‘‘सिग्नल के उस
पार’’
अगर आपसे कोई
अपराध हो-हवा गया,
क्या कहते
हैं कि
जवानी के
जोश में,
खून की
गर्मी के
मारे और
आप उससे
भी बड़ा
अपराध करने
की काबिलियत
रखते हैं
तो यकीन
मानिये आपके
लिये ऊपर
तक जाने
का रास्ता
साफ है।
शासन, प्रशासन,
कुशासन, सुशासन,
दुःशासन और
आसन, सभी
आप जैसे
योग्य और
साहसी व्यक्ति
को गले
से लगाने
के लिये
तैयार हैं।
हाँ, थोड़ी
नूराकुश्ती को चोंचला तो सीखना
पडे़गा। ये
बहुत गौरतलब
बात है
कि आप
एक बेहतरीन
कैन्डिडेट हैं और लाजिमी है
कि ऊपर
लिखे गये
सभी प्रकार
के ‘सन’
के लिये
आप अंग्रेजी
भाषा वाला
‘सन’ हैं
जिसे हम
जैसे सत्तू
छाप, खैनी
छाप लेखक
अपनी बतोली
की बदरिया
से बस
कुछ देर
के लिये
ही ढ़क
सकते हैं।
अगर कोई अपराध
आपने गल्ती
से कर
दिया और
आपमें अपराध
करते रहने
की सहज
योग्यता और
निडरता नहीं
है तो
आप न्याय
प्रक्रिया और प्रशासन की रोजी
रोटी हैं
क्युँकि उन्हें
भी कुछ
न कुछ
कार्य निष्पादित
करते रहने
की योग्यता
तो दिखानी
ही होती
है। वह
छूरा बड़ा
अभागा है
जिसे जिबह
करने के
लिये गर्दन
न मिला
हो। वह
बन्दूक भी
अभागा है
जिसे छेदने
के लिये
खोपड़ी न
मिली हो।
तो समझ
लिजिए कि
वह सिस्टम
कितना अभागा
हो जायेगा
जिसे सजा
देने के
लिये गलती
से बन
गया अनप्रोग्रेसिव
अपराधी न
मिले।
एक फिल्म में
एक डायलॉग
है। ‘‘जिन्दगी
में आगे
बढ़ना है
तो सिग्नल
के पहले
नहीं सिग्नल
के आगे
खड़ा रहना
सीखो।’’ और
जैसा होता
है, बहुत
लोगों ने
समझा और
बहुत लोगों
ने नहीं
समझा। जो
समझ गये
वो तो
समझ ही
गये और
जो नहीं
समझे उनके
लिये हम
जैसे ध्यान-पिपासु लोग
तो हैं
ही। ध्यान-पिपासु, दरअसल
काम-पिपासु
से भी
खतरनाक प्राणी
होता है।
उसे हर
वक्त अपने
चारों ओर
ऐसे लोग
चाहिये होते
हैं जो
उसपर, उसकी
बातों पर
ध्यान दे
सके। और
जब इतना
पढ़ ही
गये हैं
तो आगे
भी पढ़
लिजिये। ‘व्हेन
सफरिंग इज
कन्फर्म्ड, देन बेटर एन्ज्वॉय इट!’
तो बात
थी कि
आगे बढ़ने
के लिये,
तरक्की करने
के लिये
सिग्नल के
आगे खड़ा
रहना क्यूँ
जरूरी है।
आईये उदाहरण
से समझते
हैं।
जब मीठापुर सब्जी
मन्डी के
ऊपर बने
ऊपरी पुल
का उद्घाटन
हुआ तो
सुना कि
आवाजाही अब
थोड़ा आसान
हो जायेगा।
लोगों को
बड़ी खुशी
हुई। हमें
भी हुई।
खुशी के
मारे हम
उद्घाटन दिवस
की शाम
को पुल
पर अशोक
सिनेमा की
तरफ से
चढ़े और
करबिगहिया का तरफ उतर कर,
चिड़ैंया टांड़
के नीचे
से होते
हुये कंकड़बाग
पहुँच गये।
फिर वहाँ
मित्र मन्डली
में ध्यानाकर्षण
प्रस्ताव पारित
करवाया, दो
चार दोहे,
दो चार
हाइकू, दो
चार लेख
सुनाये और
वापस उसी
रास्ते से
होकर, उसी
पुल पर
अपनी दुपहिया
के टायरों
का वृत्त-चिन्ह छोड़ते
हुये घर
वापस आ
गये।
नया पुल और
नई गर्लफ्रेन्ड।
अ... हा...
