कुछ बताना भी चाहते तो लगता था कि मूक-बधिरों के लिये समाचार चल रहा है। मुखिया को लगा कि ये तो गड़बड़ी हो गयी। पहले भेड़ियों को बोलना सिखाना पडे़गा।

अगले दिन फिर उन भेड़ियों को नहला-धुला कर फूल-माता पहना कर स्पीच ट्रेनिंग देनी शुरू कर दी गई। एक सप्ताह की एक्सटेन्सिव ट्रेनिंग के बाद भेड़िये बोली-चाली में पारंगत हो गये। सातवें दिन टेस्ट भी लिया गया।रिजल्ट्स पाॅजिटिव थे। ‘ए प्लस प्लस’! अगले दिन भेड़ियों को फिर से फूल-माला पहना कर चारों दिशाओं में पहाड़ों की तरफ रवाना कर दिया गया। सैन्टो बढ़ा खुश था। अब मिलेगी दुनिया की खबर। लान्च हो जायेगा ‘वोल्फबुक’। सेन्टो के निवासी लेंगे मजा बाहर की खबरों का और दुसरे चरण के लान्च में भेड़ियों को इस राज्य का समाचार देने बाहर भी भेजा जायेगा। कुल मिला कर पूरा दिन ‘द एक्सपैन्डेबल्स थ्री’ के ट्रेलर की तरह बीत गया। शाम होते होते ही लोग मुख्य मैदान में जमा होने लगे। लेकिन कम्बख्त भेड़िये पायरेट हो गये। बिल्कुल ‘द एक्सपैन्डेबल्स थ्री‘ की रीलिज के पहले की पायरेसी की तरह। एक मैना उड़ती हुई आई और मुखिया सैन्टो के माथे पर चिट्ठी लहरा कर चली गई जिसमें लिखा था- ‘‘बास सैन्टो! नोचना तो हम पहले से जानते ही थे, और बोलना तुमने सिखा ही दिया। समझ तो हमारी माता रानी की दया से ठीक-ठाक है ही। सो हमारे लौटने की उम्मीद लगाना तो बेमानी है। लिख रहा हूँ लार से स्याही मत समझना। न तो किसी और को पढ़ाना, न खुद पढ़ना। क्या है कि बेसी पढ़ लिख लेने से दिमगवा हमेशा रोमिंग में रहने लगता है। अच्छा, अब बन्द करते है। (नोट- कभी इधर आना तो मत समझना कि हम पहचान लेंगे। हमने अपने प्राईरिटी लिस्ट में एटीट्यूड को ग्रेटीट्यूड के ऊपर रखा है।)’’

सैन्टो, एकदम सिक्स्टीज के नायिकाओं की तरह लहरा के गिर पड़ा। कालान्तर में ये भेड़िये इवाॅल्यूशन के तीन हजार साल की सीढ़ियाँ चढ़ कर अलग-अलग व्यवसायों में फैल गये। ज्यादातर भेड़िये मैनेजर बन गये। कुछ पी.आई.एल करने वाले वकील बन गये। कुछ जनता के प्रतिनिधी बन गये और कुछ...। बाकी, आप खुद दिमाग लगाईये। किताब लिखने नहीं बैठे हैं। लेख लिख रहे हैं, लेख। दिमाग पर थोड़ा सा जोर डालिये, आपको भी अपने आस-पास दो पैर पर खड़ा कोई न कोई भेड़िया दिख ही जायेगा।

कुछ दिन बाद सैन्टो की इच्छा फिर से जोर मारने लगी और अगले दिन फिर इस मसले पर चर्चा हुई कि किसको भेजा जाये। गाय, भैंस और अन्य जानवर जो दूध ज्यादा देते थे, उनको भेजने के लिये कोई राजी नहीं हुआ। तब अन्त में बची बकरियाँ। बकरियों में से भी सारी बाँझ बकरियों को चुन कर, ट्रेनिंग-ट्राॅनिंग दे कर, फूल-माला पहना कर, दूसरी दुनिया की खबर लाने के लिये पहाड़ों पर भेज दिया गया। एक तसल्ली थी कि बकरियाँ मर-मुरा गई तो भी ज्यादा नुकसान नहीं होगा। उनके लौटने का समय हो जाने पर भी किसी में कोई खास उत्साह नहीं था। भेड़ियों की दगाबाजी से आहत वे अपने-अपने घरों में अपने-अपने हिसाब से खा-खेल रहे थे। लेकिन सूरज डूबने के साथ ही बकरियाँ अपने-अपने मालिकों के घरों के बाहर आकर मिमियाने लगीं। सब धपा-धप बाहर निकले। मेरे करण-अर्जुन आयेंगे टाईप्स आँसू सबकी आँखों से गिरने लगे। अब बकरियों को ससम्मान सलामी-वलामी देकर टोकरियों से ढँक दिया गया। सुबह उनके लिये लाल घास बिछाई गई जो घर-घर से शुरू होकर मुख्य मैदान में खत्म होती थी। लोगों का मजमा लगने लगा। बकरियाँ गार्ड आॅफ आॅनर लेते हुये मैदान में जमा होने लगीं। फिर सैन्टो मिट्टी का ताजी बनी श्यामपट्टियाँ (ब्लैकबोर्ड) लेकर मैदान में पहुँचा ताकि उनकी बातों को श्यामपट्टियों पर आकृत कर उन्हें सूखने दे दिया जाये। सवालों का दौर शुरू हुआ। क्या रहा? कैसा रहा? उधर क्या था? कैसी है उधर की दुनिया? उधर के जानवर और इन्सान किस तरह के हैं? आदि-इत्यादि।

