‘‘भगवान फुर्सत में और पन्डित व्यस्त!’’
कान्हा को प्यार हुआ... उन्नीसवीं बार। कान्हा के पास कोई ब्रान्डिंग नहीं है इसलिये उसका प्यार कभी नोटिस नहीं हो पाता। जब ग्यारह साल की उम्र में उसे अपनी तीस साल की मामी से प्यार हुआ तो भी यह, वात्सल्य के बहाने नोटिस नहीं हुआ था। आज जब उसे अपने से आधी उमर की लड़की से प्यार हुआ है तो भी, स्नेह के बहाने यह प्यार नोटिस नहीं हो पा रहा।
वास्तव में कसूर कान्हा का भी है। उसे प्यार होता है तो, बस हो जाता है। और ऐसा भी नहीं कि वह सीमाओं से डरता है वह कहता है-
‘‘प्यास का मारा जल-जल बोले, आग का मारा जला-जला,
चुप रह कर कु-अर्थ से बचिये, गूंगे का गुड़ भला-भला!’’
उस दिन कान्हा को उसका एक मित्र मिल गया।
मित्र बोला- ‘‘चलता है?’’
कान्हा ने कहा- ‘‘चल!’’
मित्र बोला- ‘‘पूछेगा नहीं, कहाँ?’’
कान्हा ने कहा- ‘‘लो पूछ लिया, कहाँ?’’
मित्र बोला- ‘‘कालीबाड़ी।’’
कान्हा बोला- ‘‘बड़ी मस्त जगह है।’’
मित्र ने डाँटते हुये कहा- ‘‘कान्हा...!’’
कान्हा बोला- ‘‘अरे यार, वहाँ के संदेश खुब भालो...।’’
मित्र बोला- ‘‘पैसे-वैसे नहीं है मेरे पास।’’
कान्हा बोला- ‘‘कोई बात नहीं यार, वहीं पर किसी से उधार ले लेंगे।’’
मित्र बोला- ‘‘कमाल कमबख़्ती है तेरी। प्रसाद भी उधार की चढ़ायेगा।’’
कान्हा बोला- ‘‘कमीनगी तो तू कर रहा है। मैं संदेश की बात कर रहा हूँ और तू प्रसाद की बात कर रहा है। मैं सजी-धजी बंगालिन औरतों की बात कर रहा हूँ तू काली की पूजा की बात कर रहा है।’’
मित्र गुस्सा हो कर अकेले ही चल दिया। उसे चिढ़ाता मनाता, कान्हा उसके पीछे-पीछे। इसलिये दोनों की दोस्ती वर्षो से संरक्षित है। एक ने माया में ही राम ढूँढ़ लिया इसलिये चिढ़ाता रहता है, दूसरा राम में माया ढूँढ़ रहा है इसलिये चिढ़ता रहता है।
राम और माया का यह खेल पुराना है भाई। कोई एक खम्भा थाम लो तो अच्छा है। बाद में ये न कहना कि-
‘‘माया मिली न राम...’’
मित्र बंगाली है और उसे कालीबाड़ी के पन्डित का अॅप्यान्टमेन्ट लेना है। घर में काली पूजा करवानी है। कान्हा थोड़ी देर के लिये बंगाली बन कर संदेश और सुन्दरता का आनन्द लेना चाहता है। बहरहाल दोनों की मंजिल एक ही है- कालीबाड़ी!
मन्दिर तक पहुँचते-पहुँचते मित्र ठन्डा हो गया और दोनों साथ-साथ मन्दिर प्रांगण में घुसे। कान्हा लापरवाही से इधर-उधर देखता मन्दिर की सीढि़याँ चढ़ने लगा। न कोई प्रणाम-पाती न चेहरे पर कोई विनम्रता। आधी सीढि़याँ चढ़ने के बाद उसने पीछे मुड़ कर देखा।
मित्र तो उल्टा चला जा रहा था।
कान्हा चिल्लाया-‘‘मित्र उधर कहाँ...?’’
मित्र धीमी आवाज में बोला- ‘‘तुम उधर कहाँ...?’’
कान्हा बोला- ‘‘अमां, काली पूजा करवानी है न?’’
मित्रा बोला- ‘‘अबे नीचे आ गदूद। आफिस इधर है। पहले पन्डित चाहिये होता है न!’’