! अब आगे
मत लिखवाईये।
सेन्सर नाम
की भी
कोई चीज
होती है।
बहरहाल एक
साल के
बाद वो
पुल ठेले
वालों और
खोमचे वालों
से गुलजार
हो गया।
ठीक बीचों
बीच, जिस
हिस्से के
नीचे रेलवे
लाइन हैं।
मने, पुल
के समतल
वाले हिस्से
में कई
बेरोजगार जिन्दगियाँ हौले से मुस्कुराईं।
ये बड़ी छोटी
सी बात
है जो
हम सब
जानते हैं
कि ओवरब्रिज
का भी
कुछ कायदा
कानून होता
है। ऐसे
तो कहीं
भी अतिक्रमण
करना अपराध
है लेकिन
पुल पर
तो यह
घोर अपराध
है। पुल
पर गाड़ी
पार्क करना
भी मना
है। पुल
के बीच
में कहीं
भी गाड़ी
घुमाना मना
है। यही
दिक्कत है
कि हम
पता बहुत
कुछ रखते
हैं। तो
जब जूस,
गुपचुप, चाट,
गन्ने का
रस, मोमो
और
मूँगफली-चने
के ठेलों
की वजह
से लोग
वहाँ रूकने
भी लगे।
अब लोग
रूकने लगे
तो उनकी
गाडि़याँ भी रूकने लगीं।
तो हो
गया जाम
और एक्सिडेन्ट
प्रोन एरिया
बनाने का
पूरा इन्तजाम।
अब या
तो ऊपर
बैठे अधिकारियों
का पता
नहीं कि
यहाँ क्या
हो रहा
है या
अगर पता
है तो
अब तक
क्यूँ हो
रहा है।
वो इसलिये
हो रहा
है कि
उस पुल
पर जो
बेरोजगार जिन्दिगियाँ
हौले से
मुस्कुराई थीं उन्हें मुस्कुराते रहने
के लिये
टैक्स देना
होता है
जिसकी न
तो कोई
रसीद होती
है न
ही कोई
फाईल एन्ट्री।
तो मोटा-मोटी यह
अवैध कमाई
का एक
जरिया है।
अब अगर
उन्हें पहले
ही दिन
से अतिक्रमण
करने से
रोका जाता
तो आज
डेली वसूली
कहाँ से
हो पाती।
इसे कहते
हैं सिग्नल
के आगे
खड़ा रहना।
पहले अपराध
होने दो
फिर हम
जायेंगे अपना
काम करने।
अगर अपराधी
प्रोग्रेसिव हुआ तो हम सरंक्षण
देंगे और
बदले में
दुआ-सलाम,
नजराना लेंगे
और अगर
डरपोक हुआ
तो कानुनी
कारवाई करेंगे।
आखिर तनख्वाह
के एवज
में कुछ
काम करते
रहना तो
बनता है
भाईयों।
ये देश ऐसा
ही है
भाई लोग।
अब आईये
एक दूसरा
उदाहरण। हर
चीज जोडे़
में हो
तो अच्छा
लगता है
और अपवाद
के कुंवारे
बाप की
तरह उभरने
की सम्भावना
भी घटती
है। तो
चलिये एक
और उदाहरण।
अभी, परसों मेरे
एक सीनियर
चचेरे मित्र
बड़े बदहवास
से मेरे
दीवान-ए-बाम में
पधारे। दीवान-ए-आम कहने से
स्टैन्डर्ड घटता है भाई और
दीवान-ए-खास कहने
लायक कुछ
है नहीं
मेरी बैठक
में और
दुष्टमित्रों, माफ करें कलम दगा
दे जाती
