Sunday, April 24, 2016

"आम (Mango) का इलेक्ट्रॉनिक कॉन्फ़िगरेशन!"

एक बार zoology के practical exam में spot test चल रहा था। external ने formalin में रखे एक फल को दिखा एक student से पूछा -

"ये क्या है ?"
"सर, सपाटू है। "
"सपाटू मतलब ?"
"सर वही जिसको दुनिया चीकू कहती है।"


सर ने उसे उस प्रश्न में zero दिया और कहा-
"यही पढ़ाई किये हो। आम तुमको चीकू दिखाई पड़ रहा है।" 
लड़का एकदम से क्रान्तिवीर वाली mode में आ गया। लगा बेंच कुर्सी पर उछलने कूदने। 
चिल्ला चिल्ला कर कहने लगा। 

हम क्या जाने आम और अनार। हम जैसे लोगों के नसीब में तुम्हारे पूर्वजों की वजह से आम-अनार जैसा फल कभी आया ही नहीं। तुम्हारे पूर्वजों ने आम और अनार अपने लिए रखा और हम जैसे लोगों को बनफुटका और जंगली बेर जैसे फल खाने पड़े। बरसात के मौसम में जब आम का घटिया variety जैसे फजली आ जाता तब तुम्हारे पूर्वज कभी दया के नाम पर तो कभी दान के नाम पर भिजवा देते और वो भी जब घर में सब खा के अघा चुके होते।  हम क्या जाने आम और अनार जैसा फल। 

external उसके विद्रोही तेवर को देख एकदम से P.H.D. होल्डर वाली confidence से लबरेज़ ब्रेकिंग न्यूज़ वाली ग़रज़ से सीधे मूक बधिर समाचार वाले अक्षर हो गए। उधर बच्चे ने उठाया एक फोर्मलिन वाला ज़ार और धड़ाक से पटक दिया। आवाज़ सुन कर प्रिंसिपल साब scene में आये। 

"क्या हो रहा है ?" 
"अरे! ये आम को चीकू कह रहा है। उसी पर हमने नंबर काट लिया तो अब नाना पाटेकर बन गया है।"

तब तक पता नहीं किसने अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ावर्ग आयोग में फ़ोन घुमा दिया और कहा की किसी मनुवादी को रंगे हाथों पकड़ना है तो जल्दी से फलां कॉलेज के फलां रूम में पहुँचिये। उधर formalin के ज़ार टूटते रहे और इसी बीच तीनों आयोगों के अध्यक्ष अपने लाव-लश्कर के साथ वहां पहुँच गए। 

भारी घमासान मचा।  External इस बात पे अड़ा रहा कि आम को आम कहलाने के लिए उन सामाजिक कुरीतिओं से क्या मतलब। Oxygen का electronic configuration हर धर्म, हर जात, हर वर्ग के लोगों के लिए एक ही होगी। ऐसा थोड़े न है कि कोई मनुवादी है तो उसके लिए Chromium, P-ब्लॉक Element हो जायेगा। ऐसा थोड़े है की Eienstien ने E = Delta MC Square यहुदिओं के लिए लिखा या Heisenberg's Uncertainty Principle केवल Christian के syllabus में लागू होता है। यही बच्चा जब डॉक्टर बनेगा तो क्या इसके लिए डॉक्टरी के नियमों में ढील दे दे जायेगी या इसे भी उसी सेट standard of treatment को follow करना पड़ेगा। लेकिन सब हो हल्लम में ऐसे उलझे कि Chromium बेचारा कब का घबड़ा कर S-block में जाकर Hydrogen और Lithium के बीच में छुप गया।    

तब तक कमबख़्त, कुख्यात से कुख्यात वेश्याओं को लजा देने वाली Media भी वहाँ पहुँच गई और शुरू हो गया online editing के साथ लाइव telecast जिसमे दिखाया जाने लगा कीं कैसे एक मनुवादी External एक बच्चे से उस फल का नाम आम कहलवाना चाह रहा है जिसे उस बच्चे के पूर्वज इस मनुवादी External के पूर्वजों की वजह से कभी खा नहीं पाये। तीनों आयोगों के अध्यक्ष ने इस सौदे पर उस External को court में न घसीटने की आश्वासन दिया कि पहले तो बच्चे को पूरे मार्क्स दिए जाएँ क्यूँकी एक रिज़र्व केटेगरी का बच्चा आम को फल कह दे वही काफी है और दूसरा कि कैमरे के सामने वह उस बच्चे से माफ़ी मांगे। आदमी को Homo-sapiens कहने की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ General Category के छात्रों की है। एक Reserve category का बच्चा उसे प्राणी वर्ग के अन्दर जो मन चाहे कहे, चलेगा। 


External अड़ गया और यही Honesty उसके पिछवाड़े पड़ गया। आज आठ साल बीत गए आयोग में जा जा के स्पष्टीकरण देते देते। उधर वो बच्चा उसके दो साल बाद Medical में Compete कर गया और आज तक first year में ही पढ़ता हुआ Hippocrates के छाती पर मूँग के साथ-साथ हर वो चीज़ दल रहा है जो  मनुवादियों के पूर्वजों ने उन्हें खाने नहीं दिया था। 

कहानियाँ, कहानियाँ होती हैं। बेसी दिमाग़ लगाने का नै। उसके लिए हम जैसे ग़ाली को प्रसाद, लत्तम जुत्तम को inspiration और मौत को पुरस्कार समझने वाले फेसबुकिया लेखक हैं जिन्हें साहित्य की मुख्य धारा में आने का कोई हक़ नहीं है। 

(नोट: मैं ऐसी किसी भी कुरीति का समर्थक नहीं हूँ जो मनुष्यता के लिए अभिशाप है। और मैं इस बात का भी समर्थक नहीं हूँ कि पायदान में निचली सीढ़ी पर बैठे लोगों के लिए जगह बनाने के लिए पायदान में अपनी योग्यता के कारण ऊपर खड़े लोगों की टाँगे काट दी जाये। नीचे वालों को ऊपर लाना हमारी ज़िम्मेदारी है लेकिन अपनी योग्यता के कारण ऊपर रहने वाले लोगों भी  दरकिनार न हों ये भी हमारी ही ज़िम्मेदारी है।  ये मनुवादी-मनुवादी का चोंचला कर कुछ लोग अपना नुकसान एक नए सिरे से कर रहे हैं।  मेरा मनुस्मृर्ति से कोई लेना देना नहीं है। न ही मैं मनु से कभी मिला हूँ और न ही अपने सामान्य जीवन में मुझे इन हज़ारों वर्ष पुरानी धारणाओं की आवश्यकता है। मुहिम गावों में चलाइए, वहां अभी भी असमानता है। शहर में आज हमलोग सालों साथ गुजरने के बाद भी किसी की जात पूछने नहीं जाते। मेरे बचपन में जब मैं purnea में था तो मेरा सबसे प्यारा दोस्त किस जाती का था वो मुझे मैट्रिक में आ के accidentally पता चला। हर सवर्ण बुरा या अत्याचारी नहीं होता और कभी शोषित रहा व्यक्ति स्थिति बदलने पर शोषकों की तरह व्यवहार न करे, इसकी गारन्टी कोई नहीं दे सकता। )  


निर्मल अगस्त्य। 
08:05 PM, 24-04-2016
पटना, बिहार।       
  



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