कान्हा ठठा कर हँसने लगा। दो युवतियाँ जो पूजा सामाग्री ले कर उपर चढ़ रहीं थी हड़बड़ा गयीं और रेलिंग से सट कर चढ़ने लगीं। कान्हा हँसता रहा और सीढ़ियाँ उतरता रहा। फिर मित्र के पास पहुँच कर बोला-
‘‘कमाल है यार, ये पंडितों के लिये ऑफिस कब से होने लगा?’’
मित्र चिढ़ कर बोला- ‘‘तेरी इसी चौधरीगिरी से चिढ़ है मुझे। अरे पन्डित तो मंदिर के भीतर ही होगा लेकिन उसकी बुकिंग ट्रस्ट ऑफिस के थ्रू ही होगी।’’
कान्हा बोला- ‘‘छुप-छुपा के भी नहीं।’’
मित्र बोला- ‘‘नहीं, और अब अन्दर अपना भाड़ जैसा मुँह मत खोल देना... जोतो माथा, तोतो व्यथा!’’
दोनों कार्यालय के अन्दर घुसे तो तीन लोग अन्दर बैठे थे। दो सिगरेट पी रहे थे और तीसरा सुलगाने की तैयारी में था। मित्र ने परचा निकाला और बोला कि उसने पुजारी की बुकिंग के लिये नम्बर लगाया था। जो सिगरेट सुलगाने की तैयारी में था, बड़े स्टाईल से उँगलियों में सिगरेट घुमाता हुआ बोला- ‘‘तो...?’’
उसका ‘तो...’’ तो उस थाना इन्चार्ज से भी ज्यादा रोबदार था जिससे किसी ने कहा हो कि हुजूर हमने कल एक एफ.आई.आर. करवाया है और उसने कहा हो- ‘तो...?’’
तो एहसान किया क्या। ये ‘एहसान किया क्या’ अलग से बोलने की जरूरत नहीं है। कड़क कर ‘तो’ बोलो तो ये अपने आप जुड़ जाता है। न्युमोनिया और साइकोलॉजी के ‘पी’ की तरह। मित्र किचिंत लजाता-शर्माता, कर्ज लिये हुये अभागे की तरह मुस्कुराता बोला- ‘‘जी, बुकिंग शनिवार की मिली है और शनिवार को पिताजी मना कर रहे हैं।’’
टेबल के उस पार बैठा दुसरा सिगरेटिया बोला- ‘‘क्यूँ, शोनिवार में क्या तोकलीफ है?’’
मित्र बोला- ‘‘शनिवार को पिताजी भी फ्री नहीं है और मेरा भी बैंक का कुछ काम है।’’
तीसरा सिगरेटिया तपाक से बोला- ‘‘ताले कोब चाहते हो।’’
मित्र बोला- ‘‘रविवार को।’’
पहले सिगरेटिये ने ऐसा मुँह बनाया मानो एक भिखारी ने उसकी बेटी से विवाह का प्रस्ताव रख दिया हो।
वह तमतमा कर बोला- ‘‘शोनिवार को पोंडित फ्री नेई आछे भाई।’’
कान्हा के सब्र का बांध टूटने ही वाला था कि मित्र बोला-
‘‘कोई और पन्डित हो...?’’
तीसरा सिगरेटिये ने एक रजिस्टर उठाया और पहले सिगरेटिये को देते हुये कहा-
‘‘एक टू ठीक से चेक कोरे देख तो। देखो कोई फ्री है क्या?’’
पहले सिगरेटिये ने रजिस्टर हाथ में लिया और हाथ में उठाये-उठाये कहने लगा- ‘‘सुबह में बोनर्जी आरो घोष... दुपोर, प्रोदीप सोरकार.. दू पुजो। विकाले प्रोखोर मोंडल के यहाँ छोट्ठी और रात में मुखोर्जी कोरपोरेटर का आरती। ना रे... मुझे सब मुजबानी याद है... रोविवार तो एक भी पोन्डित फ्री नोही है।’’
तीसरा सिगरेटिया अकड़ कर बोला- ‘‘होबे ना भाई, शोनिवार को कोरना है तो कोरा लो नहीं तो कुरी दिन रूक जाओ।’’
मित्र बोला- ‘‘बीस दिन...?’’