है, इष्टमित्रों,
को ये
बात पता
है। दरअसल
मेरी बैठक
में करीब
चालीस-पचास
किस्म के
बाम की
ट्यूबस और
शीशी-बोतलें
रखी हैं।
जेल भी
है, तेल
भी है
और बार-बार बेल
के पेड़
के नीचे
ही जा
के ठहरने
वाला, खिचड़ी
बालों के
आवरण से
आच्छादित हमेशा
दर्द में
रहने वाला
अपना बेल
भी है।
उम्मीद है
आप समझ
गये होंगे।
अगर नहीं
समझे तो
‘‘बेलमुन्डा’’ शब्द पर ध्यान केन्द्रित
कीजिये। मानसिक
भन्जक प्रक्रिया
के द्वारा
‘‘बेल’’ और
‘‘मुन्डा’’ को अलग कर दीजिये
और ये
रहा ‘‘बेल’’
आपके समझ
की टेª
में। सो
मेरी बैठक
जो है
वो एक
तरह से
सर दर्द
के लिये
बनाये गये
तेलों, बामों,
क्रीमों का
एक डिमान्सटेªशन रूम
है। इसलिये
‘दीवान-ए-बाम।’ तो
मेरे वो
चचेरे मित्र
मुरारी लाल
जी बडे़
बदहवास से
परसों मेरे
दीवान-ए-बाम में
पधारे। चचेरे
मित्र का
कुछ ऐसा
फन्डा है
कि दरअसल
वो मेरे
चचेरे भाई
के मित्र
हैं। उम्र
में तकरीबन
पन्द्रह साल
बडे़। दो
साल पहले
चचेरे भाई
का मेरठ
तबादला हो
गया और
अपने हिस्से
की दोस्ती
का सारा
चैनल मेरे
अस्तित्व में
इन्स्टाल कर
के चले
गये। अब
मुरारी लाल
को कुछ
भी समस्या
होती, चले
आते मेरे
पास चैनल
सर्फिंग करने।
दूसरा स्पेशल
फीचर यह
है कि
वे एक
राय-पिपासु
व्यक्ति हैं
जैसे मैं
ध्यान-पिपासु
व्यक्ति हूँ।
उनके चले
जाने के
बाद मैं
और मेरे
चचेरे भईया
उन्हें राय
जी कह
के सम्बोधित
करते थे।
तो बात
इतनी सी
है कि
उन्हें हर
छोटे-मोटे,
ऊँचे-नीचे,
उबड़-खाबड़,
जरूरी-गैरजरूरी
मसले पर
राय लेने
की आदत
है। पान
वाला, चाय
वाला, दूध
वाला, परचून
वाला से
लेकर धोबी
नाई, सब्जीवाले
तक। उनका
ये फन्डा
है कि
कुछ दो
न दो
बस एक
राय ही
दे दो।
एक तरह
से उन्हें
सर्वे करने
की बीमारी
है। बैंगन
गोल वाला
अच्छा है
कि लम्बा
वाला अच्छा,
उजला वाला
अच्छा की
बैंगनी वाला
अच्छा। अगर
गोल वाला
अच्छा तो
किसान लम्बा
वाला क्यूँ
उगाते हैं।
इतना सर्वे
करते हैं
मुरारी लाल
जी कि
कायदे से
उन्हें सर्वेयर
जनरल ऑफ
इन्डिया होना
चाहिये था।
खैर, मुझे
तो अपना
गेम बनता
दिखाई दे
रहा था।
बडे़ घन्टे
से किसी
ने मुझपर
ध्यान नहीं
दिया था।
पीठ में
खुजली हो
और लकड़ी
चल के
आपके पास
आये तो
आप मना
करेंगे क्या?
