एक विशुद्ध देशी शब्द है- "छनरछाँव!"
हालाँकि इसकी उत्पत्ति जिस मूल शब्द से हुई है उसको यहाँ लिखना कोई साहित्यिक बहादुरी नहीं है।
"छनरछाँव" का शाब्दिक अर्थ बड़ा विस्तृत है और ऐसे समझना और समझाना ज़रा मुश्किल है। लेकिन एक-आध उदाहरणों से समझने की कोशिश की जा सकती है। जैसे, मेरे कुछ मित्र हैं, बोले तो फ़ास्ट फ़्रेंड्स। उनका नाम कुछ भी रख लीजिये क्या फ़र्क पड़ता है। क्यूँकि मेरे इस फेसबुकिया प्रलाप को पढ़ने के उपरान्त उन सबको यही लगेगा कि ख़ास उनके लिए लिखा गया है। कल सुबह से व्हाट्सएप-व्हाट्सएप का खेल शुरू हो जाएगा। हमरे लिए ही लिखे हो न यार टाइप्स। आपके भी कुछ ऐसे मित्र ज़रूर होंगे,सबके होते हैं। अब किसी शाम मेरे उन मित्रों को दारु पीने की इच्छा होगी तो वो सीधे-सीधे नहीं कहेंगे।
एक कहेगा- "जानते हो यार, दारु बड़ी ख़राब चीज़ है। बर्बादी है बर्बादी। पैसे की भी और सेहत की भी।"
दूसरा कहेगा - "सही कहते हो, चार दिन सचिवालय स्पोर्ट्स क्लब में बैडमिंटन खेल के जितना चर्बी गलता हैं उतना एक दिन के दारूबाजी में जमा हो जाता है।"
तीसरा कहेगा - "बात खाली दारु का नहीं है, बात स्साला चखना का भी है जो भुंजा से शुरू तो होता है लेकिन कम्बख्त्मारी के चिकेन लॉलीपॉप, चिकेन कड़ाही और स्टफ्ड नान पर जा के खत्म होता है।
कैलोरीमीटर भी ऊब के कहता है बस्स .... इस से ज़्यादा काँटा नहीं है हमरे मीटर में। अब कैलोरी अपने नापो।
अब जो नए लोग होंगे, अगलगीर, बगलगीर,राहगीर, वो इन बातों को सुन के कहेंगे देखो केतना हेल्थ कोंशियस है। केतना विद्वान है मारे सब के सब। केतना पते का बात कह रहा है कि दारु बड़ी ख़राब चीज़ है। बर्बादी है बर्बादी!
लेकिन हम तो उनके घनघोर मित्रों में से हैं। उनके नस-नस से वाकिफ़ हैं। वो प्रवचन नहीं दे रहे हैं नई पब्लिकों, वो छनरछाँव कर रहे हैं। अभी तो उनके nutritional science के असीम ज्ञान के चुआन कि पहली धार है जो तुम सुन के और गच्च हो के आगे बढ़ जा रहे हो। पूरा ज्ञान पाने के लिए बैठना पड़ता है, ठहरना पड़ता है और तुमजो है से कि घप्प लिट्टी टप्प सिंघाड़ा वाला कैप्सूल कोर्स के फेरा मे पड़े हुए हो।
अभी तो वो सब अलाप ले रहे हैं ,रेघा रहे हैं। माहौल बना रहे हैं। वो पूरी मंडली को क्रॉस चेक कर रहे हैं। तफ़्तीश कर के देख रहे हैं कि कितने दोस्तों का सुरूर, दारु की चर्चा से पुनर्मूषिको भवः की तरह जगता है। वो जानते हैं कि सारे दोस्त चूहा बनने के लिए व्यग्र हैं लेकिन कहानी तो बिल्ली से शुरू करने है, फ़िर कुत्ते पर ले जाना है। बाद में भेड़िया आएगा, फ़िर चीता आएगा और जब अंत में मामला बाघ-शेर तक पहुँच जाएगा तब हम क्रीम बिस्किट का झोला निकलते हुए पूछेंगे -- अरे! चाहते क्या हो,ये बताओ न यार। पीना है तो चलो नहीं तो सभा करो विसर्जित। अब, जब सब छनरछाँव करिये रहे हैं तो हम काहे पीछे रहें। हम काहे डायरेक्टली बोलें की तुम लोग पियो न पियो, हमको तो पीना है। तब हममे से पाँचवा एकदम्म से शुरुआत के पांच ओवर में चौबीस रन प्रति ओवर की रेट से ठोकाये हुए बॉलर की तरह बोलेगा- आपलोग देख लीजिये, आई एम ओक्के विथ एनी प्लान। वैसे दारु बड़ी ख़राब चीज़ है। बर्बादी है बर्बादी। पैसे की भी और सेहत की भी।"
इसी को कहते हैं छनरछाँव करना।
(मेरे आगामी व्यंग्य लेख "चल चमेली बाग़ में" उर्फ़ छनरछाँव का एक अंश।
(Claimer: इस घटना का कुछ जीवित लोगों से पुरकस सम्बन्ध है और इसमें कुछ भी
co-incidence नहीं है एवं यह प्रस्तुति केवल मनोरंजन के लिए नहीं है! )
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