दूसरा सिगरेटिया बोला- ‘‘यहाँ का नियम है कि एक ही आदमी बीस दिन के भीतोर दो नोम्बर नहीं लगाने सोकता।’’
कान्हा बोला- ‘‘अमां मित्र...। शनिवार को तुम फ्री नहीं हो... रविवार को पन्डित फ्री नहीं है... जरा मन्दिर के भीतर चल के काली से तो पूछ ले कि वो फ्री है की नहीं...।’’
ऐसी मस्तानी आवाज में उसने अलापा कि तीनों सिगरेटिये भौंचक्क होकर उसे देखने लगे।
मित्र को तो मानो ‘माइस्थेनिया ग्रेविस’ का अटैक होने को आया।
तभी नरमुन्डों की माला पहने काली अन्दर घुसी और बोली- ‘‘आमी तो फ्री गो...! किन्तु आमाके जिगस कोरा उचित। कान्हा शोत्ती बोलछे...। आमि सोब दिन फ्री...!’’
तो ये आलम है। फूल वाला व्यस्त है। प्रसाद वाला व्यस्त है। रोली, टीका, चन्दन, केसर वाला व्यस्त है। भक्त व्यस्त हैं, पन्डित व्यस्त है। लोग अपना शिड्डयुल देख रहे हैं। भगवान के दरबार में जाने से पहले कोई बच्चों की परीक्षा खत्म होने का इन्तजार कर रहा है तो कोई एल.टी.सी. के ग्रान्ट होने का। कोई रोपनी खत्म होने का इन्तजार कर रहा है तो कोइ फसल कटने इन्तजार कर रहा है। दुःख क्या है? जब सब कुछ इन्सान की क्षमता से बाहर हो जाये। उस वक्त वो इन्सान भगवान के दरबार में जाने की सोचता है या तब, जब वो फुर्सत में हो। हम एक अदद परिवार और एक अदद नौकरी के बीच बड़ी मुश्किल से समय निकाल पा रहे हैं और ये उम्मीद कर रहे हैं कि जो समूचा सन्सार चला रहा है वो ‘एट योर डिस्पोजल’ टाईप से हमारे लिए फुर्सत ही फुर्सत में है।
‘‘निर्मल अगस्त्य’’
22 मार्च 2014
पटना
कान्हा को प्यार हुआ... उन्नीसवीं बार। कान्हा के पास कोई ब्रान्डिंग नहीं है इसलिये उसका प्यार कभी नोटिस नहीं हो पाता। जब ग्यारह साल की उम्र में उसे अपनी तीस साल की मामी से प्यार हुआ तो भी यह, वात्सल्य के बहाने नोटिस नहीं हुआ था। आज जब उसे अपने से आधी उमर की लड़की से प्यार हुआ है तो भी, स्नेह के बहाने यह प्यार नोटिस नहीं हो पा रहा।
वास्तव में कसूर कान्हा का भी है। उसे प्यार होता है तो, बस हो जाता है। और ऐसा भी नहीं कि वह सीमाओं से डरता है वह कहता है-
‘‘प्यास का मारा जल-जल बोले, आग का मारा जला-जला,
चुप रह कर कु-अर्थ से बचिये, गूंगे का गुड़ भला-भला!’’
उस दिन कान्हा को उसका एक मित्र मिल गया।
मित्र बोला- ‘‘चलता है?’’
कान्हा ने कहा- ‘‘चल!’’
मित्र बोला- ‘‘पूछेगा नहीं, कहाँ?’’
कान्हा ने कहा- ‘‘लो पूछ लिया, कहाँ?’’
मित्र बोला- ‘‘कालीबाड़ी।’’
कान्हा बोला- ‘‘बड़ी मस्त जगह है।’’
मित्र ने डाँटते हुये कहा- ‘‘कान्हा...!’’