लेकिन बात
शुरू हुई
और जवान
होने के
पहले ही
धराशायी हो
गई। पता
चला उनके
लड़के को
चार घन्टे
से थाने
में बिठा
रखा है।
आज वो
राय लेने
वाले मोड
में नहीं
थे। कुल
का चिराग
थाने में
हो तो
कौन बाप
सर्वे के
पेट्रोमैक्स में पम्प करने की
सोचेगा। आगे
पता चला
कि कुछ
चोरी के
मोबाईल की
खरीद बिक्री
का मामला
है। अब
तो मेरे
विचारों का
अल्टरनेटिंग करेन्ट, चिन्ता के मारे
डायरेक्ट करेन्ट
बन गया।
मैनें भी
उससे एक
सप्ताह पहले
एक मँहगा
मोबाईल बडे़
सस्ते में
खरीदा था।
तीस हजार
का मोबाइल
उसने इक्कीस
हजार में
दिया था
मुझे। बकायदा
अपने दुकान
के पेपर
के साथ।
तभी मुरारी
लाल हड़बड़ा
के उठे
और चलते
बने। इतने
दिनों में
पहली बार
ऐसा हुआ
कि मैं
उनके पीछे-पीछे गया।
थोड़ी दूर
जाने के
बाद सोचा
कि ये
अच्छा मौका
है आजकल
के जवान
होते बच्चों
के मेन्टल
फ्रेम के
बारे में
बतियाने का।
मैनें कहना
शुरू किया
- ‘‘आजकल
के लड़कों
का ओरिएन्टेशन
एकदम अलग
है मुरारी
भैया। हमलोग
का जमाना
याद कीजिये।
मूँछ उगना
शुरू होता
था और
अन्दर से
एक ख्वाहिश
सुबह-सुबह
के प्रेशर
की तरह
जोर मारती
थी कि
कोई हमको
पसन्द कर
ले। कोई
भी! बस
एक्स-एक्स
क्रोमोजोम वाली दोपाया प्राणी होनी
चाहिये। होता
ये था
कि कोई
हमें पसन्द
करे न
करे हम्हीं
किसी को
पसन्द करने
लगते थे।
फिर दूसरी
ख्वाहिश जोर
मारती थी
कि किसी
तरह उस
तक अपनी
चिट्ठी पहुँचाई
जाये। नये-नये प्रेम
के इस
विधान में
सिनेमा का
गीत हमारे
लिये संविधान
की तरह
होता था।
मेरे जैसे
कुछ लड़के
तो बस
चिट्ठी पहुँचाने
वाले कबूतर
की तरह
होते थे
और उन्हें
इस बात
में सबसे
ज्यादा खुशी
इस गलतफहमी
से मिलती
थी कि
सारा प्रेम
तो बस
उन्हीं के
भरोसे चल
रहा है।
और भी
कुछ छोटी-छोटी ख्वाहिशें
होती थी
लेकिन उन
ख्वाहिशों के लिये उतना वक्त
ही निकल
पाता था।
सातवीं क्लास
में चिट्ठी
भेजने का
सिलसिला शुरू
होता और
मैट्रिक के
इक्जाम के
समय लड़की
का पहला
जवाब आता।
खून से
लिख रही
हूँ, स्याही
न समझना
टाईप और
फिर कहानी
का द
एन्ड। या
तो चिट्ठी,
घर के
किसी केजरीवाल
द्वारा पकड़
ली जाती
या मैट्रिक
में थर्ड
डिवीजन आने
के बाद
भविष्य की
चिन्ता में
बाप अपने
प्रेम के
मारे, आडे़-टेढे़ बच्चे
को एकदम
ढलाई वाला
चबूतरा बनाने
के लिये
पटना भेज
देते।’’ तभी
मुरारी भैया
पलटे और
बोले - ‘‘और
जो पटना
में रहते
थे उ
ऽ ऽ।’’
हमको तसल्ली
हुई कि
मुरारी भैया
इतनी देर
से मेरी
बात पर
ध्यान दे
रहे थे।
ये बचपन
की यादें
होती ही
ऐसी हैं। मैनें
कहा - ‘‘पटना
वालों को
दिल्ली भेज
दिया जाता
था और
क्या। मेरा
कहने का
मतलब, उस
समय के
लड़के-बच्चे
को रूपये-पैसे की
उतनी पड़ी
नहीं थी।
आजकल मामला
थोड़ा डॉलरमय
है। ऐसा
नहीं है
कि आजकल
का बच्चा
मोहब्बत नहीं
करता। एकदम
करता है।
लेकिन अन्तर
यह है
कि हमलोग
के जमाने
में सातवीं
में लड़की
को पहली
चिट्ठी भेजने
के बाद
मैट्रिक के
इम्तहान के
समय पहला
जवाब आता
था और
अब आलम
यह है
कि दूसरी
घन्टी में
लड़की के
मोबाइल पर
लड़के का
मैसेज गया
नहीं और
लन्च टाईम
में एम.एम.एस.
छप के
तैयार हो
जाता है।
तो अब
क्या बचा?
