Monday, April 25, 2016

"जियो मेरे लाल, पीले, हरे गुडविल एम्बेसेडर।



क़रीब 18 साल पहले की बात है। मेरा एक मुहल्ला मित्र था - संजीव। कराटे में ब्लैक बेल्ट होने के साथ-साथ उसकी अभिरुचि सांस्कृतिक गतिविधिओं में भी थी। मारे हमसे उसको एतना लगाव था की हर पाँच दिन पर चला आता था हमको किसी न किसी संगीत के मुहल्ला लेवल कॉम्पिटिशन में जज बनाने। हम भी लपक लेते छरदनिया मार के।  एक बार आ के बोला कि बन्धु, डाक तार स्पोर्ट्स क्लब में एक पेन्टिंग कॉम्पिटिशन में चलना है। हम उस वक़्त पेन्टिंग नहीं करते थे और जो करते थे वो हर शनिच्चर को झाड़ू के साथ फेंका जाता था सो पेन्टिंग में मेरा कॉन्फिडेंस उस सोड्डा की तरह था जिसे सर्फ़ एक्सेल के सामने बिठा दिया गया हो। पहली बार उसको ना किये।  क़सम से, भीतर एतना दुःख हो रहा था कि बता नहीं सकते लेकिन उस छनमतहा उमर में भी हमको इतनी समझ थी कि पेन्टिंग कॉम्पिटिशन में जज बन के नहीं जाना उचित है।  तब हमको ध्यान आया की पीछे शिवनारायण चौक पर प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट नीरद जी रहते हैं जिनसे मेरा परिचय काफी पुराना था। A man in need is friend indeed के सिद्धान्त पर अमल करते हुए हम पैरवी लेकर नीरद जी के घर चले गए। तय तमन्ना हो हो गया की कब कितने बजे जाना है, कितना देर ठहरना है, आदी, इत्यादी। हम भी उस दिन गए तब पहले बार आज के एक और प्रख्यात और superbly talented कार्टूनिस्ट से पहली बार मुलाक़ात हुई जिन्हे आप सब आज पवन के नाम से जानते हैं। तक़रीबन हमरे कद काठी और उम्र के थे पवन जी उस वक़्त। आज उनकी प्रसिद्धी और मूँछें, दोनों घनी हो गयीं लेकिन हम ज़रा ओझरा गए और प्रसिद्धि और मूँछें तो मिली लेकिन थोड़ी sophisticated वाली।  ख़ैर, मुद्दे पर आते हैं। उस वक़्त हम भी नवे-नवे और पवन जी भी नवे-नवे सो वार्तालाप के आलाप से झाला तक हम दोनों गाते-बजाते रहे। 


जब हम उस कॉम्पिटिशन के प्रतियोगिओं के पेन्टिंग्स को मुग्ध हो कर देखने लगे तब लगा की जज बनने का आमन्त्रण स्वीकार न करना एक wise decision था। पेन्टिंग कॉम्पिटिशन का जज उसे ही बनना चाहिए जिसे पेन्टिंग की समझ हो। एक हम हैं जो बड़े कुन्ठित माहौल में पले बढ़े तब भी इतनी समझ आ गयी मगर ------ 


जी हाँ, मगर सलीम खान ये नहीं समझे की स्पोर्ट्स के छेत्र में इतनी बड़ी-बड़ी हस्तियों के कुशलपूर्वक जीवित होते हुए उनके लाल, पीले, हरे का Indian Olympic Association का गुडविल एम्बेसेडर बनाना एक भद्दा प्रक्रम है मानों अमिताभ बच्चन को popularity और fund raising icon होने के कारण ISRO का chairman बनाया जा रहा हो। अमाँ,  इहे सब लूर लक्षण के चलते हम entertainment fraternity के लोग  नचनिया बजनिया कहाते हैं। उस पर जब बड़े-बड़े खेल के महारथी आपत्ति कर रहे हैं तो सलीम जी Tweet पे Tweet जोते हुए हैं कि India को तो world के नक़्शे पर Bollywood ले आया वर्ना India तो नक़्शे पर था ही नहीं। 


सलीम अंकल, ऐसा है कि आप Political Geography पर ज़्यादे मेहनत कर दिए हैं।  थोड़ा बाक़ी चीज़ भी पढ़ा कीजिये तो आपको पता चल जाएगा कि यूरोप और अमेरिका के समझदार लोग India को किन कारणों से जानते हैं। इ रोड पर घूमने वाला कोई हिप्पी इनको कह दिया होगा कि आप Bollywood country का है सो एकदम्मे trance में चल गए हैं। यही confusion एक बार कपूर खानदान को हो गया था की Russia में इंडिया की पहचान तो मेरा जूता है जापानी से है। बहुत हुआ प्रभु, अब Narcissism से बाहर निकलिए। जेतना देर में आपका लाल, पीला, हरा ड्रेस बदलेगा, ओतना देर में त रेस खतमो हो जाएगा। आपके बेटा को ई सब politician मामू बना रहा है। दिल का बुरा है या नहीं ये आप ही जानते होंगे लेकिन अभी उसपे केस भी चल रहा है प्रभु।  ऐसा न हो की ग़लत जगह पर छमकने के चक्कर में Badwill नाम का नया word dictionary में आ जाए। आपही सोचो कि अगर विराट कोहली या सचिन तेंदुलकर को सेन्सर बोर्ड का चेयरमैन बन दिया जाए तो आपको कैसा लगेगा। आप शर्तिया अगिया वेताल हो जाईयेगा।  वैसेही आज हम हो गए हैं। 



"निर्मल अगस्त्य।"
    
10:49 AM, 26-04-2016 
पटना, बिहार। 


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