कान्हा बोला- ‘‘अरे यार, वहाँ के संदेश खुब भालो...।’’
मित्र बोला- ‘‘पैसे-वैसे नहीं है मेरे पास।’’
कान्हा बोला- ‘‘कोई बात नहीं यार, वहीं पर किसी से उधार ले लेंगे।’’
मित्र बोला- ‘‘कमाल कमबख़्ती है तेरी। प्रसाद भी उधार की चढ़ायेगा।’’
कान्हा बोला- ‘‘कमीनगी तो तू कर रहा है। मैं संदेश की बात कर रहा हूँ और तू प्रसाद की बात कर रहा है। मैं सजी-धजी बंगालिन औरतों की बात कर रहा हूँ तू काली की पूजा की बात कर रहा है।’’
मित्र गुस्सा हो कर अकेले ही चल दिया। उसे चिढ़ाता मनाता, कान्हा उसके पीछे-पीछे। इसलिये दोनों की दोस्ती वर्षो से संरक्षित है। एक ने माया में ही राम ढूँढ़ लिया इसलिये चिढ़ाता रहता है, दूसरा राम में माया ढूँढ़ रहा है इसलिये चिढ़ता रहता है।
राम और माया का यह खेल पुराना है भाई। कोई एक खम्भा थाम लो तो अच्छा है। बाद में ये न कहना कि-
‘‘माया मिली न राम...’’
मित्र बंगाली है और उसे कालीबाड़ी के पन्डित का अॅप्यान्टमेन्ट लेना है। घर में काली पूजा करवानी है। कान्हा थोड़ी देर के लिये बंगाली बन कर संदेश और सुन्दरता का आनन्द लेना चाहता है। बहरहाल दोनों की मंजिल एक ही है- कालीबाड़ी!
मन्दिर तक पहुँचते-पहुँचते मित्र ठन्डा हो गया और दोनों साथ-साथ मन्दिर प्रांगण में घुसे। कान्हा लापरवाही से इधर-उधर देखता मन्दिर की सीढि़याँ चढ़ने लगा। न कोई प्रणाम-पाती न चेहरे पर कोई विनम्रता। आधी सीढि़याँ चढ़ने के बाद उसने पीछे मुड़ कर देखा।
मित्र तो उल्टा चला जा रहा था।
कान्हा चिल्लाया-‘‘मित्र उधर कहाँ...?’’
मित्र धीमी आवाज में बोला- ‘‘तुम उधर कहाँ...?’’
कान्हा बोला- ‘‘अमां, काली पूजा करवानी है न?’’
मित्रा बोला- ‘‘अबे नीचे आ गदूद। आफिस इधर है। पहले पन्डित चाहिये होता है न!’’
कान्हा ठठा कर हँसने लगा। दो युवतियाँ जो पूजा सामाग्री ले कर उपर चढ़ रहीं थी हड़बड़ा गयीं और रेलिंग से सट कर चढ़ने लगीं। कान्हा हँसता रहा और सीढ़ियाँ उतरता रहा। फिर मित्र के पास पहुँच कर बोला-
‘‘कमाल है यार, ये पंडितों के लिये ऑफिस कब से होने लगा?’’
मित्र चिढ़ कर बोला- ‘‘तेरी इसी चौधरीगिरी से चिढ़ है मुझे। अरे पन्डित तो मंदिर के भीतर ही होगा लेकिन उसकी बुकिंग ट्रस्ट ऑफिस के थ्रू ही होगी।’’
कान्हा बोला- ‘‘छुप-छुपा के भी नहीं।’’
मित्र बोला- ‘‘नहीं, और अब अन्दर अपना भाड़ जैसा मुँह मत खोल देना... जोतो माथा, तोतो व्यथा!’’
दोनों कार्यालय के अन्दर घुसे तो तीन लोग अन्दर बैठे थे। दो सिगरेट पी रहे थे और तीसरा सुलगाने की तैयारी में था। मित्र ने परचा निकाला और बोला कि उसने पुजारी की बुकिंग के लिये नम्बर लगाया था। जो सिगरेट सुलगाने की तैयारी में था, बड़े स्टाईल से उँगलियों में सिगरेट घुमाता हुआ बोला- ‘‘तो...?’’
उसका ‘तो...’’ तो उस थाना इन्चार्ज से भी ज्यादा रोबदार था जिससे किसी ने कहा हो कि हुजूर हमने कल एक एफ.आई.आर. करवाया है और उसने कहा हो- ‘तो...?’’
तो एहसान किया क्या। ये ‘एहसान किया क्या’ अलग से बोलने की जरूरत नहीं है। कड़क कर ‘तो’ बोलो तो ये अपने आप जुड़ जाता है। न्युमोनिया और साइकोलॉजी के ‘पी’ की तरह। मित्र किचिंत लजाता-शर्माता, कर्ज लिये हुये अभागे की तरह मुस्कुराता बोला- ‘‘जी, बुकिंग शनिवार की मिली है और शनिवार को पिताजी मना कर रहे हैं।’’
टेबल के उस पार बैठा दुसरा सिगरेटिया बोला- ‘‘क्यूँ, शोनिवार में क्या तोकलीफ है?’’