या तो
कैरियर या
तो पैसा।
जो पढ़ने
में तेज
है उसका
तो उलझे
रहने का
स्कोप है। पचहत्तर हजार तरह
का कोर्स
है अब
तो। और
जो पढ़ाई
में तेज
नहीं है
उसके लिये
दूसरे विकल्पों
के रूप
में खेल
है, पॉलिटिक्स
है, दुकान-दौड़ी है
और इन
सब के
लिये चाहिये
पैसा। एक
नम्बर रोजगार
कीजियेगा तो
पैसा उसी
स्पीड में
आयेगा जिस
स्पीड में
बी.एस.एन.एल.
का टू
जी वाला
इन्टरनेट आता
है। इसलिये
बच्चे अब
दो नम्बर
रोजगार में
ज्यादा ध्यान
देने लगे
हैं। बफरिंग
का पेशेंस
अब किसी
में नहीं
है भईया।
यू-ट्यूब
पर सिनेमा
लगाया तो
हच्चाक से
चालू हो
जाना चाहिये
और बिना
बफरिंग हुये
चलना चाहिये।
उसी तरह
बच्चे चाहते
हैं कि
बिजनेस में
टाइम लगाया
है तो
मुद्रा डॉलर
में आना
चाहिये। इन्डियन
करेन्सी में
कमाईयेगा तो
‘योर ट्रान्जेक्शन
इज बीईंग
प्रोसेस्ड के लटकपन्चमी में रह
जाईयेगा।’’
हमलोग तब तक
चौराहे तक
पहुँच चुके
थे। तभी
पीछे से
किसी ने
कहा - ‘‘पप्पा!’’
हम मुडे़ तो
देखा मुरारी
जी का
लड़का है।
मुरारी लाल
जी कस
के लगे
चिल्लाने- ‘‘अब यही सब दिन
देखना रह
गया है
बाकी। कोंची
किये थे
कि थाना
में थे।’’
बेटा बोला - ‘‘त
क्या हुआ?
थाने में
न थे।
अन्डर अरेस्ट
थोडे़ थे।
पूछताछ के
लिये बुलाया
था खाली।’’
मुरारी लाल और
जोर से
गरजे - ‘‘पूछताछ!
अरे! पुलिस
कोये पहाड़ा
पूछने के
लिये बोलाती
है रे।
का किये
हो तुम
सच-सच
बोलो।’’
वो मेरी तरफ
देख के
बोला- ‘‘इनको
समझाते काहे
नहीं हैं
अंकल। बाते-बाते में
हाईपर हो
जाते हैं।
अरे हम
परसू दो
गो मोबाइल
बेचे थे।
सैमसंग नोट
टू और
एक आई
फोन। ऊ
दोन्नो लड़का
को बिल
दे रहे
थे, लिया
नहीं। कल
रात में
पेट्रोलिंग वाला ऊ लोग को
चेकिंग के
लिये रोका
त पाकिट
से एकदम
नया मोबाईल,
ऊ भी
तीस हजार
के लपेट
वाला निकला।
कह देता
कि हाँ
खरीदे हैं।
त लगा
मेमियाने। आप तो जानते हैं
हम चालीस
पर्सेंट डिस्काऊन्ट
में बेचते
हैं और
सब समझता
है कि
हम चोरी
का माल
बेच रहे
हैं। हम
बकायदा सब
सेट विथ
पेपर कलकत्ता से
लाते हैं
और ऊ
कहाँ से
लाता है
ऊ उसका
हेडेक है।
हमको पेपर
देता है,
बस बात
खतम। बस
ऊ दोनों
का मेमियाना
सुन के
दरोगा समझा
कि मोबाइल
चोरी का
है। बैठा
लिया जिप्सी
में। थाना
पहुँचने के
बाद उसमें
से ए
गो का
बौल-बत्ती तनी
जरा तब
ऊ कहा
कि हमलोग
बोरिंग रोड
के अल्पना
कम्युनिकेशन से खरीदे हैं। त
दरोगा कहा
कि कागज
दिखाओ। तब
ऊ दोनों
जे है
से की,
राते से
हमरा नम्बर
ट्राई कर
रहा था।
हम तो
साइलेन्ट कर
के सुत
जातेे हैं।
सुबह उठे
त देखे
कि सत्तासी
गो मिस्ड
कॉल है,
त हम
कॉल बैक
किये। कॉल
बैक किये
त दरोगवा
उठाइस और
कहा कि
जल्दी से
थाना पहुँचो।
हम वहीं
गये थे
बताने कि
दुन्नो लड़का
चोर-ऊर
नहीं है।
बेचारा हम्हीं
से खरीदीस
है सेट।
उसके बाद
दरोगा कहा
कि इसका
ओरिजनल बिल
दो। तब
हम अपने
स्टॉफ को
फोन किये
और कहे
कि दुकान
खोल के
बिल वाला
पैड और
मोहर ले
के थाना
आ जाओ।
थनवे में ऊ दुन्नो का
बिल बना
के दिये।
तभिये थानो
इन्चार्ज आ
गया। बिल
देख के
बोला - ‘‘ऑय
रे ऽऽ!