लेकिन सवाल जो भी हो, बकरियों का जवाब केवल घास, पहाड़ी रास्ते, पत्तियाँ, पौधे, खाना, भरपेट, टेस्ट चेंज, पिकनिक से ही जुड़ा हुआ था। सैन्टो और सेन्टोनियोटिना के निवासी पूरा रिसाइटल सुनना चाहते थे लेकिन बकरियाँ आलाप से आगे बढ़ ही नहीं रही थीं। तो मिशन हो गया फेल और सैन्टो को समझ में आया कि बकरियाँ खाने के फेर में रह गईं और जिस काम के लिये उन्हें भेजा गया था वो उनके पल्ले पड़ा ही नहीं।
तभी से के कहावत बनी -
‘‘कि बकरी चड़ी पहाड़ पर
 और उतर गई।’’

सो मूल तौर पर बात ये है कि बकरी चढ़ी पहाड़ पर! ओक्के...! चढ़ गई़...! अब आगे? तो क्या आगे? बकरी क्या कर लेगी पहाड़ पर चढ़ कर? आसमान को सींग में लपेट लेगी कि पहाड़ को जमीन में धंसा देगी। अगर कोई बाज, गरूड़ टाईप पक्षी उठा के ले गया तो ठीक, नहीं तो अन्त में खा-पी के टाईट हो के झरबेरियाँ की मार्किंग करते हुये उतर जायेंगी। बकरियों की यही नियति है। पहाड़ पर चढ़ना और अन्त में उतर जाना।

तो ऐसी बाँझ बकरियाँ सभी पहाड़ों पर चढ़ी हैं जिनसे उम्मीद की जाती है कि वो कुछ नया बतायेंगी, नया कर पायेंगी या नई दुनिया का द्वार खोलेंगी। फेसबुक, ट्वीटर और ऐसे सोशल साईट्स पर ऐसी बाँझ बकरियों की भरमार है। लाॅगिन किया, थोड़ा चरे, थोड़ा गीला किया, थोड़ा सुखा किया, मतलब थोड़ा गिला किया, थोड़ा शिकवा किया और सोने के पहले उतर गये मने लाॅग आऊट हो गये। मैं भी उन्हीं बकरियों में से हूँ और मेरे सारे अभिन्न मित्र भी। उनको भी अपने साथ घसीट लिया। जानता हूँ बुरा नहीं मानेंगे। अगर बुरा मानते तो मैं उन्हें भिन्न मित्र कहता। घास, हरियाली, पत्ते, पिकनिक, टेस्ट चेन्ज से ऊपर जाने का टाईम किसी के पास नहीं है। दिनभर में दस चिन्तायें होती हैं। गाड़ी का माईलेज घट रहा है सो अलग टेन्शन है। मोबाईल में नेट अपने आप आॅन हो के बैलेन्स चूस जा रहा है सो अलग। गूगल पर तरह-तरह के नुस्खे ढूँढने में आधा वक्त निकल जा रहा है सो अलग। गैस भगाने के नेचुरल नुस्खे। माइलेज बढ़ाने के कारिस्तानी नुस्खे। फ्री में रिचार्ज कराने के ताईवानी नुस्खे, सेक्स पावर बढ़ाने के जापानी नुस्खे और सारे देश को गरियाने के पाकिस्तानी नुस्खे। कोई कमल को गरिया रहा है, कोई पंजा को तो कोई झाड़ू को। खुद कुछ करने का न तो टाईम है न कारण। ईश्वर का दिया इतना है कि उसी को रोटेट करते रहें, घुमाते रहें, चर्न करते रहें तो दोनों हाथ से हसोतने लायक मलाई तो मातारानी के कृपा से कहीं गया नहीं हैं। स्टैन्ड बाई मोड से हाईबरनेट मोड तक जिन्दगी कम्बल के भीतर भी चलास्टिक से कुछ ऊपर ही है और चेहरे पर प्लास्टिक ओढ़ने की कला भी काम दे ही रही है। कुछ लोग मोदी जी के फैन हुये हैं और कुछ लोग केजरी जी के और बात तो इतनी अथाॅरिटी से लिख रहे हैं जैसे कि प्रधानमन्त्री सभी निर्णय लेने के पहले इन्हीं को फोन घुमाते हैं और पी.एम. आॅफिस का सारा फाईल सिग्नेचर के पहले इनके ही घर पहुँचता है। पेट्रोल-डीजल का दाम किसी रात दो-चार रूपये घट गया तो अगले दिन ये भाजपा समर्थक फेसबुक और सोशल साईट्स की वाल को झरबेरियों से भर देते हैं जबकि हो सकता है उसी दिन पचहत्तर और चीजों की कीमतें भी घटी बढ़ी होंगी जो इनको कभी पता नहीं  चलना है। यही हाल झाड़ू समर्थकों का है जैसे अरविन्द केजरीवाल इनके ऊपर वाले कमरे में रहने वाला बेरोजगार फूफ्फा जी हैं जिनका खाना खर्ची यही लोग दे रहे हैं। आज के भारतियों की सारी चिन्ता, लाईफ, वाईफ, बाईक, और फेसबुक जैसे मसलों से ऊपर निकल ही नहीं पा रही लेकिन जब कभी भी फुरसत मिले तब पहाड़ पर चढ़ना है तो चढ़ना है और फिर उतर जाना है।
‘‘सो बकरी चढ़ी पहाड़ पर
और फिर उतर गई।’’

निर्मल अगस्त्य 
15 फरवरी 2015 
पटना 


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