अपने धर्म में अगर कोई विकृति, भ्रान्ति और आडम्बर हो तो उसे दूर करने का प्रयास सदैव सराहनीय है और अपने धर्म के पाखण्ड और विकृति से पीछा छुड़ाने के लिए नया धर्म बना लेना कुछ वैसा ही है जैसे अपने शराबी और मार-पीट, गाली-गलौज करने वाले बाप को सुधारने का प्रयास करने की बजाये एक दूसरा बाप ढूँढ लेना। बुद्ध ने यही किया, मिला क्या ? समय के साथ उस नए धर्म में भी दुराचार और भ्रष्टाचार फ़ैल गया। laughing buddha से लेकर sleeping, smiling, dancing buddha बाज़ार में बिकने लगे जबकि बुद्धा ख़ुद मूर्ति पूजा के विरोधी थे। हज़रत मोहम्मद ने नया धर्म बनाया। क्या मिला ? लोग समझ नहीं पाये की उनके बनाए क़ायदे एक ख़ास भौगोलिक और सामजिक स्थिति को देख कर बनाए गए थे जबकि मुस्लिम रेगिस्तान में चलने वाल क़ायदा switzerland और अंटार्टिका में भी चलाना चाहते हैं। छोटा pant, लम्बी दाढ़ी, आँखों में सुरमे का औचित्य सारे भू-भाग पर नहीं है। यही चर्चों और पादरीओं के समाज में होने लगा। भाई नया धर्म कोई Vaccine नहीं है। हर धर्म को मानने वाले वही हाड़-मांस के homo-sapiens हैं जिनके कार्यकलापों से धर्म की परिभाषा बदल जाती है। आप एक धर्म बताईये जो बाद में बना और किसी भी तरह की विकृति से मुक्त रहा। ये विकृति तो आनी है क्यूँकि पहले धर्म इंसान को चलाता है बाद में इंसान धर्म को चलाने लगता है।
सभी धर्म जीवनशैली, भौगोलिक स्थिति, सामजिक स्थिति और feasibility of sustenance को ध्यान में रख कर बनाया गया है जो पृथ्वी के हर भाग पर पूरी तरह लागू नहीं हो सकता। हर धर्म में कुछ ऐसी बातें हैं जो कालजयी हैं और पृथ्वी के हर हिस्से में समान रूप से लागू हो सकती हैं। धर्म बदलना या नया धर्म बन लेना कोई समाधान हो ही नहीं सकता। ये निन्यानबे का फेर है भैया जो लाख बुद्ध, लाख महावीर और लाख हज़रत मोहम्मद उपाए कर लेते पूरे 100 नहीं होता। क़ायनात का कोई धर्म नहीं होता। सच का कोई धर्म नहीं होता। मैं बिलकुल भी विधर्मी नहीं हूँ और अपने धर्म को एक अच्छी आदत के तरह अपने जीवन में रखता हूँ और जो ग़लत, अमानवीय या पाखन्ड लगे उस हिस्से को बिना हिचके त्याग भी देता हूँ।
एक धर्म मर गया तो हज़ारों नए धर्म अस्तित्व में आ जायेंगे लेकिन मनुष्यता मर गयी तो न तो कोई धर्म होगा न बात बात पे धर्म बनाने वाले लोग होंगे।
निर्मल अगस्त्य।
12:31 A.M.
05-04-2016
पटना, बिहार।
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