ई आई
फोन तुम
कोन हिसाब
से पच्चीस
हजार में
और सेमसंग
नोट थ्री
उन्नैस हजार
में बेच
रहा है
रे? हम
समझ गये
कि इ
थाना इन्चार्ज
ऐसे ही
नहीं बना
है। इसको
पता है
कि सिग्नल
के आगे
खड़ा रहल
जाता है।
हम बता
दिये सब
बात। तब
उ बोला
कि अच्छाऽऽ!
मने, ई
सब स्मग्लिंग
का सेट
है। बिना
कस्टम ड्यूटी
चुकाये लाया
गया है
इ सब
को कलकत्ता में
और वहाँ
से तुम
सब चुटपुटिया
खेलाड़ी अपना
धन्धा कर
रहे हो,
ऊ भी
वैट, टिन,
सी.एस.टी. बी.एस.टी
के साथ।
कोये बात
नहीं। अब
तुमको पकड़
तो सकते
है नहीं।
तुम्हारा बिल
तो सही
है बाबू
लेकिन ध्यान
रखना कि
कभियो-न-कभियो धराओगे
जरूर।’’
त हम बोले-
‘‘सर आप
चाहियेगा त
काहे धरायेंगे।
लेकिन ई
सुन के
कुछ बोला
नहीं, उठ
के चला
गया। ठीक
दस मिनट
के बाद
मुन्सी आ
के कहिस
कि ऐजे
थाना के
अगली-बगली
में एगो
दुकान खोल
लो, समझे।
धकच्च के
बेचो इ
सब कलकतिया
माल। खाली
ए गो
सस्ता सुविस्ता
कम्पनी का
डिस्ट्रीबूसन चाहे डीलरसीप ले न लो। बाकी
हम लोग
त हईये
हैं, कोये
नै छूयेगा।
त वही
सब सेट
कर के
आ रहें
हैं समझे।’’
फिर उसका फोन
बजा। हाँ,
हूँ, कर
के मुरारी
लाल जी
से बोला
- ‘‘हम जा
रहे हैं
दुकान। खाना
पहुँचवा दीजियेगा।’’
फिर वह चलता
बना। मुरारी
लाल जी
भी चलते
बने। मुझे
मालूम है
कि ऐसा
राय-पिपासु
व्यक्ति कभी
न कभी
इस विषय
पर मुझसे
भी राय
लेने आयेगा
ही आयेगा।
तो बात यह
है कि
उनके बेटे
में दो
क्या, दो
हजार स्मगल्ड
मोबाईल बेचने
का माद्दा
है इसलिये
थाना इन्चार्ज
उसे सपोर्ट
कर रहा
है। उसे
एक जरिया
बने रहने
का अवसर
दे भी
रहा है
और ले
भी रहा
है। अगर
वह थाने
में घबड़ा
जाता और
गिड़गिड़ा के कहता कि गलती
हो गया
सर, अब
नहीं बेचेंगे
इ कलकतिया
माल, तो
अब तक
उसकी चार्जशीट
बन गई
होती। इसी
को कहते
हैं सिग्नल
के आगे
खड़ा रहना।
अपराधी अगर
छमतावान हो
तो उसे
व्यापारी बनाने
की कला
है ये।
अगर सिग्नल
तोड़ने की
क्षमता को
आप एक
प्रोग्रेसिव बिजनेस के रूप में
बढ़ाना चाहते
हैं तो
घबड़ाइये नहीं...। शासन,
प्रशासन, कुशासन,
सुशासन, दुःशासन
और आसन
आपके साथ
है।
‘‘निर्मल अगस्त्य’’
23 नवम्बर 2014, पटना
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