मित्र बोला- ‘‘शनिवार को पिताजी भी फ्री नहीं है और मेरा भी बैंक का कुछ काम है।’’
तीसरा सिगरेटिया तपाक से बोला- ‘‘ताले कोब चाहते हो।’’
मित्र बोला- ‘‘रविवार को।’’
पहले सिगरेटिये ने ऐसा मुँह बनाया मानो एक भिखारी ने उसकी बेटी से विवाह का प्रस्ताव रख दिया हो।
वह तमतमा कर बोला- ‘‘शोनिवार को पोंडित फ्री नेई आछे भाई।’’
कान्हा के सब्र का बांध टूटने ही वाला था कि मित्र बोला-
‘‘कोई और पन्डित हो...?’’
तीसरा सिगरेटिये ने एक रजिस्टर उठाया और पहले सिगरेटिये को देते हुये कहा-
‘‘एक टू ठीक से चेक कोरे देख तो। देखो कोई फ्री है क्या?’’
पहले सिगरेटिये ने रजिस्टर हाथ में लिया और हाथ में उठाये-उठाये कहने लगा- ‘‘सुबह में बोनर्जी आरो घोष... दुपोर, प्रोदीप सोरकार.. दू पुजो। विकाले प्रोखोर मोंडल के यहाँ छोट्ठी और रात में मुखोर्जी कोरपोरेटर का आरती। ना रे... मुझे सब मुजबानी याद है... रोविवार तो एक भी पोन्डित फ्री नोही है।’’
तीसरा सिगरेटिया अकड़ कर बोला- ‘‘होबे ना भाई, शोनिवार को कोरना है तो कोरा लो नहीं तो कुरी दिन रूक जाओ।’’
मित्र बोला- ‘‘बीस दिन...?’’
दूसरा सिगरेटिया बोला- ‘‘यहाँ का नियम है कि एक ही आदमी बीस दिन के भीतोर दो नोम्बर नहीं लगाने सोकता।’’
कान्हा बोला- ‘‘अमां मित्र...। शनिवार को तुम फ्री नहीं हो... रविवार को पन्डित फ्री नहीं है... जरा मन्दिर के भीतर चल के काली से तो पूछ ले कि वो फ्री है की नहीं...।’’
ऐसी मस्तानी आवाज में उसने अलापा कि तीनों सिगरेटिये भौंचक्क होकर उसे देखने लगे।
मित्र को तो मानो ‘माइस्थेनिया ग्रेविस’ का अटैक होने को आया।
तभी नरमुन्डों की माला पहने काली अन्दर घुसी और बोली- ‘‘आमी तो फ्री गो...! किन्तु आमाके जिगस कोरा उचित। कान्हा शोत्ती बोलछे...। आमि सोब दिन फ्री...!’’
तो ये आलम है। फूल वाला व्यस्त है। प्रसाद वाला व्यस्त है। रोली, टीका, चन्दन, केसर वाला व्यस्त है। भक्त व्यस्त हैं, पन्डित व्यस्त है। लोग अपना शिड्डयुल देख रहे हैं। भगवान के दरबार में जाने से पहले कोई बच्चों की परीक्षा खत्म होने का इन्तजार कर रहा है तो कोई एल.टी.सी. के ग्रान्ट होने का। कोई रोपनी खत्म होने का इन्तजार कर रहा है तो कोइ फसल कटने इन्तजार कर रहा है। दुःख क्या है? जब सब कुछ इन्सान की क्षमता से बाहर हो जाये। उस वक्त वो इन्सान भगवान के दरबार में जाने की सोचता है या तब, जब वो फुर्सत में हो। हम एक अदद परिवार और एक अदद नौकरी के बीच बड़ी मुश्किल से समय निकाल पा रहे हैं और ये उम्मीद कर रहे हैं कि जो समूचा सन्सार चला रहा है वो ‘एट योर डिस्पोजल’ टाईप से हमारे लिए फुर्सत ही फुर्सत में है।
‘‘निर्मल अगस्त्य’’
22 मार्च 2014
पटना
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